Narrow Exception: सुप्रीम कोर्ट ने देश भर के शैक्षणिक और सार्वजनिक संस्थानों से आवारा कुत्तों को हटाने के अपने कड़े रुख के बीच हैदराबाद की नाल्सार लॉ यूनिवर्सिटी (NALSAR University of Law) को एक विशेष और सीमित छूट (Narrow Exception) दी है।
मामले का सारांश (Quick Highlights)
| कानूनी बिंदु | सुप्रीम कोर्ट की नई व्यवस्था |
| विशेष छूट प्राप्त संस्थान | नाल्सार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ (NALSAR), हैदराबाद |
| स्वीकृत मॉडल | केवल प्रायोगिक आधार पर CSVR (Capture-Sterilise-Vaccinate-Release) |
| मूल कानूनी सिद्धांत | “सार्वजनिक स्थानों पर आवारा कुत्तों की रक्षा या रखरखाव के अधिकार के दावे को इस दायित्व से अलग नहीं किया जा सकता कि ऐसे कार्यों से दूसरों को नुकसान न पहुंचे।” |
| अन्य कॉलेजों के लिए नियम | बिना ‘लायबिलिटी एफिडेविट’ (Liability Affidavit) के कैंपस में कुत्तों को खाना खिलाने पर पूर्ण प्रतिबंध। |
अधिकारों के साथ जवाबदेही ले, तो आवारा कुत्तों के फैसले से विशेष छूट
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने स्पष्ट किया कि यह छूट व्यापक नियमों को कमजोर नहीं करती, बल्कि “अधिकारों के साथ जवाबदेही” (Accountability with Rights) के सिद्धांत को मजबूत करती है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक सुरक्षा के सिद्धांत से कोई समझौता नहीं किया जाएगा, लेकिन यदि कोई संस्थान पूर्ण कानूनी जिम्मेदारी लेता है, तो वह एक नियंत्रित मॉडल चला सकता है।
जहां सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसले में स्कूलों, कॉलेजों और अस्पतालों के भीतर आवारा कुत्तों को वापस छोड़ने पर पूरी तरह रोक लगा दी है, वहीं नाल्सार यूनिवर्सिटी के कुलपति (Vice Chancellor) ने एक विशेष आवेदन दायर कर इस नियम से छूट मांगी थी। अदालत ने उनके विशेष ‘कैंपस-आधारित मॉडल’ को देखते हुए इसे प्रायोगिक आधार (Experimental Basis) पर जारी रखने की अनुमति दी है।
नाल्सार (NALSAR) को छूट मिलने के मुख्य कारण
- एनिमल लॉ सेंटर (Animal Law Centre) की मौजूदगी: नाल्सार यूनिवर्सिटी में पहले से ही एक समर्पित ‘एनिमल लॉ सेंटर’ काम कर रहा है, जो परिसर के भीतर छात्रों और कर्मचारियों के संवेदीकरण (Sensitisation) और जानवरों की देखभाल की गतिविधियों में लगा हुआ है।
- संस्थागत ढांचा (Structured Framework): यूनिवर्सिटी ने अदालत को बताया कि उन्होंने कैंपस के भीतर आवारा कुत्तों के मानवीय प्रबंधन, नसबंदी (Sterilisation) और समय पर टीकाकरण (Vaccination) के लिए पहले से ही एक मजबूत और व्यवस्थित प्रणाली तैयार की है।
- CSVR मॉडल का प्रयोग: कोर्ट ने नाल्सार को कैप्चर-स्टरलाइज-वैक्सीनेट-रिलीज (CSVR) मॉडल को कैंपस के भीतर ही जारी रखने की अनुमति दी है, लेकिन इसके साथ एक बेहद कड़ी शर्त जोड़ी है।
कोर्ट की सबसे कड़ी शर्त: अपकृत्य दायित्व (Tortious Liability)
अदालत ने यह साफ कर दिया कि जानवरों की देखभाल का अधिकार उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी से अलग नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने आदेश दिया कि यदि एनिमल लॉ सेंटर नाल्सार कैंपस के भीतर इस मॉडल को चलाना चाहता है, तो उसे कुलपति (Vice Chancellor) के समक्ष एक वचनपत्र (Undertaking) देना होगा। इसके तहत, यदि कैंपस के भीतर कुत्ते के काटने (Dog bite) की कोई भी घटना होती है, तो पीड़ित व्यक्ति को लगी चोट और नुकसान के लिए एनिमल लॉ सेंटर पूरी तरह से अपकृत्य दायित्व (Tortious Liability – हर्जाना और कानूनी जिम्मेदारी) भुगतने के लिए उत्तरदायी होगा।
देश के सभी शैक्षणिक संस्थानों के लिए नया सामान्य नियम
- नाल्सार के इस मामले को नजीर बनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने देश के अन्य सभी कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के लिए एक नया और अनिवार्य नियम लागू कर दिया है।
- हलफनामा देना होगा अनिवार्य: यदि देश के किसी भी शैक्षणिक संस्थान में कोई पशु कल्याण समूह (Animal Welfare Group) या छात्रों का कोई संगठन (Student-led body) आवारा कुत्तों को खाना खिलाना या उनका रखरखाव करना चाहता है, तो उन्हें संस्थान के प्रमुख (Head of the Institution) के समक्ष एक हलफनामा (Affidavit) दाखिल कर हमले या कुत्ते के काटने की स्थिति में पूरी कानूनी और वित्तीय जिम्मेदारी (Liability) लेनी होगी।
- अनुमति नहीं मिलने की स्थिति: यदि कोई संगठन ऐसा हलफनामा देने से इनकार करता है, तो उसे संस्थान के परिसर के भीतर आवारा कुत्तों को खाना खिलाने या बनाए रखने की कोई अनुमति नहीं दी जाएगी।
- संस्थान के प्रमुखों की जवाबदेही: यदि कोई संस्थान बिना इस हलफनामे के कैंपस में आवारा कुत्तों को रखने की अनुमति देता है, तो नियमों के उल्लंघन के लिए उस संस्थान के प्रमुख (जैसे वाइस चांसलर या प्रिंसिपल) के खिलाफ सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी।
देखभाल की चाह तो जिम्मेदारी भी आपकी
सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश आवारा पशुओं के कल्याण के मुद्दे को एक व्यावहारिक मोड़ देता है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि भावुकता या पशु प्रेम के नाम पर आम नागरिकों और छात्रों की सुरक्षा को ताक पर नहीं रखा जा सकता। जो संगठन या व्यक्ति आवारा कुत्तों के अधिकारों की बात करते हैं, अब उन्हें उनके द्वारा किए जाने वाले नुकसान की भी पूरी कानूनी जवाबदेही उठानी होगी।

