Faulty Forensic: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को एक व्यवसायी (Businessman) को ₹10 लाख का मुआवजा देने का ऐतिहासिक आदेश दिया है।
हाईकोर्ट के जस्टिस दीपक खोत की एकल पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा कि राज्य सरकार अपने खराब फोरेंसिक ढांचे (Faulty Forensic Infrastructure) और जांच में देरी के लिए पूरी तरह जिम्मेदार (Vicariously Liable) है। दरअसल, आरोपी व्यवसायी को एयरपोर्ट पर सुरक्षा जांच के दौरान ‘गरम मसाला’ और ‘अमचूर पाउडर’ के पैकेट होने के कारण 57 दिनों तक अवैध रूप से जेल (Illegal Incarceration) में काटना पड़ा था, क्योंकि एयरपोर्ट की मशीनों ने इन्हें ड्रग्स समझ लिया था।
कैसे ‘मसाला’ बन गया ‘ड्रग्स’? (The Incident)
- यह मामला मई 2010 का है, जब भोपाल के रहने वाले व्यवसायी अजय सिंह भोपाल से दिल्ली होते हुए मलेशिया जा रहे थे।
- मशीन का फॉल्स अलार्म: भोपाल एयरपोर्ट पर रूटीन चेकिंग के दौरान उनके बैग में रखे ब्रांडेड अमचूर और गरम मसाले के पैकेटों ने एक्सप्लोसिव ट्रेस डिटेक्टर (ETD) मशीन को ट्रिगर कर दिया।
- दिखाया हेरोइन का संकेत: इस मशीन ने संकेत दिया कि पैकेट्स में 1 से 4 प्रतिशत हेरोइन और 10 प्रतिशत एमडीईए (MDEA – एक प्रकार का नशीला पदार्थ) हो सकता है।
- NDPS एक्ट में गिरफ्तारी: इस इंडिकेशन के आधार पर अजय सिंह को तुरंत NDPS एक्ट (स्वापक औषधि और मनःप्रभावी पदार्थ अधिनियम) के तहत गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया।
57 दिन की देरी के पीछे ‘प्रशासनिक सुस्ती’ और ‘लापरवाही’
- अदालत ने अपने फैसले में साफ किया कि पहली गिरफ्तारी भले ही संदेह के आधार पर सही रही हो, लेकिन 57 दिनों की लंबी कैद राज्य की कमियों का नतीजा थी।
- लैब्स के पास नहीं थी टेस्टिंग की सुविधा: गिरफ्तारी के बाद सैंपल को भोपाल की रीजनल फोरेंसिक साइंस लैबोरेट्री (RFSL) भेजा गया। लेकिन लैब ने 10 दिन बाद सैंपल यह कहकर वापस कर दिया कि उनके पास MDEA टेस्ट करने की सुविधा ही नहीं है।
- हैदराबाद से आई क्लीन चिट: इसके बाद सैंपल को सेंट्रल फोरेंसिक साइंस लैबोरेट्री (CFSL), हैदराबाद भेजा गया। 30 जून 2010 को आई CFSL की रिपोर्ट में पुष्टि हुई कि पैकेटों में कोई नशीला पदार्थ नहीं था, बल्कि वे सामान्य मसाले थे। इसके बाद 2 जुलाई 2010 को अजय सिंह जेल से रिहा हो सके।
हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी
“मध्य प्रदेश राज्य में मानक प्रयोगशालाएं (Standard Laboratories) न होने और प्रशासनिक सुस्ती (Lethargy) के कारण याचिकाकर्ता को बिना किसी गलती के 57 दिनों तक जेल की प्रताड़ना झेलनी पड़ी।”
भारतीय मसालों के लिए सही नहीं हैं विदेशी मशीनें!
- याचिकाकर्ता अजय सिंह ने कोर्ट में एक बेहद दिलचस्प और व्यावहारिक दलील दी। उन्होंने बताया कि एयरपोर्ट पर इस्तेमाल होने वाली ETD मशीनें भारतीय परिस्थितियों के अनुकूल नहीं हैं।
- तेज सुगंध से भ्रम: भारतीय मसालों की तेज और विशिष्ट सुगंध (Aromatic nature) के कारण ये मशीनें अक्सर उन्हें नशीला पदार्थ समझकर फॉल्स अलार्म (False Alarms) दे देती हैं।
- बाद में किए गए परीक्षणों में यह साबित हुआ कि अन्य ब्रांड्स के गरम मसाले और अमचूर पाउडर भी इस मशीन को इसी तरह ट्रिगर कर रहे थे।
- कोर्ट ने माना: हाई कोर्ट ने सहमति जताते हुए कहा कि ETD मशीन की रिपोर्ट केवल “संकेतात्मक” (Indicative) होती है, यह ड्रग्स रखने का अंतिम और पुख्ता सबूत (Conclusive Proof) नहीं है।
संविधान का आर्टिकल 21 और हाई कोर्ट के बड़े निर्देश
- अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि संविधान के आर्टिकल 21 (Right to Life and Personal Liberty – जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) के उल्लंघन के मामले में सार्वजनिक कानून के तहत मुआवजा दिया जा सकता है।
- भविष्य के लिए जारी गाइडलाइंस: मुआवजे का भुगतान: मध्य प्रदेश सरकार को आदेश दिया गया है कि वह अजय सिंह को मानसिक पीड़ा और सामाजिक प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने के एवज में ₹10 लाख का भुगतान 3 महीने के भीतर करे।
- लैब्स का निरीक्षण: राज्य के मुख्य सचिव (Chief Secretary) को निर्देश दिया गया है कि वे 1 महीने के भीतर राज्य की सभी फोरेंसिक लैब्स का निरीक्षण करें और वहां प्रतिबंधित पदार्थों की जांच के लिए आधुनिक उपकरण और योग्य स्टाफ सुनिश्चित करें।
मामले का सारांश (Quick Highlights)
| मुख्य पहलू | अदालती आदेश और मामले का विवरण |
| मामला | अजय सिंह बनाम मध्य प्रदेश राज्य व अन्य |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस दीपक खोत |
| जेल की अवधि | 57 दिन (बिना किसी अपराध के) |
| मशीन की खामी | ETD मशीन ने भारतीय मसालों की खुशबू को हेरोइन समझ लिया था। |
| अंतिम निर्णय | ₹10 लाख का मुआवजा देने का आदेश और राज्य की फोरेंसिक व्यवस्था को सुधारने की चेतावनी। |
निष्कर्ष (Takeaway): आपराधिक न्याय प्रणाली और तकनीकी व्यवस्था के लिए एक बड़ी सीख
यह फैसला देश की आपराधिक न्याय प्रणाली और तकनीकी व्यवस्था के लिए एक बड़ी सीख है। यह रेखांकित करता है कि वैज्ञानिक जांच के बुनियादी ढांचे में कमी किस तरह किसी निर्दोष नागरिक की जिंदगी और प्रतिष्ठा को बर्बाद कर सकती है। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि आधुनिक तकनीक (जैसे एयरपोर्ट स्कैनर्स) पर आंख मूंदकर भरोसा नहीं किया जा सकता, और अगर सरकारी तंत्र की सुस्ती से किसी नागरिक की स्वतंत्रता छिनती है, तो राज्य को उसकी भारी कीमत चुकानी होगी।

