Friday, September 25, 2026
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Environmental Jurisprudence: मानव होने मात्र से हमारे हितों को गैर-मानवीय जगत के हितों पर स्वतः प्राथमिकता नहीं मिल सकती; जस्टिस बी.वी. नागरत्ना

जस्टिस नागरत्ना के भाषण की प्रमुख बातें

  1. इंसानियत से परे प्रकृति की स्वतंत्र सत्ता: राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन (“The Future of Environment and Climate Dynamics”) के समापन सत्र को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा:“हमें यह स्वीकार करना होगा कि इंसानी हित केवल इंसान होने के नाते प्रकृति और अन्य जीवों के हितों से ऊपर नहीं हो जाते। गैर-मानवीय जीवन के प्रति हमारी ऐसी जिम्मेदारियाँ हैं जो हमारे लिए उनके उपयोग से पूरी तरह स्वतंत्र हैं।” — जस्टिस बी.वी. नागरत्ना
  2. भविष्य की चेतना और पर्यावरण न्याय: उन्होंने कहा कि पर्यावरण न्याय में अदालतों को दूरदर्शिता (Foresight) दिखानी पड़ती है। अक्सर ऐसे मामलों से निपटना होता है जिनके परिणाम अपरिवर्तनीय (Irreversible) हो सकते हैं, इसलिए आज का फैसला कल के भविष्य की सतर्क चेतना के साथ होना चाहिए।
  3. असमान प्रभाव और जवाबदेही: जस्टिस नागरत्ना ने रेखांकित किया कि पर्यावरण से जुड़े फैसलों का असर अलग-अलग क्षेत्रों, समुदायों और आने वाली पीढ़ियों पर अलग-अलग पड़ता है। अच्छा पर्यावरणीय शासन केवल अधिकारों से नहीं, बल्कि मजबूत संस्थानों, पारदर्शिता, सख्त प्रवर्तन और न्याय तक पहुंच से बनता है।

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ न्यायाधीश न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना ने देश के पर्यावरण न्यायशास्त्र (Environmental Jurisprudence) में आ रहे एक बुनियादी और दार्शनिक बदलाव को रेखांकित करते हुए स्पष्ट किया है कि शीर्ष अदालत अब ‘मानव-केंद्रित’ (Anthropocentric) दृष्टिकोण से हटकर ‘पारिस्थितिकी-केंद्रित’ (Ecocentric) दृष्टिकोण की ओर अग्रसर हो रही है।

राष्ट्रीय हरित अधिकरण (National Green Tribunal – NGT) द्वारा “पर्यावरण और जलवायु गतिशीलता का भविष्य” (The Future of Environment and Climate Dynamics) विषय पर आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के विदाई सत्र (Valedictory Session) को संबोधित करते हुए जस्टिस नागरत्ना ने पर्यावरण न्याय, अंतर-पीढ़ीगत समानता (Inter-generational Equity), और जलवायु संकट से निपटने में न्यायपालिका की भूमिका पर विस्तृत विचार रखे। इस नए दृष्टिकोण के तहत प्रकृति और गैर-मानवीय प्राणियों के अधिकारों को केवल मनुष्यों के लिए उनकी उपयोगिता के आधार पर नहीं आंका जाएगा, बल्कि प्रकृति का अपना आंतरिक अस्तित्व और संरक्षण का अधिकार सर्वोपरि रहेगा।

जस्टिस बी.वी. नागरत्ना के संबोधन के प्रमुख विधिक एवं दार्शनिक बिंदु

1. ‘इकोसेंट्रिक’ दृष्टिकोण: मानव हित स्वतः श्रेष्ठ नहीं पर्यावरण संरक्षण की पारंपरिक धारणा को चुनौती देते हुए जस्टिस नागरत्ना ने कहा: “इकोसेंट्रिक दृष्टिकोण की ओर बढ़ने का अर्थ यह स्वीकार करना है कि मानव हित केवल मानव होने के आधार पर गैर-मानवीय जगत (Non-human world) के हितों पर स्वतः प्राथमिकता (Automatic Precedence) प्राप्त नहीं करते। इसके विपरीत, गैर-मानवीय जीवन के प्रति हमारे ऐसे गंभीर वैधानिक व नैतिक दायित्व हैं जो हमारे लिए उनकी उपयोगिता या लाभ से पूरी तरह स्वतंत्र हैं।”

2. दूरदर्शिता का अभ्यास: ‘अपरिवर्तनीय परिणामों और वास्तविक समय के जोखिमों पर निर्णय’

  • जस्टिस नागरत्ना ने रेखांकित किया कि सामान्य दीवानी या आपराधिक मुकदमों की तुलना में पर्यावरण से जुड़े मामलों में न्यायिक निर्णय (Environmental Adjudication) की प्रकृति बिल्कुल भिन्न होती है।
  • अदालतों को केवल उन उल्लंघनों पर विचार नहीं करना होता जो पहले ही घटित हो चुके हैं, बल्कि उन जोखिमों से निपटना होता है जो वास्तविक समय में सामने आ रहे हैं—अक्सर वैज्ञानिक अनिश्चितता (Scientific Uncertainty) के बीच और जिनके परिणाम कभी न सुधरने वाले (Irreversible Consequences) हो सकते हैं।
  • उन्होंने कहा:“उस अर्थ में, पर्यावरण न्यायनिर्णयन वास्तव में ‘दूरदर्शिता का एक अभ्यास’ (Exercise in foresight) है, जो अदालतों से मांग करता है कि वे भविष्य की सजग चेतना के साथ वर्तमान का नियमन करें।”

3. विभिन्न क्षेत्रों, समुदायों और पीढ़ियों पर असमान प्रभाव

  • जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि पर्यावरण न्याय (Environmental Justice) का तकाजा है कि अदालतें और सरकारें इस तथ्य को स्वीकार करें कि पर्यावरण से जुड़े फैसलों का असर सभी क्षेत्रों, समुदायों और पीढ़ियों पर एक समान नहीं होता; इसका सबसे बड़ा दंश अक्सर हाशिए पर मौजूद और कमजोर तबकों को झेलना पड़ता है।
  • उन्होंने रेखांकित किया कि सीमाओं के पार जा रहे प्रदूषण, जैव विविधता के नुकसान और साझा पारिस्थितिकी तंत्र के क्षरण को रोकने के लिए अब वैश्विक स्तर पर राष्ट्रों के बीच वास्तविक सहयोग अनिवार्य हो चुका है।

4. सुशासन के आवश्यक स्तंभ

  • पर्यावरण संरक्षण को केवल कागजी अधिकारों तक सीमित न रखने पर बल देते हुए उन्होंने कहा:“अच्छे पर्यावरण सुशासन (Good Environmental Governance) के लिए न केवल अधिकारों की घोषणा की आवश्यकता है, बल्कि प्रभावी संस्थाओं, कड़े प्रवर्तन (Enforcement), पारदर्शिता, संस्थागत जवाबदेही और न्याय तक सहज पहुंच का होना भी उतना ही आवश्यक है।”

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विधिक एवं न्यायशास्त्रीय पृष्ठभूमि: ‘Anthropocentric’ बनाम ‘Ecocentric’

  • एंथ्रोपोसेंट्रिक दृष्टिकोण (मानव-केंद्रित): पारंपरिक रूप से कानून प्रकृति को केवल मानव उपभोग, आर्थिक विकास और संसाधनों के दोहन के साधन के रूप में देखता रहा है, जहां पर्यावरण संरक्षण तभी तक प्राथमिकता पाता है जब तक वह प्रत्यक्ष रूप से मानव स्वास्थ्य या जीवन को प्रभावित न करे।
  • इकोसेंट्रिक दृष्टिकोण (प्रकृति-केंद्रित): यह आधुनिक न्यायशास्त्रीय सिद्धांत मानता है कि नदियां, वन, वन्यजीव और संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) स्वयं में कानूनी अधिकार और संरक्षण के हकदार हैं। मानव केवल प्रकृति का एक हिस्सा है, उसका स्वामी नहीं।

प्रासंगिक विधिक ढांचा एवं न्यायिक नजीरें

  • संवैधानिक आधार:
    • अनुच्छेद 21: स्वच्छ, सुरक्षित और प्रदूषण-मुक्त पर्यावरण में जीने का अधिकार गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार का अभिन्न अंग है (एम.के. रंजीतसिंह बनाम भारत संघ, 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने ‘जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों से मुक्त होने के अधिकार’ को अनुच्छेद 21 व 14 के तहत मान्यता दी)।
    • अनुच्छेद 48A (राज्य के नीति निदेशक तत्व): राज्य पर्यावरण की रक्षा और सुधार करने तथा देश के वनों और वन्यजीवों की सुरक्षा का प्रयास करेगा।
    • अनुच्छेद 51A(g) (मौलिक कर्तव्य): प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह वनों, झीलों, नदियों और वन्यजीवों सहित प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और संवर्धन करे तथा जीवित प्राणियों के प्रति दया भाव रखे।
  • संबद्ध ऐतिहासिक न्यायिक सिद्धांत:
    • टी.एन. गोदावर्मन थिरुमुलपाद बनाम भारत संघ (सुप्रीम कोर्ट) — ‘सार्वजनिक ट्रस्ट सिद्धांत (Public Trust Doctrine) और वनों के पारिस्थितिक मूल्य की मान्यता।’
    • सेंटर फॉर एनवायरनमेंटल लॉ, WWF बनाम भारत संघ (एशियाई शेर पुनर्वास मामला, 2013) — ‘सर्वोच्च न्यायालय ने पहली बार आधिकारिक रूप से मानव-केंद्रित दृष्टिकोण को त्यागकर ‘इकोसेंट्रिक दृष्टिकोण’ अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया था।’
    • प्रिकॉशनरी प्रिंसिपल (एहतियाती सिद्धांत) एवं पॉल्यूटर पेज प्रिंसिपल (प्रदूषक भुगतान सिद्धांत) — जिसे वेल्लोर सिटिजन्स वेलफेयर फोरम मामले में भारतीय विधि का अभिन्न अंग घोषित किया गया।

Environmental Jurisprudence: भाषण के मुख्य बिंदु (At a Glance)

विषयमुख्य संदेश / वक्तव्य
प्रकृति-केंद्रित सोच (Ecocentric Approach)गैर-मानवीय जीवन और प्रकृति के प्रति हमारी ज़िम्मेदारियाँ इस बात से तय नहीं होतीं कि वे इंसान के किस काम आती हैं (Utility)।
दूरदर्शिता और त्वरित जोखिम (Foresight in Adjudication)पर्यावरण न्याय का काम केवल हो चुके नुकसान को देखना नहीं, बल्कि आने वाले वैज्ञानिक अनिश्चितता भरे जोखिमों को रोकना भी है।
अंतरराष्ट्रीय सहयोग (Global Cooperation)जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और जैव विविधता की हानि सीमाओं में नहीं बंधती, इसलिए वैश्विक सहयोग और पारदर्शी शासन अनिवार्य है।
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