Lease Agreements: गुजरात हाई कोर्ट ने वापी नगर निगम (VMC – पूर्व में वापी नगरपालिका) को एक बड़े वित्तीय विवाद में बड़ी अंतरिम राहत दी है।
यह विवाद शशिजित इंफ्रा प्रोजेक्ट्स लिमिटेड बनाम नगर निगम है
हाईकोर्ट के जस्टिस एल. एस. पीरजादा ने वापी नगर निगम (VMC) द्वारा दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया। यह विवाद शशिजित इंफ्रा प्रोजेक्ट्स लिमिटेड (Shashijit Infra Projects Ltd.) और नगर निगम के बीच चल रहा था, जिसकी सुनवाई बॉम्बे हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश के. आर. व्यास बतौर एकमात्र मध्यस्थ (Sole Arbitrator) कर रहे थे। कोर्ट ने झीलों के विकास और लीज समझौतों (Lake Development Lease Agreements) से जुड़े करीब ₹100 करोड़ के एक मध्यस्थता मामले की कार्यवाही पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है।
क्या है पूरा विवाद? (झीलों के विकास से जुड़ा मामला)
यह विवाद वापी की तीन प्रमुख झीलों लाखमदेव, डुंगरा और चला (Lakhamdev, Dungra and Chala lakes) के विकास और उनके लीज समझौतों से जुड़ा है। प्राइवेट इंफ्रा कंपनी ने इन समझौतों के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए करीब ₹100 करोड़ का दावा ठोकते हुए मध्यस्थता (Arbitration) प्रक्रिया शुरू की थी।
हाई कोर्ट ने क्यों लगाई रोक? (नगर निगम के 3 मुख्य तर्क)
सुनवाई के दौरान वापी नगर निगम (VMC) की तरफ से पेश सरकारी वकील जी. एच. विर्क और उनके सहयोगी वकीलों ने मध्यस्थता प्रक्रिया की कानूनी वैधता पर गंभीर सवाल उठाए, जिन्हें हाई कोर्ट ने प्रथम दृष्टया विचारणीय माना।
एकतरफा नियुक्ति (Unilateral Appointment): नगर निगम ने दलील दी कि विपक्षी कंपनी (शशिजित इंफ्रा) ने मध्यस्थ (Arbitrator) की नियुक्ति अपनी मर्जी से एकतरफा तरीके से की थी। इसमें नगर निगम की कोई सहमति (Consent) नहीं ली गई थी, जो सुप्रीम कोर्ट के स्थापित दिशा-निर्देशों और मध्यस्थता कानून के तहत कानूनी रूप से अमान्य (Legally Untenable) है।
एकतरफा फैसले का डर (Risk of Ex-Parte Ruling): मध्यस्थ (जस्टिस व्यास) ने 2 जून को ही इस मामले की सुनवाई रखी थी और चेतावनी दी थी कि यदि नगर निगम ने अपना जवाब दाखिल नहीं किया, तो उसका बचाव का अधिकार बंद कर दिया जाएगा। नगर निगम ने कोर्ट को बताया कि इससे उनके खिलाफ एकतरफा (Ex-Parte) आदेश आने का खतरा बना हुआ था।
पब्लिक ट्रिब्यूनल का क्षेत्राधिकार: वीएमसी ने हाई कोर्ट के ही एक पुराने फैसले का हवाला देते हुए तर्क दिया कि अधिसूचित सार्वजनिक उपक्रमों (Notified Public Undertakings) या नगर निकायों से जुड़े ऐसे विवादों का निपटारा निजी मध्यस्थता के बजाय पब्लिक वर्क्स ट्रिब्यूनल (Public Works Tribunal) द्वारा किया जाना चाहिए।
कोर्ट का रुख…समानांतर कार्यवाही से आ सकते हैं विरोधाभासी फैसले
नगर निगम ने अदालत को यह भी अवगत कराया कि इसी मामले से जुड़े कुछ समान मुद्दे (Parallel Matters) पहले से ही हाई कोर्ट के समक्ष लंबित हैं, जिनकी अगली सुनवाई 18 जून को होनी है। ऐसे में यदि समानांतर रूप से निजी मध्यस्थता चलती रही, तो विरोधाभासी फैसले (Conflicting Outcomes) आ सकते हैं, जिससे नगर निगम के हितों को भारी नुकसान होगा। इन दलीलों को स्वीकार करते हुए जस्टिस एल. एस. पीरजादा ने आदेश दिया कि प्रतिवादी नंबर 2 (मध्यस्थ) इस मामले में मध्यस्थता की कार्यवाही को आगे न बढ़ाएं और अगली सुनवाई की तारीख तक कोई भी आदेश पारित न करें।
विश्लेषण: सरकारी अनुबंधों में निजी मध्यस्थता के नियम
यह मामला इस बात का बड़ा उदाहरण है कि सरकारी या नगर निकाय के टेंडर्स और अनुबंधों में निजी कंपनियों द्वारा अपनी मर्जी से मध्यस्थ नियुक्त करने की प्रथा पर अदालतें कितनी सख्त हैं
| विवाद का बिंदु | इंफ्रा कंपनी का रुख | नगर निगम / कानून का पक्ष |
| मध्यस्थ की नियुक्ति | विवाद होने पर स्वतंत्र रूप से पूर्व जज को मध्यस्थ नियुक्त कर दिया। | कानूनन मध्यस्थ की नियुक्ति के लिए दोनों पक्षों की लिखित सहमति या हाई कोर्ट/सुप्रीम कोर्ट का आदेश अनिवार्य है। |
| सही फोरम (Forum) | ₹100 करोड़ के नुकसान की भरपाई के लिए प्राइवेट आर्बिट्रेशन को चुना। | नगर निकायों के मामलों में अक्सर पब्लिक वर्क्स या सरकारी ट्रिब्यूनल ही क्षेत्राधिकार रखते हैं। |
बॉटमलाइन (The Bottom Line)
गुजरात हाई कोर्ट का यह स्थगन आदेश (Stay Order) वापी नगर निगम के खजाने को एकतरफा वित्तीय झटके से बचाने के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि विवाद चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो, मध्यस्थता की प्रक्रिया को निष्पक्ष और दोनों पक्षों की सहमति के कानूनी दायरे में ही होना चाहिए।

