Wednesday, September 30, 2026
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Disposal Of Cases: इलाहाबाद के जज रोज 200+ केस सुन रहे हैं, फिर भी वॉल्यूम ज्यादा…मुकदमों के बोझ तले दबे जजों के लिए नए सिस्टम की जरूरत, जान लें

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों में आपराधिक मामलों और जमानत याचिकाओं के निपटारे की स्थिति पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है।

सुप्रीम कोर्ट ने सभी उच्च न्यायालयों से डेटा मांगा था

जस्टिस जॉयमाल्या बागची के साथ इस पीठ ने जमानत मामलों में होने वाली देरी को कम करने के लिए कई तकनीकी और प्रशासनिक सुझाव भी दिए। एक मामले की सुनवाई के दौरान, CJI ने मद्रास हाई कोर्ट की कार्यक्षमता की प्रशंसा की, जबकि इलाहाबाद और पटना हाई कोर्ट में लंबित मामलों की स्थिति पर चिंता जताई। अदालतों में जमानत याचिकाओं के अंबार को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सभी उच्च न्यायालयों से डेटा मांगा था। प्राप्त जानकारी के विश्लेषण के बाद CJI ने देश की न्यायिक गति का एक तुलनात्मक चित्र पेश किया।

मद्रास हाई कोर्ट: एक रोल मॉडल

CJI ने मद्रास हाई कोर्ट की सराहना करते हुए कहा, सबसे तेज़ निपटारा को लेकर आपराधिक मामलों को निपटाने के मामले में मद्रास हाई कोर्ट देश में सबसे आगे है। वहां की खंडपीठ (Division Bench) 2018 के आपराधिक अपीलों पर सुनवाई कर रही है, जो अन्य बड़े राज्यों की तुलना में काफी बेहतर स्थिति है।

इलाहाबाद और पटना: वॉल्यूम की चुनौती

उत्तर भारत के दो बड़े राज्यों के हाई कोर्ट्स को “सबसे समस्याग्रस्त” (Most problematic) बताया गया। इसमें इलाहाबाद हाई कोर्ट को लेकर CJI ने जजों की कठिनाइयों को स्वीकार करते हुए कहा कि वहां एक जज दिन भर में 200 से अधिक मामले सुनता है, फिर भी केस का ‘वॉल्यूम’ (मात्रा) इतना अधिक है कि इसे संभालना मुश्किल हो रहा है। वहीं, पटना हाई कोर्ट को लेकर कहा कि यहां भी स्थिति इलाहाबाद जैसी ही है, जहाँ भारी लंबित मामलों के कारण त्वरित सुनवाई संभव नहीं हो पा रही है। जबकि,
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के बारे में कहा, एक साल पहले यहाँ 63,000 जमानत याचिकाएं लंबित थीं, जिसे CJI ने “डरावनी स्थिति” (Alarming situation) बताया, हालांकि अब इसमें सुधार के संकेत मिले हैं।

तारीख पे तारीख’ खत्म करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के सुझाव

  • CJI ने हाई कोर्ट्स के लिए एक विस्तृत कार्ययोजना का प्रस्ताव दिया ताकि जमानत याचिकाओं का निपटारा समयबद्ध हो सके।
  • सॉफ्टवेयर आधारित लिस्टिंग: जमानत के मामलों को साप्ताहिक या पाक्षिक आधार पर ऑटोमैटिक सॉफ्टवेयर के जरिए लिस्ट किया जाए।
  • ई-स्टेटस रिपोर्ट: पहली सुनवाई से पहले सरकारी वकील द्वारा अनिवार्य रूप से स्टेटस रिपोर्ट फाइल की जाए।
  • सख्त समय सीमा: नई जमानत याचिकाओं को फाइल करने के एक सप्ताह के भीतर लिस्ट किया जाए।
  • एडजर्नमेंट (स्थगन) पर लगाम: सरकारी वकीलों द्वारा बिना किसी ठोस कारण के बार-बार तारीख मांगने की प्रवृत्ति को हतोत्साहित किया जाए।
  • ऑटोमैटिक री-लिस्टिंग: जो मामले किसी कारणवश उस दिन नहीं सुने जा सके, उन्हें अगले दिन या जल्द से जल्द खुद-ब-खुद लिस्ट कर दिया जाए।

संवैधानिक मर्यादा: हाई कोर्ट ‘अधीनस्थ’ नहीं

इलाहाबाद हाई कोर्ट के खिलाफ आ रही कई याचिकाओं पर टिप्पणी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया। हाई कोर्ट सुप्रीम कोर्ट के ‘अधीनस्थ’ (Subordinate) नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट केवल असाधारण परिस्थितियों में ही हाई कोर्ट से किसी मामले की सहानुभूतिपूर्वक या प्राथमिकता के आधार पर सुनवाई का अनुरोध करता है, क्योंकि हाई कोर्ट पहले से ही अत्यधिक बोझ तले दबे हुए हैं।

मामले का सारांश (Quick Highlights)

हाई कोर्टस्थिति/टिप्पणी
मद्रास हाई कोर्टदेश का सबसे तेज़ हाई कोर्ट (क्रिमिनल मामलों में)।
इलाहाबाद हाई कोर्टभारी वर्कलोड, प्रतिदिन 200+ केस प्रति जज।
पटना हाई कोर्टनिपटारे की गति में गंभीर कठिनाई।
सुझावसॉफ्टवेयर आधारित ऑटोमैटिक लिस्टिंग और अनिवार्य स्टेटस रिपोर्ट।

न्यू डायनेमिक्स’ की आवश्यकता

CJI ने संकेत दिया कि इलाहाबाद जैसे विशाल क्षेत्राधिकार वाले उच्च न्यायालयों के लिए “न्यू डायनेमिक्स” (नई कार्यप्रणाली) स्थापित करनी होगी। केवल न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाना समाधान नहीं है, बल्कि डिजिटल प्रक्रियाओं और पुलिस प्रशासन के साथ बेहतर समन्वय ही न्याय की गति बढ़ा सकता है।

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