अदालत ने पुलिस की पिछली रिपोर्ट क्यों खारिज की?
- शिकायतकर्ता को सबूत देने का मौका नहीं मिला:अदालत ने पाया कि जांच अधिकारी (IO) ने शिकायतकर्ता महमूद प्राचा का औपचारिक बयान दर्ज किए बिना और उन्हें अपने सबूत पेश करने का उचित अवसर दिए बिना ही पिछली ATR दाखिल कर दी थी।
- प्रारंभिक जांच (Preliminary Inquiry) का अभाव:मजिस्ट्रेट कौतुक भारद्वाज ने स्पष्ट किया कि शिकायतकर्ता का परीक्षण किए बिना और पेश किए गए दस्तावेजों की जांच किए बिना दाखिल की गई पुलिस रिपोर्ट कानूनन अधूरी और अमान्य है।
नई दिल्ली: राष्ट्रीय राजधानी की राउज एवेन्यू/पटियाला हाउस जिला अदालत ने भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के अधिकारियों के खिलाफ मतदाता सूचियों में कथित हेरफेर, फर्जी मतदान (Bogus Voting) की सुविधा देने और वैध मतदाताओं को सूची से गैर-कानूनी ढंग से बाहर करने के आरोपों पर दिल्ली पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। अदालत ने पार्लियामेंट स्ट्रीट पुलिस थाने के जांच अधिकारी (IO) द्वारा पूर्व में दाखिल ‘एक्शन टेकन रिपोर्ट’ (ATR) में गंभीर प्रक्रियात्मक खामियां पाते हुए उसे खारिज कर दिया और पुलिस को शिकायतकर्ता का विधिवत परीक्षण कर नए सिरे से जांच रिपोर्ट (Fresh Investigation/Action Taken Report) दाखिल करने का सख्त निर्देश दिया है।
प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट (JMFC) कौतुक भारद्वाज ने वरिष्ठ अधिवक्ता महमूद प्राचा द्वारा दायर आपराधिक शिकायत पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया। अदालत ने स्पष्ट रूप से रेखांकित किया कि किसी भी आपराधिक परिवाद पर पुलिस शिकायतकर्ता को अपने साक्ष्य पेश करने का उचित अवसर दिए बिना या बिना कोई प्रारंभिक जांच (Preliminary Inquiry) किए महज औपचारिक क्लोजर या खानापूर्ति वाली एटीआर दाखिल नहीं कर सकती।
अदालत के प्रमुख अवलोकन एवं प्रक्रियात्मक निर्देश
1. ‘शिकायतकर्ता के परीक्षण के बिना ATR कैसे दाखिल हो सकती है?’: अदालत की फटकार
न्यायिक मजिस्ट्रेट कौतुक भारद्वाज ने जांच अधिकारी की रिपोर्ट पर शिकायतकर्ता द्वारा दर्ज की गई आपत्तियों का संज्ञान लेते हुए कहा: “शिकायतकर्ता को जांच अधिकारी के समक्ष अपने साक्ष्य और सहायक दस्तावेज प्रस्तुत करने का कोई उचित अवसर प्रदान नहीं किया गया। कोई भी एक्शन टेकन रिपोर्ट (ATR) प्रारंभिक जांच किए बिना अथवा शिकायतकर्ता का औपचारिक परीक्षण (Examination) किए बिना दाखिल नहीं की जा सकती।”
2. नए सिरे से जांच और साक्ष्यों के मिलान का आदेश
- अदालत ने संबंधित जांच अधिकारी (IO) को नोटिस जारी करते हुए निर्देश दिया कि वह शिकायतकर्ता महमूद प्राचा का बयान दर्ज करे और उनके द्वारा सौंपे गए सभी दस्तावेजी व डिजिटल साक्ष्यों का सूक्ष्मता से परीक्षण करे।
- जांच अधिकारी को निर्देश दिया गया है कि वह इन सभी साक्ष्यों के विश्लेषण के बाद एक विस्तृत और तथ्यात्मक रूप से पुख्ता ‘फ्रेश एटीआर’ अदालत में पेश करे।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं शिकायत में लगाए गए गंभीर आरोप
- 2025 में दायर आपराधिक परिवाद: वरिष्ठ अधिवक्ता महमूद प्राचा ने वर्ष 2025 में निर्वाचन आयोग के अधिकारियों के विरुद्ध आपराधिक साजिश और चुनावी हेराफेरी का आरोप लगाते हुए यह परिवाद दाखिल किया था।
- लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम और ERO हैंडबुक का उल्लंघन:
- शिकायत में आरोप लगाया गया है कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सहित देश के कई राज्यों में चुनाव आयोग के अधिकारियों ने लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 और निर्वाचक पंजीकरण अधिकारियों के लिए जारी सांविधिक ‘हैंडबुक फॉर इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर्स (ERO Handbook, 2023)’ के अनिवार्य नियमों का खुला उल्लंघन किया।
- फर्जी वोटिंग, डुप्लीकेट प्रविष्टियां और वैध मतदाताओं का बहिष्कार:
- शिकायतकर्ता के अनुसार, अधिकारियों की मिलीभगत से मतदाता सूचियों में जानबूझकर डुप्लीकेट और फर्जी मतदाताओं के नाम बनाए रखे गए, जिससे बोगस वोटिंग को बढ़ावा मिला।
- इसके विपरीत, लाखों पात्र और वैध नागरिकों के नाम बिना किसी कानूनी नोटिस या सत्यापन के मतदाता सूचियों से गैर-कानूनी ढंग से काट दिए गए (Deliberate Exclusion)।
- सरकारी धन के दुरुपयोग का आरोप: शिकायत में यह गंभीर आरोप भी शामिल है कि मतदाता सूचियों की तैयारी, डिजिटलीकरण और पुनरीक्षण के लिए आवंटित सार्वजनिक धन में कथित रूप से वित्तीय हेराफेरी व गबन (Misappropriation of funds) किया गया।
किन अपराधों के तहत कार्रवाई की मांग?
याचिकाकर्ता ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 175(3) [पूर्ववर्ती CrPC धारा 156(3)] के तहत आवेदन प्रस्तुत कर दोषी चुनाव अधिकारियों के खिलाफ नियमित एफआईआर (FIR) दर्ज कर जांच की मांग की है। परिवाद में निम्नलिखित धाराओं के तहत संज्ञान लेने का अनुरोध किया गया है:
- लोक सेवक द्वारा आपराधिक विश्वासघात (Criminal Breach of Trust by Public Servant)
- धोखाधड़ी (Cheating)
- सार्वजनिक दस्तावेजों में जालसाजी व कूटकरण (Forgery of Public Records)
- आपराधिक षड्यंत्र (Criminal Conspiracy)
- लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 एवं 1951 के तहत आधिकारिक कर्तव्य के उल्लंघन से संबंधित दंडात्मक प्रावधान।
विधिक विवरण
- अदालत: न्यायालय, प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट (JMFC) कौतुक भारद्वाज, नई दिल्ली
- थाना क्षेत्र: पार्लियामेंट स्ट्रीट पुलिस स्टेशन, नई दिल्ली
- शिकायतकर्ता: वरिष्ठ अधिवक्ता महमूद प्राचा
- प्रासंगिक कानून एवं प्रक्रियात्मक प्रावधान:
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 175(3) [पूर्ववर्ती CrPC धारा 156(3) – मजिस्ट्रेट द्वारा पुलिस जांच का निर्देश]
- लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 32 (मतदाता सूची निर्माण में आधिकारिक कर्तव्य का जानबूझकर उल्लंघन)
- लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 एवं ERO हैंडबुक (2023 दिशानिर्देश)
- भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की जालसाजी, धोखाधड़ी और साजिश से जुड़ी धाराएं
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत व नजीरें:
- सकीरी वासु बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (सुप्रीम कोर्ट) — ‘मजिस्ट्रेट के पास पुलिस जांच की निगरानी करने और असंतोषजनक या अधूरी रिपोर्ट आने पर दोबारा उचित व निष्पक्ष जांच का आदेश देने की अंतर्निहित शक्तियां हैं।’
- प्रियंका श्रीवास्तव बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (सुप्रीम कोर्ट) — ‘धारा 156(3) / 175(3) के तहत पुलिस जांच का आदेश देने से पहले मजिस्ट्रेट द्वारा सामग्री की प्राथमिक न्यायिक छानबीन और शिकायतकर्ता के साक्ष्यों का परीक्षण अनिवार्य है।’
- वर्तमान स्थिति व अगली सुनवाई: अदालत ने मामले को अगली सुनवाई के लिए 11 नवंबर 2026 को सूचीबद्ध किया है, जिस दिन पुलिस को अपनी नई और पूर्ण जांच रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी.
Voter List: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | दिल्ली की अदालत (पटियाला हाउस/न्यायिक मजिस्ट्रेट कोर्ट) |
| न्यायाधीश | न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी कौतुक भारद्वाज |
| शिकायतकर्ता | वरिष्ठ अधिवक्ता महमूद प्राचा (Senior Advocate Mehmood Pracha) |
| मुख्य आरोप | फर्जी मतदान को बढ़ावा देना, योग्य मतदाताओं को मतदाता सूची से गैर-कानूनी तरीके से हटाना |
| संबंधित कानून | लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (Representation of the People Act, 1951) और BNSS |
| अगली सुनवाई | 11 नवंबर |

