Tuesday, July 7, 2026
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Stray Dog Menace: AWBI की SOP…आम आदमी तो छोड़िए, विदेशी पर्यटक भी हो रहे आवारा कुत्तों के शिकार, एयरपोर्ट में भी इनका आतंक, पढ़िए विस्तार से

Stray Dog Menace: सुप्रीम कोर्ट ने देश में बढ़ते आवारा कुत्तों के आतंक (Stray Dog Menace) पर चिंता व्यक्त करते हुए 27 नवंबर 2025 की स्टैंडिंग ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) को चुनौती देने वाली याचिकाओं को खारिज कर दिया है।

मामले का सारांश (Quick Highlights)

मुख्य बिंदुसुप्रीम कोर्ट का आदेश और विवरण
मूल मुद्दाAWBI की 27 नवंबर 2025 की आवारा कुत्ता प्रबंधन SOP को चुनौती देने वाली याचिकाएं।
संवैधानिक पीठ का मतअनुच्छेद 21 के तहत सुरक्षित घूमना नागरिकों का अधिकार है; इसे खतरे में नहीं डाला जा सकता।
अधिकारियों को निर्देशप्रत्येक जिले में एक सर्वसुविधायुक्त ABC केंद्र और सरकारी अस्पतालों में पर्याप्त एंटी-रेबीज दवाओं का स्टॉक अनिवार्य।
अंतिम निर्णयSOP को चुनौती देने वाली पशु प्रेमियों/संगठनों की याचिकाएं पूरी तरह खारिज। पुराना सुरक्षा आदेश बरकरार।

एनिमल वेलफेयर बोर्ड ऑफ इंडिया ने बनाई थी SOP

दरअसल, एनिमल वेलफेयर बोर्ड ऑफ इंडिया (AWBI) ने एक SOP जारी किया था। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 21 (Article 21) के तहत देश के नागरिकों को मिलने वाले ‘गरिमा के साथ जीने के अधिकार’ में बिना किसी डर के सार्वजनिक स्थानों पर स्वतंत्र रूप से घूमने का अधिकार (Right to move freely) भी शामिल है। सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ ने आवारा कुत्तों के प्रबंधन से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कहा कि अदालत देश की इस कड़वी और परेशान करने वाली जमीनी हकीकत से आंखें नहीं मूंद सकती। कोर्ट ने विभिन्न राज्यों से आए चौंकाने वाले आंकड़ों का हवाला देते हुए प्रशासनिक सुस्ती और लापरवाही पर कड़ी नाराजगी जताई।

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जीवन और गरिमा का अधिकार सबसे ऊपर (Constitutional Mandate)

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में नागरिकों के मौलिक अधिकारों को सर्वोपरि रखते हुए कहा, संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गरिमा के साथ जीने के अधिकार में अनिवार्य रूप से हर नागरिक का यह अधिकार शामिल है कि वह स्वतंत्र रूप से घूम सके और सार्वजनिक स्थानों का उपयोग कर सके। नागरिकों को सार्वजनिक क्षेत्रों में कुत्ते के काटने, हमले या जानलेवा घटनाओं के लगातार डर या साये में जीने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। अदालत ने दुख जताया कि देश के विभिन्न हिस्सों से बच्चों को नोचे जाने, बुजुर्गों पर हमले और यहां तक कि अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों के भी इसके शिकार होने की खबरें लगातार आ रही हैं।

2026 के शुरुआती महीनों के भयावह आंकड़े

  • अदालत के समक्ष देश के विभिन्न राज्यों से आवारा कुत्तों के हमलों और रेबीज से जुड़ी बेहद डरावनी रिपोर्ट पेश की गईं, जो समस्या की गंभीरता को दर्शाती हैं।
  • तमिलनाडु: वर्ष 2026 के केवल पहले चार महीनों में लगभग 2.63 लाख कुत्ते के काटने के मामले दर्ज किए गए और 17 लोगों की मौत हो गई। (जनवरी-फरवरी में 62,000 प्रत्येक, मार्च में 71,000 और अप्रैल में 68,000 मामले)।
  • कर्नाटक: राज्य में 2026 के पहले चार महीनों में 2 लाख से अधिक मामले सामने आए और रेबीज के कारण कम से कम 25 लोगों की जान गई।
  • राजस्थान: अकेले श्रीगंगानगर शहर में तीन महीने में 1,840 मामले, उदयपुर में इस साल अब तक 1,750 मामले और झालावाड़ में एक ही दिन में 42 लोगों को कुत्तों ने काटा।
  • इंदिरा गांधी इंटरनेशनल (IGI) एयरपोर्ट, दिल्ली: देश के सबसे व्यस्त अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों में से एक आईजीआई एयरपोर्ट पर भी सुरक्षा की गंभीर चूक सामने आई। एयरपोर्ट अथॉरिटी ने खुद माना कि जनवरी 2026 से टर्मिनल्स पर कम से कम 31 कुत्ते के काटने की घटनाएं हो चुकी हैं, जिनमें 13 और 31 मार्च 2026 को यात्रियों पर हुए हमले भी शामिल हैं।

‘संकट-संचालित रवैया’ और प्रशासनिक विफलता पर कोर्ट की फटकार

अदालत ने कहा कि यदि राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने शुरुआत से ही एनिमल बर्थ कंट्रोल (ABC) फ्रेमवर्क, 2023 को दूरदर्शिता के साथ लागू किया होता जैसे समय पर नसबंदी क्षमता बढ़ाना, निरंतर टीकाकरण अभियान चलाना और बुनियादी ढांचा तैयार करना—तो आज स्थिति इतनी चिंताजनक नहीं होती। अदालत ने कहा कि प्रशासन का रुख ‘प्रिवेंटिव’ (रोकथाम वाला) होने के बजाय केवल संकट आने पर प्रतिक्रिया देने वाला (Crisis-driven response) रहा है, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य और मानवीय सुरक्षा के लिहाज से बिल्कुल भी कुशल नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट के सख्त दिशा-निर्देश (Supreme Court Directions)

  • अदालत ने समस्या के स्थायी समाधान के लिए सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को समयबद्ध तरीके से निम्नलिखित कदम उठाने के निर्देश दिए हैं।
  • प्रत्येक जिले में ABC केंद्र: देश के हर जिले में कम से कम एक पूरी तरह कार्यात्मक एनिमल बर्थ कंट्रोल (ABC) केंद्र स्थापित किया जाए। यह केंद्र आधुनिक पशु चिकित्सा बुनियादी ढांचे, प्रशिक्षित कर्मियों, सर्जिकल सुविधाओं और आवश्यक रसद (Logistics) से लैस होना चाहिए।
  • सटीक रिकॉर्ड और रिपोर्टिंग: स्थानीय आवारा कुत्तों की आबादी पर नियंत्रण रखने के लिए इन केंद्रों में उचित रिकॉर्ड-कीपिंग और समय-समय पर रिपोर्टिंग अनिवार्य होगी।
  • वैक्सीन की उपलब्धता: सभी सरकारी चिकित्सा सुविधाओं और अस्पतालों में एंटी-रेबीज वैक्सीन (Anti-rabies vaccine) और इम्युनोग्लोबुलिन (Immunoglobin) की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित की जाए।
  • संवेदनशील क्षेत्रों से स्थानांतरण: स्कूल, कॉलेज, अस्पताल, खेल परिसरों, बस डिपो और रेलवे स्टेशनों जैसे प्रतिबंधित और सार्वजनिक उपयोग के परिसरों से आवारा कुत्तों को हटाकर नसबंदी और टीकाकरण के बाद निर्धारित आश्रयों (Designated Shelters) में स्थानांतरित किया जाए (उन्हें वापस उसी परिसर में न छोड़ा जाए)।

जन सुरक्षा बनाम पशु अधिकार का संतुलन

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला यह स्पष्ट संदेश देता है कि यद्यपि पशु कल्याण और उनके प्रति मानवीय दृष्टिकोण महत्वपूर्ण है, लेकिन इसे देश के नागरिकों, विशेषकर बच्चों और बुजुर्गों के जीवन के अधिकार और सुरक्षा की कीमत पर लागू नहीं किया जा सकता। देश भर के हवाई अड्डों, अस्पतालों और शैक्षणिक संस्थानों जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में सख्त नियंत्रण रखने के निर्देश देकर अदालत ने प्रशासनिक निकायों की जवाबदेही तय कर दी है।

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