Thursday, November 5, 2026
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Delhi HC: फरलो कोई अधिकार नहीं बल्कि सुधारात्मक सुविधा…जेल लौटे कैदियों पर एक वर्ष की निगरानी अवधि लगाना जरूरी

Delhi HC: दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा, अपील खारिज होने के बाद कैदियों पर ‘1 साल की निगरानी अवधि’ का नियम बरकरार।

जेल प्रशासन काे दिए यह अादेश

दिल्ली हाईकोर्ट ने जेल प्रशासन के उस आदेश को वैध ठहराया जिसमें कहा गया है कि जिन कैदियों की सजा के खिलाफ दायर अपील खारिज हो जाती है और वे दोबारा जेल लौटते हैं, उन्हें फरलो (अस्थायी रिहाई) के लिए पात्र होने से पहले एक वर्ष की “वॉच पीरियड” पूरी करनी होगी। मुख्य न्यायाधीश देवेन्द्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तुषार राव गेडेला की खंडपीठ ने यह फैसला उस याचिका को खारिज करते हुए सुनाया जिसमें 2019 के डीजी (प्रिज़न्स) के स्थायी आदेश की एक धारा को संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन बताते हुए निरस्त करने की मांग की गई थी।

यह है मामला

दीपक श्रीवास्तव को दहेज मृत्यु और उत्पीड़न के मामले में दोषी ठहराया गया था और उन्हें आजीवन कारावास की सजा मिली थी। सुप्रीम कोर्ट द्वारा उनकी अपील खारिज किए जाने के बाद उन्हें दोबारा जेल भेजा गया था। जेल प्रशासन ने नियमों के अनुसार कहा था कि वे 13 नवंबर 2025 के बाद ही फरलो के लिए आवेदन कर सकते हैं।

याचिकाकर्ता की यह रही दलील

याचिकाकर्ता ने वैकल्पिक रूप से यह दलील भी दी थी कि अगर एक साल की अवधि बरकरार रखी जाती है तो कम से कम इसे छह माह कर दिया जाए, लेकिन अदालत ने इसे भी खारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि यह आदेश डीजी (प्रिज़न्स) की सामान्य प्रशासनिक शक्तियों के तहत जारी किया गया है और यह दिल्ली प्रिज़न अधिनियम या दिल्ली प्रिज़न नियमों का उल्लंघन नहीं करता।

दिनचर्या में पुनः सामंजस्य बैठाने के लिए कैदी काे समय चाहिए

अदालत ने याचिकाकर्ता दीपक श्रीवास्तव की इस दलील को भी अस्वीकार कर दिया कि यह प्रावधान एक नया वर्ग बनाता है और उन कैदियों के साथ भेदभाव करता है जिनकी अपीलें खारिज हो चुकी हैं। कोर्ट ने कहा कि जो कैदी अपील लंबित रहने के दौरान जेल से बाहर थे और बाद में अपील खारिज होने पर दोबारा जेल लौटे हैं, उन्हें जेल के अनुशासन और दिनचर्या में पुनः सामंजस्य बैठाने के लिए समय चाहिए।

लगातार जेल में रहनेवालाें पर निगरानी अवधि जरूरी नहीं

कोर्ट ने कहा, “जो कैदी अपील नहीं करते, वे लगातार जेल में रहते हैं और सजा काट रहे होते हैं, इसलिए उनके मामले में ऐसी निगरानी अवधि की आवश्यकता नहीं होती।” अदालत ने स्पष्ट किया कि दोनों श्रेणियां एक जैसी नहीं हैं, इसलिए समान व्यवहार की मांग अनुचित है। हाईकोर्ट ने कहा कि अगर याचिकाकर्ता 13 नवंबर 2025 के बाद फरलो के लिए आवेदन करते हैं, तो संबंधित अधिकारी को इसे कानून के अनुसार जल्द से जल्द निपटाना होगा।

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