हाईकोर्ट का मुख्य निर्णय और कानूनी तर्क
- प्रेमिका पति की ‘रिश्तेदार’ नहीं: सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसलों का हवाला देते हुए जस्टिस एम. नागप्रसन्ना ने कहा:“सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्थापित कानून के आलोक में, यदि वर्तमान मामले के तथ्यों को देखें, तो मुख्य आरोपी (पति) की प्रेमिका को पति का रिश्तेदार नहीं माना जा सकता।” — कर्नाटक हाईकोर्ट
- BNS की धारा 85 (IPC 498A) के तहत अपराध नहीं बनता: अदालत ने कहा कि धारा 85 केवल पति या उसके रिश्तेदारों पर लागू होती है। चूंकि प्रेमिका पारिवारिक या वैवाहिक रूप से पति की रिश्तेदार नहीं है, इसलिए उस पर पत्नी के प्रति क्रूरता करने या दहेज की मांग करने का आरोप नहीं लगाया जा सकता।
- अन्य आरोपों का निरस्तीकरण: शिकायतकर्ता (पत्नी) ने प्रेमिका पर क्रूरता के अलावा हमले, जानबूझकर अपमान करने, आपराधिक धमकी और दहेज की मांग से जुड़े आरोप भी लगाए थे। हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता के खिलाफ इनमें से कोई भी अपराध सिद्ध या निर्मित नहीं होता है और इसे आपराधिक कार्यवाही का दुरुपयोग माना।
बेंगलुरु: कर्नाटक हाईकोर्ट ने वैवाहिक संबंधों में तीसरे पक्ष की संलिप्तता, भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 85 (विवाहिता के प्रति पति या उसके नातेदार द्वारा क्रूरता / पूर्ववर्ती IPC धारा 498A) के विधिक दायरे और ‘नातेदार’ (Relative) की वैधानिक परिभाषा पर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।
न्यायमूर्ति एम. नागप्रसन्ना की एकल पीठ ने याचिकाकर्ता महिला (पति की कथित प्रेमिका) द्वारा दायर याचिका को स्वीकार करते हुए उसके खिलाफ अधीनस्थ अदालत में लंबित सभी आपराधिक कार्यवाहियों और संज्ञान आदेश को पूरी तरह निरस्त (Quash) कर दिया। अदालत ने स्पष्ट रूप से व्यवस्था दी है कि किसी विवाहित पुरुष की प्रेमिका (Girlfriend/Paramour) को कानून की दृष्टि में पति का ‘नातेदार’ नहीं माना जा सकता; अतः उस पर पत्नी के साथ क्रूरता करने का आरोप लगाकर BNS की धारा 85 के तहत आपराधिक मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।
उच्च न्यायालय के प्रमुख अवलोकन एवं विधिक निष्कर्ष
1. ‘प्रेमिका पति की नातेदार नहीं हो सकती’: सुप्रीम कोर्ट के सिद्धांत का अनुपालन न्यायमूर्ति एम. नागप्रसन्ना ने कानून के स्थापित सिद्धांतों का विश्लेषण करते हुए अपने आदेश में दर्ज किया: “सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रतिपादित विधि के आधार पर यदि प्रस्तुत मामले के तथ्यों का अवलोकन किया जाए, तो पति (अभियुक्त संख्या 1) की प्रेमिका को पति का ‘नातेदार’ (Relative of the husband) नहीं कहा जा सकता। कानून पूरी तरह स्थापित है कि किसी विवाहित पुरुष की प्रेमिका पर भारतीय न्याय संहिता की धारा 85 के तहत पत्नी के प्रति क्रूरता के अपराध का आरोप नहीं लगाया जा सकता, क्योंकि वह पति की रिश्तेदार नहीं है।”
2. सुप्रीम कोर्ट के ‘देचम्मा’ निर्णय पर पूर्ण भरोसा उच्च न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के बाध्यकारी निर्णय देचम्मा आई.एम. उर्फ देचम्मा कौशिक बनाम कर्नाटक राज्य पर मुख्य रूप से भरोसा जताया।
- शीर्ष अदालत ने उक्त निर्णय में स्पष्ट किया था कि किसी विवाहित पुरुष की प्रेमिका या महिला मित्र को विवाह, रक्त संबंध या गोद लेने के कानूनी दायरे में नहीं लाया जा सकता, और इसलिए वह धारा 498A IPC (अब BNS धारा 85) के प्रयोजनार्थ पति की ‘नातेदार’ की परिभाषा में शामिल नहीं होती।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं शिकायत के आरोप
- ट्रायल कोर्ट द्वारा संज्ञान: पीड़ित पत्नी ने शिकायत दर्ज कराई थी कि याचिकाकर्ता महिला (पति की प्रेमिका) ने उसके वैवाहिक जीवन को बर्बाद किया, उसे धमकाया और उसके साथ दुर्व्यवहार किया। अधीनस्थ अदालत ने इस शिकायत पर संज्ञान ले लिया था, जिसके खिलाफ याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
- लगाए गए आरोप:
- विवाहिता के प्रति क्रूरता (भारतीय न्याय संहिता की धारा 85 / पूर्ववर्ती IPC 498A)
- हमला या आपराधिक बल का प्रयोग (BNS धारा 115/351)
- जानबूझकर अपमान और शांति भंग करने का इरादा (BNS धारा 352 / पूर्ववर्ती IPC 504)
- आपराधिक धमकी (Criminal Intimidation – BNS धारा 351 / पूर्ववर्ती IPC 506)
- दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961 (Dowry Prohibition Act, 1961) के तहत दहेज लेने का आरोप।
- हाईकोर्ट का निष्कर्ष: अदालत ने रिकॉर्ड का परीक्षण करने के बाद पाया कि याचिकाकर्ता के खिलाफ इनमें से कोई भी अपराध प्रथम दृष्टया सिद्ध नहीं होता है और दहेज या क्रूरता के आरोप उस पर कानूनी रूप से लागू ही नहीं होते। अतः कार्यवाही जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: आपराधिक याचिका (आपराधिक कार्यवाही रद्द करने हेतु) – कर्नाटक उच्च न्यायालय
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ता (प्रेमिका) की ओर से: अधिवक्ता गगनदीप ई. एवं अजित पी.बी.
- राज्य सरकार की ओर से: हाईकोर्ट सरकारी प्लीडर (HCGP) रश्मि पटेल
- प्रतिवादी (पत्नी) की ओर से: अधिवक्ता पी.एम. गोपी
- प्रासंगिक कानून एवं धाराएं:
- भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 85 (पति या उसके नातेदार द्वारा महिला को क्रूरता का शिकार बनाना / पूर्ववर्ती IPC धारा 498A)
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 528 / पूर्ववर्ती CrPC धारा 482 (कार्यवाही रद्द करने की अंतर्निहित शक्ति)
- दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961 (Dowry Prohibition Act, 1961) की धारा 3 एवं 4
- संबद्ध ऐतिहासिक न्यायिक नजीरें:
- देचम्मा आई.एम. उर्फ देचम्मा कौशिक बनाम कर्नाटक राज्य (सुप्रीम कोर्ट) — ‘विवाहित पुरुष की महिला मित्र या प्रेमिका IPC 498A के तहत पति की “नातेदार” नहीं हो सकती।’
- यू. सुवेंद्रा बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (2009, सुप्रीम कोर्ट) एवं विजया राव बनाम राज्य (सुप्रीम कोर्ट) — ‘आईपीसी की धारा 498A में प्रयुक्त शब्द “Relative” (नातेदार) का अर्थ केवल रक्त संबंध, विवाह या विधिक दत्तक ग्रहण से संबंधित व्यक्ति ही हो सकता है; कोई भी गैर-विवाहित साथी इस दायरे में नहीं आता।’
- पीठ: न्यायमूर्ति एम. नागप्रसन्ना (कर्नाटक उच्च न्यायालय)
- अंतिम परिणाम: याचिका मंजूर; याचिकाकर्ता के विरुद्ध दर्ज आपराधिक कार्यवाही पूरी तरह रद्द।
Husband’s Girlfriend: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | कर्नाटक उच्च न्यायालय (Karnataka High Court) |
| एकल पीठ न्यायाधीश | न्यायमूर्ति एम. नागप्रसन्ना (Justice M Nagaprasanna) |
| याचिकाकर्ता | पति की प्रेमिका/गर्लफ्रेंड |
| संबंधित धाराएं | BNS की धारा 85 (महिला के प्रति क्रूरता) और दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961 |
| मुख्य कानूनी आधार | सर्वोच्च न्यायालय का डेचम्मा बनाम कर्नाटक राज्य (Dechamma v. State of Karnataka) फैसला |
| हाईकोर्ट का अंतिम आदेश | प्रेमिका के खिलाफ सभी आपराधिक कार्यवाहियों और आरोपों को रद्द किया गया |

