Tuesday, October 27, 2026
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Gyanesh Kumar: SIR विवाद…हमें सब कुछ ज्ञात है, हम परीक्षण करेंगे; कानून का उल्लंघन हुआ तो फैसले रद्द करने में नहीं हिचकिचाएंगे

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मामले की पृष्ठभूमि: विवाद की मुख्य जड़ क्या है?

  1. ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट और असहमति के आरोप:याचिकाओं की पृष्ठभूमि ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की उस रिपोर्ट पर आधारित है, जिसमें दावा किया गया था कि SIR प्रक्रिया से जुड़े कम से कम 14 महत्वपूर्ण फैसले चुनाव आयुक्तों—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—की आपत्तियों के बावजूद मुख्य चुनाव आयुक्त द्वारा आयोग के नाम पर लिए गए।
  2. संवैधानिक प्रावधान और 2023 अधिनियम का उल्लंघन:याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि ECI का कामकाज संविधान के अनुच्छेद 324 और मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023 की धारा 18 के तहत निर्धारित बहु-सदस्यीय निकाय के सहयोगात्मक/सर्वसम्मत निर्णय प्रक्रिया के विरुद्ध है।
  3. ECI का जवाबी हलफनामा (Counter-Affidavit):ECI ने आरोपों को खारिज करते हुए हलफनामे में कहा है कि SIR से जुड़े सभी फैसले आयोग द्वारा सर्वसम्मति से लिए गए थे। ECI ने यह भी कहा कि CEC को हटाने की प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत सुप्रीम कोर्ट के जज की तरह ही हो सकती है, इसलिए उन्हें कार्य करने से रोकने की मांग वाली याचिकाएं पोषणीय (Maintainable) नहीं हैं।

अदालत में हुई सुनवाई और मुख्य कानूनी बिंदु

1. “निर्णय प्रक्रिया और फाइल नोटिंग्स को सुरक्षित रखा जाए”:

विपक्ष के नेता राहुल गांधी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी (Abhishek Manu Singhvi) ने कोर्ट से मांग की कि निर्णय प्रक्रिया की पारदर्शिता जांचने के लिए ECI की फाइल नोटिंग्स को सुरक्षित रखने का अंतरिम आदेश पारित किया जाए: “यह पूरा मामला निर्णय लेने की प्रक्रिया, परामर्श और इस बात पर निर्भर करता है कि निर्णय सर्वसम्मत था या नहीं। इसलिए फाइल नोटिंग्स और आंतरिक संचार को सुरक्षित रखा जाना चाहिए।” इस पर CJI सूर्या कांत ने उत्तर दिया: “हम सब जानते हैं, हम इसकी जांच करेंगे।”

2. अंतरिम रोक लगाने से कोर्ट का इंकार:

  • इससे पूर्व की सुनवाई (5 अक्टूबर) में याचिकाकर्ता राकेश सिंह की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने CEC ज्ञानेश कुमार के कामकाज पर रोक लगाने की मांग की थी। पीठ ने इसे खारिज करते हुए टिप्पणी की थी कि बिना दूसरी तरफ को सुने अंतरिम आदेश देने से संस्थागत तंत्र ठप्प हो जाएगा—“फिर देश में चुनाव कौन कराएगा?”

नई दिल्ली: भारत का संविधान के अनुच्छेद 324 (भारत निर्वाचन आयोग का अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण), अनुच्छेद 324(5) (मुख्य चुनाव आयुक्त को सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के समान महाभियोग प्रक्रिया द्वारा ही हटाने की संवैधानिक सुरक्षा), मुख्य चुनाव आयुक्त तथा अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023 की धारा 18 (आयोग की कार्य संचालन प्रक्रिया—सर्वसम्मति अथवा बहुमत से निर्णय की अनिवार्यता), निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 के तहत ‘फॉर्म 6’ (Form 6) का स्वरूप, तथा मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) के दौरान संस्थागत परामर्श प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट में विस्तृत सुनवाई हुई।

सुप्रीम कोर्ट मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन-न्यायाधीशों की विशेष पीठ ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार द्वारा कथित तौर पर दो अन्य चुनाव आयुक्तों—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—की असहमति/आपत्तियों के बावजूद एकतरफा निर्णय लेने के खिलाफ दायर याचिकाओं के पूरे बैच की सुनवाई की।

पीठ ने निर्वाचन आयोग (ECI) द्वारा 26 अक्टूबर को दाखिल किए गए विस्तृत जवाबी हलफनामे पर सभी याचिकाकर्ताओं को प्रत्युत्तर (Rejoinder) दाखिल करने के लिए 10 दिनों की मोहलत देते हुए मामले की अंतिम सुनवाई 17 नवंबर 2026 के लिए निर्धारित की है। अदालत ने राहुल गांधी व विपक्षी दलों द्वारा आंतरिक फाइल नोटिंग्स संरक्षित करने की अर्जी पर टिप्पणी की कि पीठ पूरे मामले से अवगत है और रिकॉर्ड के विधिक परीक्षण के बाद ही निर्णय करेगी।

शीर्ष अदालत में वकीलों की तीखी दलीलें एवं पीठ की टिप्पणियां

1. ‘फाइल नोटिंग्स सुरक्षित की जाएं’: वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और ‘इंडिया’ ब्लॉक के नेताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी ने चुनाव आयोग की आंतरिक निर्णय-प्रक्रिया की प्रामाणिकता जांचने की मांग उठाई: “यह पूरा विवाद आयोग की आंतरिक निर्णय-प्रक्रिया, पारस्परिक विमर्श और इस संवैधानिक तथ्य पर टिका है कि क्या SIR और चुनावी प्रक्रियाओं से जुड़े निर्णय सर्वसम्मत (Unanimous) थे या एकतरफा (Unilateral)। अतः निष्पक्ष न्यायिक समीक्षा सुनिश्चित करने के लिए आयोग की सभी आंतरिक फाइल नोटिंग्स (File Notings) और संचार अभिलेखों को सुरक्षित (Preserved) रखा जाना अनिवार्य है।”

  • CJI सूर्यकांत का सीधा प्रत्युत्तर:“हमें सब कुछ ज्ञात है, हम हर पहलू की बारीकी से जांच और परीक्षण करेंगे (We know everything, we will examine)।”

2. ‘फॉर्म 6 में छेड़छाड़ ECI ने खुद स्वीकार की’: डॉ. मेनका गुरुस्वामी

तृणमूल कांग्रेस (TMC) की सांसद डोला सेन की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. मेनका गुरुस्वामी ने ECI के हलफनामे को याचिकाकर्ताओं के आरोपों की पुष्टि बताया:

  • उन्होंने दलील दी कि चुनाव आयोग ने एक आधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दावा किया था कि सुप्रीम कोर्ट ने संशोधित फॉर्म 6 को मंजूरी दी है, जबकि अदालत ने ऐसा कोई आदेश नहीं दिया था।
  • ECI ने हलफनामे में माना है कि फॉर्म 6 में संशोधन केवल केंद्र सरकार कर सकती है, किंतु ऑनलाइन पोर्टल पर इसे जिस रूप में पेश किया गया, उससे प्रतीत होता है कि बदलाव हुआ है।

3. ECI का पलटवार: ‘अदालत के बाहर के लिए राजनीतिक बयानबाजी’

  • निर्वाचन आयोग की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मनिंदर सिंह ने आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता विधिक तथ्यों के बजाय केवल अदालत के बाहर राजनीतिक संदेश देने के लिए बयानबाजी (Rhetoric) कर रहे हैं। आयोग ने सभी प्रक्रियाएं कानून के दायरे में रहकर पूरी की हैं।

ECI के जवाबी हलफनामे (Counter-Affidavit) के 6 प्रमुख विधिक आधार

आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में विस्तृत बिंदुवार हलफनामा दाखिल कर मुख्य चुनाव आयुक्त को निलंबित करने या कार्य से रोकने की मांग को असंवैधानिक करार दिया:

  1. तीनों SIR आदेश सर्वसम्मत (Unanimous): आयोग ने स्पष्ट किया कि जून 2025, अक्टूबर 2025 और मई 2026 में जारी विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से जुड़े तीनों मूल आदेश मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों चुनाव आयुक्तों (सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी) के हस्ताक्षर व सर्वसम्मति से जारी हुए थे।
  2. आंतरिक नोटिंग्स आयोग का निर्णय नहीं: हलफनामे में स्पष्ट किया गया कि फाइल संचालन के दौरान व्यक्तिगत चुनाव आयुक्तों द्वारा की गई टिप्पणियां, प्रश्न या आपत्तियां केवल आंतरिक विचार-विमर्श (Deliberations) का हिस्सा होती हैं, वे ECI का अंतिम निर्णय नहीं होतीं। फाइल पहले एक चुनाव आयुक्त, फिर दूसरे चुनाव आयुक्त और अंत में CEC के पास जाती है।
  3. फॉर्म 6 और पृथक घोषणापत्र: आयोग ने दोहराया कि फॉर्म 6 को केवल केंद्र सरकार संशोधित कर सकती है। SIR के दौरान लिया जाने वाला घोषणापत्र एक अलग दस्तावेज था। ऑनलाइन प्रदर्शन में भ्रम दूर करने के लिए 21 अक्टूबर से पोर्टल पर फॉर्म 6 और घोषणापत्र को भौतिक प्रारूप की तरह अलग-अलग प्रदर्शित करने की व्यवस्था कर दी गई है।
  4. अनुच्छेद 324(5) के तहत संवैधानिक संरक्षण: आयोग ने दलील दी कि सीईसी ज्ञानेश कुमार को कार्य करने से रोकने (Restrain) या निलंबित करने की मांग कानूनी रूप से विचारणीय नहीं है। संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को केवल उसी रीति और उन्हीं आधारों (संसद द्वारा महाभियोग) पर हटाया जा सकता है, जैसे उच्चतम न्यायालय के किसी न्यायाधीश को हटाया जाता है।
  5. पश्चिम बंगाल की 16.10 लाख अपीलों का औचित्य: पश्चिम बंगाल में SIR के बाद मतदाताओं के नाम शामिल किए जाने के खिलाफ 16.10 लाख अपीलें दायर करने के विवाद पर आयोग ने कहा कि ये अपीलें मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) के अधीनस्थ वैधानिक अधिकारियों ने सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व निर्देशों के अनुपालन में दायर की थीं, यह सीधे आयोग के समक्ष का विषय नहीं था।
  6. 28 जुलाई का कार्य-आवंटन आदेश अप्रभावी: प्रतिनियुक्ति पर आए एक अतिरिक्त सचिव द्वारा जारी विवादित कार्य-आवंटन आदेश के संबंध में दोनों चुनाव आयुक्तों ने कैबिनेट सचिव को पत्र लिखा था। आयोग ने स्पष्ट किया कि 30 जुलाई को चुनाव आयुक्तों के संयुक्त निर्देश के बाद उस आदेश को कभी लागू ही नहीं किया गया।

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (अक्टूबर 2025–2026)

चरण / विवरणतथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे
मूल विवाद का स्रोत‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की एक विस्तृत खोजी रिपोर्ट, जिसमें आरोप लगाया गया कि अक्टूबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच SIR से जुड़े कम से कम 14 महत्वपूर्ण नीतिगत निर्णय मुख्य चुनाव आयुक्त द्वारा दो चुनाव आयुक्तों (सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी) की लिखित असहमति व आपत्तियों के बावजूद आयोग के नाम पर एकतरफा जारी कर दिए गए।
मूल याचिकाकर्ता (Lead Matter)राकेश कुमार सिंह उर्फ राकेश सिंह — W.P.(C) No. 1246/2026 (अधिकार-पृच्छा / Writ of Quo Warranto की मांग)।
अन्य प्रमुख याचिकाकर्ता• राहुल गांधी (नेता प्रतिपक्ष, लोकसभा) व अन्य ‘इंडिया’ ब्लॉक नेता [W.P.(C) No. 1351/2026]।
• डॉला सेन (सांसद, तृणमूल कांग्रेस)।
• असदुद्दीन ओवैसी (सांसद व प्रमुख, AIMIM)।
• दिग्विजय सिंह (वरिष्ठ राजनेता व पूर्व मुख्यमंत्री)।
• अधिवक्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी, ह्यूमन जस्टिस ऑर्गनाइजेशन व प्रिया मिश्रा।
5 अक्टूबर 2026 की सुनवाईवरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने अंतरिम आदेश की मांग करते हुए कहा था कि “अदालत को अंतरिम आदेश देना चाहिए, अन्यथा देश जल जाएगा”। पीठ ने अंतरिम निलंबन से इनकार करते हुए पूछा था कि “यदि हम रोक लगा दें, तो चुनाव कौन कराएगा?” हालांकि, CJI ने स्पष्ट किया था कि “यदि निर्णय प्रक्रिया में सांविधिक नियमों का उल्लंघन पाया गया, तो हम किसी भी अवैध निर्णय को रद्द कर देंगे।”
27 अक्टूबर 2026 का अदालती आदेशसभी याचिकाकर्ताओं को ECI के जवाबी हलफनामे पर प्रत्युत्तर (Rejoinder) दाखिल करने हेतु 10 दिन का समय दिया गया। अगली सुनवाई 17 नवंबर 2026 को सूचीबद्ध की गई।

विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: ‘2023 अधिनियम की धारा 18 बनाम आंतरिक लोकतंत्र’

  • मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023 की धारा 18:
    • धारा 18 यह अनिवार्य करती है कि निर्वाचन आयोग के सभी कार्यों का लेन-देन जहां तक संभव हो सर्वसम्मति (Unanimously) से किया जाएगा।
    • यदि मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों के बीच किसी मामले में मतभेद होता है, तो ऐसे मामले का निर्णय बहुमत की राय (Majority View) के अनुसार किया जाएगा।
    • कानून में कहीं भी यह प्रावधान नहीं है कि मुख्य चुनाव आयुक्त किसी भी नीतिगत या प्रशासनिक फाइल पर दोनों चुनाव आयुक्तों के विचारों की उपेक्षा करके कोई एकतरफा आदेश पारित कर सकें। यदि अभिलेखों से यह सिद्ध होता है कि बहुमत के बिना आदेश जारी हुए, तो वे निर्णय ‘अधिकार-विहीन’ (Ultra Vires) घोषित किए जा सकते हैं।
  • अनुच्छेद 324(5) और अंतरिम निलंबन की संवैधानिक सीमा:
    • शीर्ष अदालत का अंतरिम निलंबन से इनकार करना संवैधानिक दृष्टि से सुसंगत है। एस.एस. धनोआ बनाम भारत संघ [(1991) 3 SCC 567] और संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों के समान संस्थागत सुरक्षा प्राप्त है ताकि वे बिना किसी बाहरी दबाव के स्वतंत्र रूप से काम कर सकें।
    • न्यायिक समीक्षा के तहत अदालत उनके द्वारा लिए गए प्रशासनिक और चुनावी निर्णयों की वैधता की जांच कर उन्हें रद्द कर सकती है, किंतु अंतरिम आदेश के माध्यम से संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को निलंबित नहीं किया जा सकता।

विधिक विवरण एवं उपस्थित वरिष्ठ अधिवक्ता

  • न्यायालय: भारत का सर्वोच्च न्यायालय (संवैधानिक मूल रिट क्षेत्राधिकार)
  • केस संदर्भ: राकेश कुमार सिंह उर्फ राकेश सिंह बनाम भारत संघ व अन्य [Writ Petition (Civil) No. 1246 of 2026 – मुख्य वाद] एवं संबद्ध याचिकाएं [W.P.(C) No. 1351/2026 आदि]
  • पीठ: मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना
  • आदेश की तिथि: 27 अक्टूबर 2026
  • आगामी निर्णायक सुनवाई: 17 नवंबर 2026

विधिक प्रतिनिधित्व:

  • मुख्य याचिकाकर्ता (राकेश कुमार सिंह) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह (Senior Advocate Vikas Singh), अधिवक्ता मुदित गुप्ता व सुदीप चंद्रा के माध्यम से।
  • याचिकाकर्ता (राहुल गांधी व INDIA ब्लॉक) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी (Senior Advocate Dr. Abhishek Manu Singhvi)।
  • याचिकाकर्ता (TMC सांसद डोला सेन) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. मेनका गुरुस्वामी (Senior Advocate Dr. Menaka Guruswamy)।
  • भारत निर्वाचन आयोग (ECI) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. मनिंदर सिंह (Senior Advocate Dr. Maninder Singh)।
  • प्रतिवादी पक्ष: भारत संघ, चुनाव आयोग (ECI), मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू, चुनाव आयुक्त विवेक जोशी, उप चुनाव आयुक्त मनीष गर्ग एवं महानिदेशक (IT) सीमा खन्ना।
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
    • भारत का संविधान — अनुच्छेद 324 (निर्वाचन आयोग की संरचना व अधीक्षण), अनुच्छेद 324(5) (CEC की पदमुक्ति व स्वतंत्रता), एवं अनुच्छेद 32
    • मुख्य चुनाव आयुक्त तथा अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023 — धारा 18 (कार्य संचालन, सर्वसम्मति व बहुमत प्रक्रिया)
    • निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 — फॉर्म 6 (मतदाता सूची में नाम जोड़ने का वैधानिक प्रपत्र)
    • जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 — धारा 21 (विशेष गहन पुनरीक्षण / SIR)
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
    • संवैधानिक संस्थाओं की निर्णय प्रक्रिया का विधिक मानक: ‘निर्वाचन आयोग एक बहु-सदस्यीय सामूहिक संवैधानिक निकाय है जहां मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य आयुक्तों की विधिक हैसियत समान है; अधिनियम की धारा 18 के तहत निर्णय सर्वसम्मति अथवा बहुमत से होना सांविधिक रूप से अनिवार्य है; न्यायालय किसी अखबार की रिपोर्ट पर सीधे अंतरिम निलंबन नहीं कर सकता, किंतु आधिकारिक फाइल नोटिंग्स के परीक्षण में यदि विधि का उल्लंघन पाया जाता है तो अदालत एकतरफा फैसलों को शून्य घोषित करने का पूर्ण अधिकार रखती है।’
  • वर्तमान स्थिति व आगामी कार्यवाही: सर्वोच्च न्यायालय ने ECI के जवाब पर सभी पक्षकारों को 10 दिन के भीतर जवाबी हलफनामा (Rejoinder) दाखिल करने का निर्देश दिया है; फाइल नोटिंग्स के संरक्षण, SIR की वैधता और चुनाव आयोग की आंतरिक कार्यप्रणाली के विधिक परीक्षण पर तीन-न्यायाधीशों की विशेष पीठ 17 नवंबर 2026 को विस्तृत सुनवाई करेगी।

Gyanesh Kumar: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतभारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India)
पीठमुख्य न्यायाधीश सूर्या कांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना
मुख्य मामला/साइटेशनराकेश कुमार सिंह उर्फ राकेश सिंह बनाम भारत संघ व अन्य (Rakesh Kumar Singh v. Union of India & Ors.)
याचिकाकर्ताविपक्षी नेता राहुल गांधी, इंडिया ब्लॉक नेता, डोला सेन, असदुद्दीन ओवैसी, दिग्विजय सिंह, राकेश सिंह व अन्य। | प्रतिनिधित्व: डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी, डॉ. मेनका गुरुस्वामी, विकास सिंह
प्रतिवादीभारत निर्वाचन आयोग (ECI), CEC ज्ञानेश कुमार, EC सुखबीर सिंह संधू एवं EC विवेक जोशी। | प्रतिनिधित्व: वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. मनिंदर सिंह, SG तुषार मेहता
मूल विवाद1. एकतरफा फैसले: मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) में अन्य दो चुनाव आयुक्तों की असहमति के बावजूद फैसले लेना।
2. फॉर्म 6 में संशोधन: ऑनलाइन फॉर्म 6 में कथित फेरबदल।
अदालत का आदेश10 दिन का समय: रीजॉइंडर दाखिल करने हेतु समय। अगली सुनवाई 17 नवंबर 2026 तय।
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