Re-using Same Welfare Stamp: सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री ने ई-फाइलिंग (E-filing) प्रणाली में हो रही एक गंभीर धोखाधड़ी की ओर अदालत का ध्यान आकर्षित किया है।
मामले का सारांश (Quick Highlights)
| समस्या | प्रभाव | प्रस्तावित समाधान |
| स्टैम्प का पुन: उपयोग | कल्याण कोष को भारी राजस्व हानि। | ई-स्टैम्पिंग (Digital Stamping) प्रणाली। |
| फंड का आवंटन | पैसा दिल्ली बार काउंसिल को, लाभ शून्य। | सुप्रीम कोर्ट के लिए अलग वेलफेयर फंड। |
| धोखाधड़ी का तरीका | एक ही स्कैन की हुई कॉपी का बार-बार इस्तेमाल। | यूनिक पहचान और डिजिटल ऑडिट। |
सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री विभाग ने दी जानकारी
जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ को सूचित किया गया कि कुछ वकील एक ही ‘एडवोकेट वेलफेयर स्टैम्प’ (Advocates’ Welfare Stamp) को स्कैन करके उसे कई अलग-अलग वकालतनामों में बार-बार इस्तेमाल कर रहे हैं। यह मामला सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) द्वारा दायर उस याचिका की सुनवाई के दौरान उठा, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के वकीलों के लिए एक अलग कल्याण कोष (Welfare Fund) बनाने की मांग की गई है। रजिस्ट्री की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) एस.डी. संजय ने बताया कि डिजिटल फाइलिंग में ‘विशिष्ट पहचान’ (Distinctive features) न होने के कारण इस तकनीक का दुरुपयोग हो रहा है।
भौतिक बनाम डिजिटल फाइलिंग: ‘स्कैन’ का खेल
- पहले की स्थिति: भौतिक (Physical) फाइलिंग के समय स्टैम्प को फाड़ दिया जाता था या उस पर स्याही लगा दी जाती थी ताकि उसे दोबारा इस्तेमाल न किया जा सके।
- वर्तमान समस्या: ई-फाइलिंग में वकील एक स्टैम्प खरीदते हैं, उसे स्कैन करते हैं और फिर उसी की कॉपी को सैकड़ों ई-वकालतनामों में चिपका देते हैं। चूंकि स्टैम्प पर कोई यूनिक बारकोड या डिजिटल सिग्नेचर नहीं होता, इसलिए सिस्टम इसे नहीं पकड़ पाता।
- SCBA की प्रतिक्रिया: SCBA अध्यक्ष विकास सिंह ने इसे “धोखाधड़ी” करार दिया और सुझाव दिया कि जल्द से जल्द ‘ई-स्टैम्पिंग’ (E-stamping) अनिवार्य की जानी चाहिए।
मुख्य विवाद: सुप्रीम कोर्ट बनाम दिल्ली बार काउंसिल
- यह तकनीकी मुद्दा एक बड़े कानूनी संघर्ष का हिस्सा है।
- फंड का ट्रांसफर: वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट में दाखिल होने वाले वकालतनामों के स्टैम्प का पैसा ‘बार काउंसिल ऑफ दिल्ली’ (BCD) के पास जाता है।
- लाभ का अभाव: SCBA का तर्क है कि पैसा दिल्ली बार काउंसिल को जाता है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस करने वाले वकीलों को वहां से कोई कल्याणकारी लाभ (जैसे मेडिकल इमरजेंसी या अन्य मदद) नहीं मिलता।
- अलग फंड की मांग: याचिका में सुप्रीम कोर्ट रूल्स, 2013 में संशोधन कर एक समर्पित वेलफेयर फंड बनाने की मांग की गई है, जिसे भारत के मुख्य न्यायाधीश या उनके द्वारा नामित जज की देखरेख वाली समिति संचालित करे।
एडवोकेट्स वेलफेयर फंड एक्ट, 2001 का उल्लंघन
याचिका में अधिनियम की धारा 27 को चुनौती दी गई है। SCBA चाहता है कि जब तक इस मामले का अंतिम फैसला नहीं होता, तब तक दिल्ली बार काउंसिल को सुप्रीम कोर्ट से मिलने वाले स्टैम्प के पैसे को एक अलग ब्याज वाले खाते में जमा करने का निर्देश दिया जाए।
डिजिटल सुधारों की आवश्यकता
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को “चिंताजनक” माना है और अपनी आंतरिक समिति को इस पर विचार करने को कहा है। यह मामला दर्शाता है कि अदालतों के पूर्ण डिजिटलीकरण के साथ-साथ ‘सुरक्षा ऑडिट’ और ‘डिजिटल ऑथेंटिकेशन’ (जैसे QR कोड वाले स्टैम्प) कितने अनिवार्य हो गए हैं। वकीलों का कल्याण कोष उनके बुढ़ापे और बीमारी का सहारा होता है; ऐसे में इसमें होने वाली धोखाधड़ी सीधे तौर पर कानूनी बिरादरी के सामाजिक सुरक्षा चक्र को कमजोर करती है।

