Tuesday, September 29, 2026
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Consumer Friendly Jurisprudence: सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी; उपभोक्ता फोरम सेवानिवृत्त जजों-नौकरशाहों के पुनर्वास केंद्र नहीं बन सकते

मामला सारांश (At a Glance)

विधिक/प्रशासनिक पहलूविवरण
माननीय पीठCJI सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना
मामले की प्रकृतिस्वतः संज्ञान (Suo Motu Proceedings)
मुख्य मुद्दाउपभोक्ता अदालतों में अत्यधिक देरी, ढचर-पचर कार्यशैली और मुकदमों की पेंडेंसी।
अदालत का निर्देशपिछले 3 वर्षों के प्रदर्शन का राष्ट्रीय मूल्यांकन (Performance Audit) होगा।

Consumer Friendly Jurisprudence: सुप्रीम कोर्ट ने उपभोक्ता अदालतों में मुकदमों के अत्यधिक धीमी गति से निपटारे और मुकदमों के अंबार पर गहरा असंतोष व्यक्त किया है। शीर्ष अदालत ने सख्त लहजे में कहा कि उपभोक्ता आयोग (Consumer Commissions) सेवानिवृत्त न्यायाधीशों और नौकरशाहों (Retired Bureaucrats) को पुनर्नियोजित करने का ‘पुनर्वास केंद्र’ (Rehabilitation Centres) नहीं बनने चाहिए, बल्कि उन्हें परिणाम देने होंगे।

मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने देश भर के उपभोक्ता मंचों के सदस्यों के वेतन और भत्तों से जुड़े एक स्वतः संज्ञान (Suo Motu) मामले की सुनवाई के दौरान यह कड़ी टिप्पणी की।

🏛️ सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख निर्देश व टिप्पणियां

  1. उपभोक्ताओं के द्वार तक पहुंचे न्याय
    • CJI सूर्यकांत ने कहा: “उपभोक्ता-अनुकूल न्यायशास्त्र (Consumer friendly jurisprudence) में मामलों की पेंडेंसी को पीठों की संख्या बढ़ाकर कम किया जा सकता है। एक उपभोक्ता को दिल्ली तक यात्रा करने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि फोरम को उपभोक्ता के पास पहुंचना चाहिए।”
  2. NCDRC अध्यक्ष से 2 सप्ताह में स्टेटस रिपोर्ट तलब
    • सुप्रीम कोर्ट ने NCDRC के अध्यक्ष से 2 सप्ताह के भीतर रिपोर्ट मांगी है, जिसमें:
      • कुल लंबित मामले और दर्ज शिकायतें।
      • मामलों के निपटारे की औसत दर (Rate of disposal)।
      • किसी मामले के निपटारे में लगने वाला अनुमानित समय।
      • आयोग के सदस्यों की संख्या बढ़ाने की आवश्यकता पर डेटा।
  3. पेंडेंसी की वर्तमान स्थिति
    • कोर्ट को सूचित किया गया कि NCDRC में वर्तमान में 2018-19 के मामलों की सुनवाई हो रही है। यदि जून में कोई मामला सूचीबद्ध होता है, तो अगली तारीख सीधे अगले साल की मिलती है।

छोटे राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के लिए पूर्व के निर्देश

  • पीठ ने याद दिलाया कि 1,000 से कम लंबित मामलों वाले छोटे राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों (जैसे अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, त्रिपुरा, मिजोरम, मणिपुर, गोवा, लक्षद्वीप आदि) को वित्तीय बोझ कम करने के लिए जिला फोरम समाप्त करने और मुकदमों को नियमित न्यायिक अधिकारियों/उच्च न्यायालय रजिस्ट्रार को सौंपने की अनुमति दी गई है।

मुख्य न्यायाधीश (CJI सूर्यकांत) की प्रमुख टिप्पणियां

  1. 4 साल तक सुनवाई न होने पर जताई गहरी चिंता:
    • CJI सूर्यकांत ने एक समाचार रिपोर्ट का हवाला दिया, जिसमें वर्ष 2019 में दर्ज की गई एक उपभोक्ता शिकायत को 2022 में केवल एक बार सूचीबद्ध किया गया था और मध्य-2026 तक उसे दूसरी तारीख तक नहीं मिली थी।
    • CJI ने सवाल उठाया: “2019 में दायर मामला 2022 में पहली बार सूचीबद्ध होता है! यदि उपभोक्ताओं को वर्षों तक सुनवाई ही नहीं मिलेगी, तो इन उपभोक्ता फोरम का उद्देश्य क्या रह जाता है?”
  2. परफॉर्मेंस ऑडिट (Performance Evaluation) का आदेश:
    • मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट किया: “उपभोक्ता फोरम केवल सेवानिवृत्त जजों के पुनर्वास केंद्र नहीं बन सकते। उन्हें काम करके दिखाना होगा। मैं प्रदर्शन मूल्यांकन (Performance Evaluation) का आदेश दे रहा हूँ। पिछले तीन वर्षों का प्रदर्शन डेटा प्रस्तुत किया जाए, हम खुद इसकी समीक्षा करेंगे।” पीठ ने राज्य और जिला उपभोक्ता मंचों का ‘परफॉर्मेंस ऑडिट’ (Performance Audit) कराने का आह्वान किया। राज्य आयोगों को पिछले तीन वर्षों का जिला फोरम मूल्यांकन रिपोर्ट जमा करने का निर्देश दिया गया है।
  3. NCDRC अध्यक्ष को विस्तृत रिपोर्ट देने का निर्देश:
    • शीर्ष अदालत ने राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (NCDRC) के अध्यक्ष को लंबित मामलों के अंबार और निपटारे की दर पर विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करने का आदेश दिया है।

⚖️ सुनवाई का संदर्भ (Case Background)

  • स्वतः संज्ञान (Suo Motu) मामला: यह मामला लगभग 5 वर्ष पूर्व देश भर की उपभोक्ता अदालतों में इंफ्रास्ट्रक्चर, नियुक्तियों और सदस्यों के वेतन-भत्तों से जुड़ी कमियों को सुधारने के उद्देश्य से सुप्रीम कोर्ट द्वारा शुरू किया गया था।
  • क्षेत्रीय पीठों और सुधारों की मांग: इससे पूर्व की सुनवाई में भी कोर्ट ने केंद्र सरकार को NCDRC की क्षेत्रीय (Regional) और सर्किट पीठें गठित करने तथा 1,000 से कम मामलों वाले छोटे राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में जिला फोरम को सामान्य सिविल कोर्ट्स के साथ एकीकृत करने की अनुमति दी थी।

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