Declaration of Results: कर्नाटक हाई कोर्ट ने वकीलों की सर्वोच्च संस्था कर्नाटक राज्य बार काउंसिल (KSBC) चुनाव 2026 में बड़े पैमाने पर धांधली, नोट बांटने और बोगस वोटिंग के आरोपों को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण आदेश जारी किया है।
हाईकोर्ट के जस्टिस सूरज गोविंदराज की एकल पीठ ने १० जून २०२६ को यह अंतरिम आदेश पारित करते हुए चुनाव अधिकारी, हाई-पावर्ड इलेक्शन कमेटी के चेयरमैन और बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) को अपना कड़ा रुख स्पष्ट करने और जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। अदालत ने साफ कर दिया है कि बार काउंसिल चुनाव के मतों की गिनती भले ही पूरी हो जाए, लेकिन चुनाव के अंतिम नतीजों की घोषणा (Declaration of Results) हाई कोर्ट में लंबित याचिकाओं के अंतिम फैसले के अधीन (Subject to Outcome) रहेगी।
मामला क्या है? (कैश घूस, बोगस वोटिंग और प्री-मार्क मतपत्र)
यह पूरा विवाद 11 मार्च 2026 को कर्नाटक बार काउंसिल की 23 सीटों के लिए हुए चुनावों से जुड़ा हुआ है, जिसमें पूरे राज्य से 149 उम्मीदवार मैदान में थे।
महिला उम्मीदवारों ने खोला मोर्चा: चुनाव में बतौर उम्मीदवार उतरीं दो महिला वकीलों— श्रीमती संध्या यू. और श्रीमती हेमा करियप्पा गौड़ा ने व्यक्तिगत रूप से (In Person) हाई कोर्ट में रिट याचिकाएं दायर कीं।
गंभीर कदाचार के आरोप: याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि चुनाव के दौरान बार काउंसिल ऑफ इंडिया की आचार संहिता (Code of Conduct) की धज्जियां उड़ाई गईं। पोलिंग बूथों के भीतर और बाहर वकीलों को रिझाने के लिए कैश (नकद पैसे) और महंगे गिफ्ट बांटे गए, उनके लिए अनौपचारिक पार्टियां (Unofficial Parties) रखी गईं, बोगस वोटिंग हुई और पहले से टिक मार्क किए गए (Pre-marked) मतपत्रों का इस्तेमाल किया गया।
सीसीटीवी फुटेज की मांग: याचिकाकर्ता संध्या यू. ने कोर्ट से मांग की है कि चुनाव निष्पक्ष साबित करने के लिए पोलिंग बूथों के सीसीटीवी फुटेज और मतपत्रों की सॉफ्ट कॉपी अदालत में पेश करने के आदेश दिए जाएं।
हाई कोर्ट का कानूनी रुख: ‘शिकायतें डस्टबिन में फेंकने के लिए नहीं हैं’
सुनवाई के दौरान कोर्ट के सामने आया कि चुनाव अधिकारी (Returning Officer) को धांधली को लेकर कम से कम 16 लिखित शिकायतें मिली थीं, लेकिन उन पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। जस्टिस सूरज गोविंदराज ने इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए BCI के नियम 7 का हवाला दिया:
सेंट्रल इलेक्शन ट्रिब्यूनल की भूमिका: कोर्ट ने कहा कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया के नियम 7 के तहत, यदि चुनाव में गड़बड़ी की कई शिकायतें मिलती हैं, तो रिटर्निंग ऑफिसर का यह वैधानिक कर्तव्य है कि वह उन शिकायतों को ‘केंद्रीय चुनाव ट्रिब्यूनल/कमेटी’ के पास जांच के लिए भेजे। शिकायतें सही हैं या गलत, यह तय करना केवल ट्रिब्यूनल का काम है।
प्रक्रियात्मक औपचारिकता नहीं: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बार काउंसिल का चुनाव किसी एक पद के लिए नहीं, बल्कि एक प्रतिनिधि संस्था (Representative Body) के लिए होता है। यहाँ वरीयता मत (Preference Votes) के आधार पर जीत तय होती है। ऐसे में यदि किसी एक उम्मीदवार की उम्मीदवारी धांधली के कारण रद्द होती है, तो पूरे वोटों का समीकरण बदल जाता है। इसलिए नियम 7 का पालन करना महज एक ‘कागजी औपचारिकता’ नहीं बल्कि अनिवार्य है।
दिल्ली बार काउंसिल चुनाव का उदाहरण: कर्नाटक हाई कोर्ट ने हाल ही में हुए दिल्ली बार काउंसिल चुनावों का भी जिक्र किया, जहां मतपत्रों में छेड़छाड़ के आरोपों के बाद सुप्रीम कोर्ट ने मतगणना पर रोक लगा दी थी और मामले को दिल्ली हाई कोर्ट ट्रांसफर किया था (हालांकि बाद में दिल्ली हाई कोर्ट ने पूरी तरह से दोबारा चुनाव कराने से इनकार कर दिया था)।
यह रही अदालत की टिप्पणी
अदालत ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा, चूंकि यह मामला कानूनी पेशे को विनियमित करने वाली एक वैधानिक संस्था (Statutory Body) के चुनावों से जुड़ा है, इसलिए बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) का रुख बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है। यह वकीलों के नियमन के लिए स्थापित संस्थागत ढांचे की ईमानदारी और साख पर सीधा असर डालता है।”
विश्लेषण: चुनाव की पवित्रता पर हाई कोर्ट के निर्देश
अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए इस चुनावी प्रक्रिया के ‘फर्स्ट फिल्टर’ को मजबूत करने के लिए बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) से निम्नलिखित बिंदुओं पर स्पष्ट जानकारी मांगी है।
| कोर्ट द्वारा मांगे गए मुख्य बिंदु | कानूनी और प्रशासनिक महत्व |
| अधिकारियों का पदानुक्रम (Hierarchy) | बीसीआई को बताना होगा कि रिटर्निंग ऑफिसर, ऑब्जर्वर और सेंट्रल इलेक्शन ट्रिब्यूनल के कार्य और अधिकार क्षेत्र क्या हैं। |
| समय-सीमा (Time Frame) | चुनावी प्रक्रिया के दौरान मिलने वाली शिकायतों पर कार्रवाई करने की तय समय-सीमा क्या है? |
| कार्रवाई का रिकॉर्ड | अधिकारियों को कोर्ट के सामने यह साबित करना होगा कि मिली हुई १६ शिकायतों पर उन्होंने अब तक क्या कदम उठाए हैं और क्या उन्हें ट्रिब्यूनल को भेजा गया है। |
अगली सुनवाई और अंतरिम आदेश
हाई कोर्ट ने मामले की तात्कालिकता को देखते हुए सभी वकीलों के अनुरोध पर इस केस को तुरंत अगली सुनवाई के लिए सूचीबद्ध (Relist) करने का आदेश दिया। कोर्ट ने साफ कर दिया कि यदि इस दौरान काउंटिंग पूरी भी हो जाती है, तो भी परिणाम याचिकाओं के अधीन ही रहेंगे ताकि चुनाव की पवित्रता अक्षुण्ण रहे।

