Tuesday, September 8, 2026
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Delhi Riots: देवंगना कलिता की याचिका पर दिल्ली पुलिस को क्यों चाहिए दूसरा जज? क्या है वजह गुहार का, सबकुछ यहां पर स्पष्ट होगा

Delhi Riots: साल 2020 के दिल्ली दंगा साजिश मामले (Delhi Riots Conspiracy Case) की जांच कर रही दिल्ली पुलिस ने एक बड़ा कदम उठाते हुए दिल्ली हाई कोर्ट का रुख किया है।

डिविजन बेंच से प्रशासनिक हस्तक्षेप की मांग

दिल्ली पुलिस के वकील ने इस मामले को दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस कारिया की डिवीजन बेंच के समक्ष तत्काल उल्लेख (Mentioning) करते हुए प्रशासनिक स्तर पर हस्तक्षेप की मांग की है। पुलिस ने अदालत से मांग की है कि इस मामले की एक प्रमुख आरोपी, जेएनयू छात्रा देवंगना कलिता की याचिका को वर्तमान जज के पास से हटाकर किसी दूसरे जज की बेंच में ट्रांसफर (Transfer) कर दिया जाए।

ट्रांसफर की मांग के पीछे क्या है मुख्य वजह? (3 महीने का सुप्रीम कोर्ट का नियम)

दिल्ली पुलिस की इस असाधारण मांग के पीछे कानूनी प्रक्रियाओं में हो रही देरी और सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस का हवाला दिया गया है।

2024 से लगा है स्टे (Stay): दिल्ली दंगे की साजिश के मामले में कड़कड़डूमा कोर्ट (Trial Court) ने 5 सितंबर 2024 को आरोपों (Charges) पर बहस शुरू की थी। लेकिन, जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने 12 सितंबर 2024 को आदेश पारित कर ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया था कि वह आरोपों पर बहस तो जारी रख सकती है, लेकिन कोई अंतिम आदेश (Final Order) पारित नहीं करेगी। इस स्टे की वजह से पूरा ट्रायल रुका हुआ है।

फैसला सुरक्षित हुए बीते 5 महीने: जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने दोनों पक्षों की बहस सुनने के बाद 8 जनवरी 2026 को इस मामले में अपना फैसला सुरक्षित (Verdict Reserved) रख लिया था। हालांकि, जून 2026 की शुरुआत तक (करीब 5 महीने बीतने के बाद भी) अभी तक अंतिम फैसला नहीं सुनाया गया है।

सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन का उल्लंघन: दिल्ली पुलिस के वकील ने डिवीजन बेंच को बताया कि सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देश हैं कि कोई भी अदालत फैसला सुरक्षित रखने के 3 महीने के भीतर उसे घोषित करे। यदि इस समय सीमा में फैसला नहीं आता है, तो शीर्ष अदालत पक्षों को यह अधिकार देती है कि वे मामले को किसी अन्य बेंच में ट्रांसफर करने के लिए आवेदन कर सकें।

देरी का फायदा उठा रहे हैं सह-आरोपी (Co-Accused)

दिल्ली पुलिस ने ट्रांसफर की तात्कालिकता को समझाते हुए कोर्ट को बताया कि इस तकनीकी देरी का असर पूरे मामले पर पड़ रहा है। हाई कोर्ट द्वारा निचली अदालत की कार्यवाही पर लगाए गए स्टे का फायदा उठाकर इस केस के एक अन्य सह-आरोपी ने जमानत (Bail) की अर्जी दाखिल कर दी है।

सह-आरोपी का तर्क है कि चूंकि हाई कोर्ट ने ट्रायल पर रोक लगा रखी है, इसलिए मुकदमा खत्म होने में लंबा समय लगेगा और इस आधार पर उसे जेल में नहीं रखा जाना चाहिए। पुलिस का कहना है कि जज के फैसला न सुनाने के कारण मुख्य मुकदमे की रफ्तार पूरी तरह थम गई है।

देवंगना कलिता ने याचिका में क्या मांग की है?

पिंजरा तोड़ (Pinjra Tod) ग्रुप की सदस्य देवंगना कलिता ने दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दायर कर मांग की है कि नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और एनआरसी (NRC) के खिलाफ प्रदर्शनों की वे सभी वीडियो रिकॉर्डिंग्स (Video Recordings) उन्हें सौंपी जाएं, जिनका इस्तेमाल अभियोजन पक्ष (Prosecution) उनके खिलाफ कर रहा है। दिल्ली दंगों के दौरान पुलिस के आंतरिक व्हाट्सएप ग्रुप्स की व्हाट्सएप चैट (WhatsApp Chats) की प्रतियां भी बचाव पक्ष को दी जाएं।

चीफ जस्टिस का रुख: ‘मैं प्रशासनिक स्तर पर देखूंगा’

दिल्ली पुलिस की दलीलों और मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए चीफ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय ने पुलिस के वकील से केस से जुड़ी सभी फाइलें और विवरण जमा करने को कहा है। चीफ जस्टिस ने आश्वासन दिया कि आप मुझे मामले के पूरे विवरण दें। मैं प्रशासनिक स्तर (Administrative Side) पर इस मुद्दे को देखूंगा और जांच करूंगा कि इसमें मेरे द्वारा क्या कदम उठाए जा सकते हैं।

केस फैक्ट्स: दिल्ली दंगा साजिश मामला (UAPA)

दिल्ली पुलिस ने इस मामले में देश के सबसे कड़े आतंकवाद विरोधी कानून यूएपीए (UAPA) के तहत चार्जशीट दाखिल की है। इस मुख्य साजिश मामले में देवंगना कलिता के साथ देश के कई चर्चित चेहरे सह-आरोपी हैं। इनमें मुख्य आरोपियों की सूची में उमर खालिद, शारजील इमाम, सफूरा जरगर, नताशा नरवाल, आसिफ इकबाल तन्हा, ताहिर हुसैन, खालिद सैफी, इशरत जहां, मीरान हैदर, गुलफिशा फातिमा, शिफा-उर-रहमान, शादाब अहमद, तस्लीम अहमद, सलीम मलिक, मो. सलीम खान, अतहर खान और फैजान खान।

बॉटमलाइन (The Bottom Line)

दिल्ली पुलिस का यह कदम अदालती फैसलों में होने वाली देरी पर न्यायपालिका के भीतर की ही गाइडलाइंस को लागू कराने की कोशिश है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद महीनों तक आदेश न आना न्याय के सिद्धांत (Justice Delayed is Justice Denied) के खिलाफ माना जाता है। अब गेंद चीफ जस्टिस के पाले में है, जो ‘मास्टर ऑफ रोस्टर’ होने के नाते प्रशासनिक शक्तियों का इस्तेमाल कर यह तय करेंगे कि यह केस जस्टिस नीना बंसल कृष्णा के पास ही रहेगा या किसी अन्य जज को ट्रांसफर होगा।

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