फोर्टिस (Fortis) क्यों फंसी और फॉरेंसिक ऑडिट की जरूरत क्या है?
दाइची सैंक्यो अब ₹3,500 करोड़ की रकम वसूलने (Enforcement of Award) के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रही है। आरोप है कि सिंह बंधुओं ने अपनी संपत्तियों और शेयरों को ऐसी कंपनियों (जैसे फोर्टिस) के ज़रिए इधर-उधर स्थानांतरित (Asset Dissipation) किया, ताकि मुआवजा न चुकाना पड़े।
दिल्ली हाईकोर्ट के 213 पन्नों के आदेश के अनुसार फॉरेंसिक ऑडिटर निम्नलिखित की जांच करेगा:
- फोर्टिस, सिंह बंधुओं और अन्य संबंधित संस्थाओं के बीच लेन-देन का पूरा ढांचा पुनर्गठित करना।
- संपत्तियों और शेयरों के कथित हस्तांतरण/नुकसान की पहचान करना।
- दाइची को मुआवजे की वसूली योग्य संपत्तियों का पता लगाने में मदद करना।
अदालत में दलीलें और सुप्रीम कोर्ट का रुख
- फोर्टिस की दलील (वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी): फोर्टिस कभी भी सिंगापुर में हुई मध्यस्थता कार्यवाही का हिस्सा नहीं थी और वह कोई “देनदार” (Judgment Debtor) नहीं है। इसके अलावा, सिंह बंधु 2018 में ही फोर्टिस से बाहर हो चुके हैं और मलेशियाई हेल्थकेयर ग्रुप IHH ने फोर्टिस में ₹4,000 करोड़ का नया निवेश किया है।
- सुप्रीम कोर्ट का निष्कर्ष: पीठ ने कहा, “हमें दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं दिखता।” हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह साफ किया कि दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा फोर्टिस के खिलाफ की गई टिप्पणियां केवल प्रारंभिक हैं और इसका मतलब यह नहीं है कि फोर्टिस को अंतिम रूप से देनदार ठहरा दिया गया है।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने जापानी दवा निर्माता दिग्गज दायची सैंक्यो (Daiichi Sankyo) और रैनबैक्सी के पूर्व प्रमोटरों—मालविंदर मोहन सिंह एवं शिविंदर मोहन सिंह (सिंह बंधु)—के बीच ₹3,500 करोड़ के अंतरराष्ट्रीय पंचाट निर्णय (Arbitral Award) के निष्पादन मामले में फोर्टिस हेल्थकेयर लिमिटेड को बड़ा झटका दिया है।
मुख्य न्यायाधीश (CJI) न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ ने 25 सितंबर 2026 को फोर्टिस की विशेष अनुमति याचिका (SLP) को खारिज कर दिया। हालांकि, शीर्ष अदालत ने यह स्पष्ट किया कि दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा फॉरेंसिक ऑडिट का निर्देश देते समय फोर्टिस के खिलाफ की गई टिप्पणियां केवल अनंतिम (Tentative) और प्रथम दृष्टया (Prima Facie) हैं, और वे सिंह बंधुओं के दायित्वों के लिए फोर्टिस पर अंतिम देनदारी का गठन नहीं करती हैं। शीर्ष अदालत ने दिल्ली उच्च न्यायालय के उस आदेश में हस्तक्षेप करने से साफ इनकार कर दिया है, जिसके तहत फोर्टिस हेल्थकेयर और सिंह बंधुओं से जुड़ी कंपनियों के वित्तीय लेन-देन, संपत्तियों के कथित हेरफेर और ‘कॉर्पोरेट वील’ (Corporate Veil) के परीक्षण के लिए स्वतंत्र फॉरेंसिक ऑडिट का आदेश दिया गया था।
सुप्रीम कोर्ट का आदेश और विधिक स्थिति
पीठ ने दिल्ली हाईकोर्ट के 31 अगस्त के 213-पृष्ठों के विस्तृत आदेश का संज्ञान लेते हुए कहा: “हमें दिल्ली उच्च न्यायालय के आक्षेपित निर्णय में हस्तक्षेप करने का कोई ठोस कारण नजर नहीं आता।”
सर्वोच्च न्यायालय के इस रुख का व्यावहारिक और कानूनी प्रभाव यह है:
- फॉरेंसिक ऑडिट निर्बाध जारी रहेगा: अदालत द्वारा नियुक्त फॉरेंसिक ऑडिटर मेसर्स एस. रामानंद अय्यर एंड कंपनी (S Ramanand Aiyar & Co) निर्धारित छह महीने की समय-सीमा के भीतर फोर्टिस और सिंह बंधुओं से संबंधित वित्तीय लेन-देन की गहन पड़ताल पूरी करेगा।
- प्रथम दृष्टया टिप्पणियों का सीमित दायरा: शीर्ष अदालत की इस स्पष्टोक्ति ने फोर्टिस को यह कानूनी सुरक्षा दी है कि ऑडिट का आदेश स्वतः ही कंपनी को आर्बिट्रल अवार्ड का “जजमेंट डेटर” (Judgment Debtor) या देनदार नहीं बना देता; अंतिम दायित्व फॉरेंसिक रिपोर्ट के निष्कर्षों और अदालत के अंतिम परीक्षण पर निर्भर करेगा।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि: 2008 से 2026 तक का विवाद
- 2008 में रैनबैक्सी का अधिग्रहण: दायची सैंक्यो ने वर्ष 2008 में सिंह बंधुओं से रैनबैक्सी लेबोरेटरीज में बहुमत हिस्सेदारी का सौदा किया था।
- नियामकीय जांच छिपाने का आरोप: जापानी कंपनी ने बाद में आरोप लगाया कि सिंह बंधुओं ने शेयर बिक्री समझौते के दौरान अमेरिकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन (US FDA) और अमेरिकी न्याय विभाग (DOJ) द्वारा रैनबैक्सी की दवाओं व निर्माण इकाइयों के खिलाफ चल रही गंभीर जांच के तथ्यों को जानबूझकर छिपाया (Material Concealment)।
- 2016 का सिंगापुर आर्बिट्रल अवार्ड: दायची ने अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता शुरू की, जिसमें सिंगापुर ट्रिब्यूनल ने 2016 में सिंह बंधुओं को दायची को क्षतिपूर्ति के रूप में लगभग ₹3,500 करोड़ का भुगतान करने का फैसला सुनाया।
- भारतीय अदालतों में पुष्टि: दिल्ली उच्च न्यायालय ने 31 जनवरी 2018 को इस विदेशी पंचाट को भारत में लागू करने योग्य माना। 16 फरवरी 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने भी सिंह बंधुओं की अपील खारिज कर इस अवार्ड के निष्पादन पर अंतिम मुहर लगा दी।
फोर्टिस हेल्थकेयर क्यों आई जांच के घेरे में?
जब दायची सैंक्यो ने अवार्ड की वसूली के लिए निष्पादन याचिका (Execution Petition) दायर की, तो उसने आरोप लगाया कि सिंह बंधुओं ने अवार्ड के भुगतान से बचने के लिए अपनी संपत्ति, शेयरधारिता और फोर्टिस हेल्थकेयर के फंड को जटिल शैल कंपनियों और संबंधित संस्थाओं (Related Entities) के माध्यम से खुर्द-बुर्द (Asset Dissipation) कर दिया।
फॉरेंसिक ऑडिट का दायरा (Scope of Forensic Audit): दिल्ली हाईकोर्ट ने छह महीने के भीतर निम्नलिखित बिंदुओं पर स्वतंत्र जांच का आदेश दिया:
- फोर्टिस हेल्थकेयर, सिंह बंधुओं और उनसे जुड़ी अन्य कंपनियों के बीच हुए सभी संदिग्ध लेन-देन का सूक्ष्म परीक्षण।
- धन और संपत्तियों के हस्तांतरण की पूरी श्रृंखला (Chain of Transactions) का पुनर्निर्माण।
- इसमें शामिल व्यक्तियों, प्रमोटरों, निदेशकों और शैल कंपनियों की पहचान।
- फोर्टिस के शेयरों और परिसंपत्तियों के कथित डायवर्जन/हेरफेर की पड़ताल, ताकि यह तय हो सके कि दायची के अवार्ड को संतुष्ट करने के लिए कौन-सी संपत्तियां कुर्क की जा सकती हैं।
फोर्टिस की दलीलें और सुप्रीम कोर्ट में बचाव
फोर्टिस हेल्थकेयर की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने दलील दी:
- आर्बिट्रेशन का पक्षकार नहीं: फोर्टिस कभी भी सिंगापुर में चली मध्यस्थता कार्यवाही का पक्षकार नहीं थी और न ही अवार्ड उसके खिलाफ पारित हुआ है; इसलिए कंपनी को डिक्री देनदार (Judgment Debtor) नहीं माना जा सकता।
- प्रमोटरों का निकास और नया प्रबंधन: सिंह बंधु वर्ष 2018 में ही फोर्टिस के प्रमोटर पद और प्रबंधन से बाहर हो चुके थे। इसके बाद मलेशियाई हेल्थकेयर ग्रुप IHH हेल्थकेयर ने कंपनी में लगभग ₹4,000 करोड़ का नया निवेश कर नियंत्रण अपने हाथ में लिया था। निर्दोष सार्वजनिक शेयरधारकों और नए प्रबंधन को पुराने प्रमोटरों के निजी दायित्वों के लिए दंडित नहीं किया जाना चाहिए।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: फोर्टिस हेल्थकेयर लिमिटेड बनाम दायची सैंक्यो कंपनी लिमिटेड, मालविंदर मोहन सिंह, शिविंदर मोहन सिंह व अन्य [विशेष अनुमति याचिका (सिविल) – भारत का सर्वोच्च न्यायालय]
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ता (फोर्टिस) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- मध्यस्थता एवं सुलह अधिनियम, 1996 (Arbitration and Conciliation Act, 1996) का भाग II (न्यूयॉर्क कन्वेंशन अवार्ड्स का प्रवर्तन – धारा 47 से 49)
- सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) का आदेश XXI (डिक्री और आदेशों का निष्पादन / Execution of Decrees)
- कंपनी अधिनियम, 2013 — ‘कॉर्पोरेट आवरण उठाना’ (Lifting of Corporate Veil)
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 136 (सर्वोच्च न्यायालय का विशेष अनुमति क्षेत्राधिकार)
- संबद्ध ऐतिहासिक न्यायिक नजीरें:
- वोडाफोन इंटरनेशनल होल्डिंग्स बनाम भारत संघ (2012, सुप्रीम कोर्ट) एवं एसोसिएटेड वेंडर्स केस — ‘धोखाधड़ी या लेनदारों के अधिकारों से बचने के लिए स्थापित शैल कंपनियों और फंड के डायवर्जन की जांच के लिए अदालतें कॉर्पोरेट आवरण हटाने और फॉरेंसिक ऑडिट का आदेश दे सकती हैं।’
- दायची सैंक्यो कंपनी लिमिटेड बनाम मालविंदर मोहन सिंह व अन्य (2018, दिल्ली हाईकोर्ट/सुप्रीम कोर्ट) — ‘विदेशी आर्बिट्रल अवार्ड को निष्पादित करने के लिए संपत्तियों की ट्रेसिंग (Asset Tracing) का व्यापक अधिकार अदालत को प्राप्त है।’
- पीठ: मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना (सर्वोच्च न्यायालय)
- अंतिम परिणाम: फोर्टिस की अपील खारिज; दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा नियुक्त ऑडिटर का फॉरेंसिक ऑडिट जारी रहेगा।
Fortis Healthcare: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| मुख्य पक्षकार | फोर्टिस हेल्थकेयर बनाम दाइची सैंक्यो (Daiichi Sankyo) व मालविंदर/शिविंदर सिंह |
| विवाद का मूल | वर्ष 2008 में रैनबैक्सी (Ranbaxy) कंपनी की बिक्री से जुड़ा ₹3,500 करोड़ का मध्यस्थता पुरस्कार (Arbitral Award) |
| फॉरेंसिक ऑडिटर | एस. रामानंद अय्यर एंड कंपनी (S. Ramanand Aiyar & Co. – समय सीमा: 6 महीने) |
| सुप्रीम कोर्ट का रुख | दिल्ली हाईकोर्ट के फॉरेंसिक ऑडिट आदेश में हस्तक्षेप से इनकार; ऑडिट जारी रहेगा। |

