Monday, August 17, 2026
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DISABILITY PENSION: स्किजोफ्रेनिया जैसी बीमारियों में पेंशन मामलों में अपनाई जाए उदार सोच, यह रही सुप्रीम टिप्पणी

DISABILITY PENSION: सुप्रीम कोर्ट ने सेना से स्किजोफ्रेनिया बीमारी के चलते हटाए गए एक पूर्व सैनिक को विकलांगता पेंशन देने का आदेश दिया है।

मेडिकल बोर्ड की राय केवल औपचारिकता नहीं है…

जस्टिस अभय एस ओका और एन कोटिस्वर सिंह की पीठ ने कहा कि इस तरह की बीमारियों में पेंशन देने के मामलों में एक उदार दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए। कोर्ट ने यह भी कहा कि मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट में अगर बीमारी के कारणों का स्पष्ट उल्लेख नहीं है, तो उस आधार पर पेंशन न देना कानूनन गलत होगा। कोर्ट ने कहा कि मेडिकल बोर्ड की राय केवल औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह एक जरूरी दस्तावेज है, जिसके आधार पर विकलांगता पेंशन दी या रोकी जाती है। अगर मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट में कारण नहीं दिए गए हैं, तो उस पर आधारित फैसला टिक नहीं सकता।

18 मई 1998 को स्किजोफ्रेनिया के चलते सेवा से हटा दिया गया था

मामला केरल स्थित सशस्त्र बल ट्रिब्यूनल की कोच्चि बेंच के एक आदेश से जुड़ा है, जिसमें एक पूर्व सैनिक की विकलांगता पेंशन की मांग खारिज कर दी गई थी। याचिकाकर्ता 17 नवंबर 1988 को भारतीय सेना में सिपाही के रूप में भर्ती हुआ था और करीब 9 साल की सेवा के बाद 18 मई 1998 को स्किजोफ्रेनिया के चलते सेवा से हटा दिया गया था।
मेडिकल बोर्ड ने कहा था कि यह बीमारी अगस्त 1993 में शुरू हुई थी, जब वह एक शांत क्षेत्र में तैनात था। बोर्ड ने यह भी कहा था कि यह बीमारी सेना की सेवा से न तो जुड़ी है और न ही उससे बढ़ी है। इसे एक व्यक्तिगत मानसिक विकार बताया गया था।

विकलांगता पेंशन न देने का पूरा भार सेना पर होता है

कोर्ट ने कहा कि स्किजोफ्रेनिया जैसी बीमारियों में यह साबित करना मुश्किल होता है कि बीमारी का संबंध सेना की सेवा से है। इसलिए ऐसे मामलों में नियमों की व्याख्या करते समय सहानुभूतिपूर्ण और उदार दृष्टिकोण जरूरी है। कोर्ट ने यह भी कहा कि जब किसी सैनिक ने खुद सेवा से हटने की मांग नहीं की हो और उसे मेडिकल आधार पर हटाया गया हो, तो विकलांगता पेंशन न देने का पूरा भार सेना पर होता है कि वह इसका कारण स्पष्ट रूप से बताए।

कोर्ट ने सेवा से हटाने के आदेश को रद्द नहीं किया

कोर्ट ने पाया कि मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट में बीमारी के कारणों का कोई ठोस आधार नहीं दिया गया था। इसलिए सेवा से हटाने और पेंशन न देने का फैसला वैध नहीं माना जा सकता। हालांकि, कोर्ट ने सेवा से हटाने के आदेश को रद्द नहीं किया, लेकिन सेना को निर्देश दिया कि वह पूर्व सैनिक को नियमों के अनुसार तुरंत विकलांगता पेंशन और उससे जुड़े सभी लाभ दे। हालांकि, उसे केवल पिछले तीन साल की पेंशन की राशि ही मिलेगी, उससे पहले की नहीं।

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