Judicial Infrastructure: सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा, अदालतों में बुनियादी ढांचे का विकास कोई लक्जरी या विलासिता की सुविधा नहीं है, बल्कि यह जिला न्यायालयों के सुचारू और प्रभावी कामकाज के लिए एक अनिवार्य घटक है।
सरकार को सब-डिवीजनल और जिला स्तर पर अदालती ढांचे को मजबूत करना जरूरी
चंडीगढ़ जिला न्यायालय परिसर में एक बहु-स्तरीय पार्किंग सुविधा (Multi-level Parking Facility) के उद्घाटन के अवसर पर भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने देश की न्यायिक अधोसंरचना को लेकर एक बेहद व्यावहारिक और महत्वपूर्ण विधिक दृष्टिकोण साझा किया। कहा, यदि कोई वकील सुबह कोर्ट आते समय इस बात से तनाव में है कि वह अपनी गाड़ी कहां पार्क करे, तो वह केस की बहस, गवाहों के प्रतिपरीक्षण (Cross-Examination) या कानूनी ड्रॉफ्टिंग पर अपना पेशेवर ध्यान कैसे केंद्रित कर पाएगा? सरकारों को सब-डिवीजनल और जिला स्तर पर अदालती ढांचे को मजबूत करना ही होगा। गरिमामयी समारोह में पंजाब के राज्यपाल गुलाब चंद कटारिया और सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस ए.जी. मसीह एवं जस्टिस शील नागू भी उपस्थित थे।
अस्पतालों की तरह डिजाइन हों देश के कोर्ट परिसर
सीजेआई सूर्यकांत ने चंडीगढ़ को अपनी ‘कर्मभूमि’ बताते हुए इस उद्घाटन को एक भावुक क्षण कहा। उन्होंने अदालती परिसरों के आधुनिकीकरण पर जोर दिया।
बुनियादी सुविधाएं आवश्यक: अपने कार्यकाल की शुरुआत से ही वह इस बात के प्रबल पक्षधर रहे हैं कि चाहे जिला न्यायालय हों या उच्च न्यायालय, उनका ढांचा और डिजाइन अस्पतालों की तर्ज पर होना चाहिए।
न्याय का सम्मान: अदालत में न्याय की आस लेकर आने वाले हर आम नागरिक और मुवक्किल (Litigant) को वहां बुनियादी सुविधाएं और आवश्यक नागरिक सहूलियतें मिलनी चाहिए। इंफ्रास्ट्रक्चर समाज की रीढ़ होता है, जिसके बिना किसी भी आधुनिक शहर का सर्वाइवल संकट में पड़ सकता है।
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इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी: न्यायिक अधिकारियों की भर्ती में बड़ा रोड़ा
मुख्य न्यायाधीश ने पंजाब और हरियाणा में सब-डिवीजनल स्तर पर वकीलों (Bars) की बढ़ती संख्या और जजों की भारी मांग की ओर इशारा करते हुए एक कड़वी हकीकत बयां की। कहा, आपने ध्यान दिया होगा कि हर साल नियमित भर्ती प्रक्रिया के बावजूद हम न्यायिक अधिकारियों (Judicial Officers) के सभी पदों को नहीं भर पाते हैं। इसका एक सबसे बड़ा व्यावहारिक कारण यह है कि यदि हम जजों की नियुक्ति कर भी दें, तो क्या हमारे पास उनके बैठने के लिए अदालती ढांचा उपलब्ध है? अगर कोर्टरूम ही नहीं होंगे, तो न्यायिक अधिकारी की नियुक्ति का क्या लाभ होगा? उन्होंने स्पष्ट किया कि जिला न्यायपालिका में पदों को बढ़ाने, भर्ती प्रक्रियाओं में तेजी लाने और समय पर न्याय सुनिश्चित करने के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करना पहली शर्त है।
मुकदमों का बढ़ता ग्राफ: सुप्रीम कोर्ट में 1 लाख का आंकड़ा छूने की उम्मीद
अदालतों पर बढ़ते मुकदमों के बोझ को साझा करते हुए सीजेआई ने सुप्रीम कोर्ट के आंकड़े पेश किए।
वर्ष 2024: सुप्रीम कोर्ट में लगभग 75,000 नए मामले दर्ज किए गए।
वर्ष 2025: यह संख्या बढ़कर करीब 80,000 से 83,000 के बीच पहुंच गई।
वर्ष 2026 (वर्तमान स्थिति): इस साल यह आंकड़ा 1,000,000 (एक लाख) को पार करने की संभावना है।
जजों की संख्या में वृद्धि: इस भारी दबाव को देखते हुए सीजेआई ने केंद्र सरकार से अनुरोध किया था, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट में जजों की स्वीकृत संख्या को 34 से बढ़ाकर 38 कर दिया गया है।
‘लंबित मामलों’ (Arrears) पर CJI का विधिक स्पष्टीकरण
देश में मुकदमों के पेंडिंग होने (Backlog) को लेकर चल रहे विमर्श पर सीजेआई सूर्यकांत ने एक बेहद तार्किक और विधिक रुख अपनाया।
प्रक्रियात्मक पेंडेंसी बैकलॉग नहीं: सीजेआई ने स्पष्ट किया कि वह 1 करोड़ से अधिक मामलों के लंबित होने के दावों को पूरी तरह स्वीकार नहीं करते।
प्राकृतिक न्याय का सिद्धांत: जब कोई केस फाइल होता है, तो प्रक्रियात्मक आवश्यकताओं (Procedural Requirements) और प्राकृतिक न्याय के चलते उसे उसी दिन निपटाया नहीं जा सकता। नोटिस जारी करना, जवाब दाखिल करना, सिविल मुकदमों में मुद्दे (Issues) तय करना और दोनों पक्षों को सबूत पेश करने का मौका देना कानूनन अनिवार्य है।
कानूनी प्रक्रिया का सम्मान: सीजेआई के अनुसार, जो मामले इस कानूनी प्रक्रिया से गुजर रहे हैं, उन्हें ‘अति-लंबित बोझ’ या ‘बकाया’ (Arrears) नहीं माना जाना चाहिए। यह पेंडेंसी कानून के शासन को बनाए रखने के लिए आवश्यक है, हालांकि इसके लिए अदालतों को अतिरिक्त अधिकारियों और मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर की सख्त जरूरत है।
न्यायपालिका में टेक्नोलॉजी और AI का इस्तेमाल: हम वैश्विक लीडर
बाद में पत्रकारों से बातचीत के दौरान, तकनीकी सुधारों पर बात करते हुए मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि भारतीय न्यायपालिका तकनीकी विकास और एडॉप्टेशन के मामले में दुनिया के कई देशों से काफी आगे है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के उपयोग पर उन्होंने स्पष्ट किया कि न्यायपालिका में एआई का उपयोग पूरी तरह से नियामक उपायों (Regulatory Measures) के तहत किया जाएगा। उन्होंने बताया कि सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर बकायदा एआई रेगुलेशन अपलोड किए जा चुके हैं, जिसके माध्यम से यह समझा जा सकता है कि अदालतें तकनीकी सुरक्षा और सीमाओं को ध्यान में रखकर किस तरह एआई का विस्तार कर रही हैं।
विधिक फैक्ट शीट: चंडीगढ़ न्यायिक बुनियादी ढांचा सम्मेलन (2026)
| न्यायिक और प्रशासनिक श्रेणियां | मुख्य विधिक बिंदु और आधिकारिक आंकड़े |
| समारोह का उद्देश्य | जिला अदालत परिसर, चंडीगढ़ में बहु-स्तरीय पार्किंग का उद्घाटन |
| मुख्य वक्ता | जस्टिस सूर्यकांत, भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) |
| उपस्थित विधिक प्राधिकारी | जस्टिस ए.जी. मसीह, जस्टिस शील नागू (माननीय सुप्रीम कोर्ट जज) |
| सर्वोच्च न्यायालय जज क्षमता | मुकदमों के बोझ को देखते हुए स्वीकृत संख्या 34 से बढ़ाकर 38 की गई |
| सुप्रीम कोर्ट केस फाइलिंग (2026) | इस वर्ष नए मुकदमों की संख्या 1 लाख पार होने का अनुमान |
| तकनीकी विधिक रुख | एआई का विनिमय (AI Regulations) आधिकारिक रूप से लागू |
इसके साथ ही, तकनीकी मोर्चे पर एआई रेगुलेशन के माध्यम से कदम आगे बढ़ाना यह दिखाता है कि भारतीय न्यायपालिका आधुनिकता को स्वीकार करने के साथ-साथ उसकी विधिक सुरक्षा को लेकर भी उतनी ही मुस्तैद है।

