Tuesday, September 29, 2026
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Danger Of Smoking: हर नए साल पर छोड़ने की कसमें धूल फांकती रहीं; इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जस्टिस शेखर बी. सराफ की स्वरचित मार्मिक कविता पढ़ें

“तंबाकू धूम्रपान के साथ मेरा अनुभव” (My Experience With Tobacco Smoking)

कविता की शुरुआत में न्यायमूर्ति सराफ ने लिखा: “धूम्रपान के अपने अनुभव से, मैं इन अंतिम पंक्तियों को इस देश की युवा पीढ़ी को शिक्षित करने के प्रयास में लिख रहा हूं, ताकि वे तंबाकू धूम्रपान की इस हानिकारक और न मिटने वाली आदत का शिकार न बनें।”

कविता में उन्होंने अपने लॉ कॉलेज के दिनों को याद करते हुए बताया कि कैसे वे कभी धूम्रपान करने वालों पर हंसते थे, लेकिन एक सीनियर द्वारा चाय के साथ केवल “मजे के लिए” दी गई एक सिगरेट ने उन्हें धीरे-धीरे इस लत का शिकार बना दिया। उन्होंने अपनी शारीरिक समस्याओं, जैसे लगातार खांसी और कफ, तथा निकोटीन पैच और गम (Chewing Gum) के असफल प्रयासों का भी वर्णन किया।

1 घंटे का हुक्का = 100 सिगरेट के बराबर हानिकारक

अदालत ने फैसले में गंभीर चिकित्सीय तथ्यों का हवाला देते हुए इस भ्रांति को खारिज किया कि हुक्का सिगरेट से कम नुकसानदेह होता है:

  • 200 पफ का असर: हुक्का का एक घंटे का सत्र लगभग 200 पफ के बराबर होता है, जो शरीर को 100 सिगरेट पीने जितना नुकसान पहुंचाता है।
  • समान जहरीले रसायन: हुक्का सिगरेट जितना ही व्यसनकारी (Addictive) और विषैला होता है।

प्रयागराज: उत्तर प्रदेश के रेस्तरांओं में हुक्का बार संचालन और स्मोकिंग जोन में हुक्का सेवा को गैरकानूनी घोषित करने वाले 90 पन्नों के ऐतिहासिक फैसले के अंत में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ ने एक अत्यंत दुर्लभ, साहित्यिक और मानवीय मिसाल पेश की है।

न्यायमूर्ति सराफ ने अपने छात्र जीवन की गलतियों, ‘सिर्फ एक सिगरेट’ से शुरू होकर पूरी डिब्बी खरीदने तक के सफर, बार-बार सिगरेट छोड़ने के टूटे संकल्पों और फेफड़ों पर पड़े गंभीर दुष्प्रभावों का खुलकर वर्णन किया। उन्होंने देश की युवा पीढ़ी से आह्वान किया कि वे सोशल मीडिया या दोस्तों के दबाव में आकर तंबाकू के इस जानलेवा जाल में न फंसें। फैसले के उपसंहार (Epilogue) में न्यायाधीश ने किसी पारंपरिक विधिक उपदेश के बजाय “तंबाकू धूम्रपान के साथ मेरा अपना अनुभव” (My Experience With Tobacco Smoking) शीर्षक के तहत अपनी लिखी एक मार्मिक अंग्रेजी कविता साझा की।

फैसले के उपसंहार में जज की निजी व्यथा: ‘युवा पीढ़ी को शिक्षित करने का प्रयास’

न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति अवधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ द्वारा पारित निर्णय के अंतिम भाग में जस्टिस सराफ ने लिखा: “धूम्रपान के अपने व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर, मैं इन अंतिम पैराग्राफों को इस देश की युवा पीढ़ी को शिक्षित करने के प्रयास के रूप में लिख रहा हूं, ताकि वे तंबाकू धूम्रपान की इस विनाशकारी और अमिट लत (Deleterious and Indelible Habit) का शिकार न बनें।”

कविता का हिंदी भावानुवाद एवं मुख्य पड़ाव

कविता में जज ने अपने 20वें वर्ष से लेकर न्यायिक सेवा तक के संघर्ष को चार प्रमुख चरणों में साझा किया है:

1. लॉ स्कूल का घमंड और ‘चाय पर एक सुट्टा’:

  • कविता की शुरुआत में वे बताते हैं कि लॉ स्कूल में दाखिले के समय वे ‘सुबह की ओस की बूंद’ जैसे निष्पाप थे। कॉलेज गेट पर धुआं उड़ाने वाले सीनियर छात्रों को वे “कमजोर इच्छाशक्ति वाले” कहकर ताना मारते थे और सोचते थे कि वे कभी इस दलदल में नहीं उतरेंगे।
  • फिर एक दिन गर्म चाय के साथ एक सीनियर ने कहा—“अरे सिर्फ एक बार मजे के लिए ट्राय करो।” उन्होंने एक सिपाही की तरह बिना सोचे-समझे मूर्खता में वह पहली सिगरेट सुलगा ली।

2. ‘सिर्फ एक और’ से ‘पूरी डिब्बी’ तक का सफर:

  • वह “कभी-कभार” का सुट्टा देखते ही देखते खरगोशों की तरह बेलगाम होकर बढ़ता चला गया।
  • उन्होंने खुद को तसल्ली दी कि वे केवल एक ‘सोशल स्मोकर’ (संभ्रांत सामाजिक धूम्रपान करने वाले) हैं और नियंत्रण उनके हाथ में है।
  • परंतु संख्या लगातार बढ़ती गई—”बस एक आखिरी” से लेकर “पूरी डिब्बी खरीदने” तक का सफर कब तय हो गया, पता ही नहीं चला।
  • उन्होंने लिखा: “मेरे फेफड़े, जो कभी मेरे अपने थे, चुपचाप एक ऐसे मकान मालिक को बिक गए जिसने लीज की शर्तें कभी समझाई ही नहीं थीं।”

3. खांसी, बलगम और छोड़ने के टूटे संकल्प:

  • इसके बाद शुरू हुआ बीमारियों का दौर—रात को बिना बुलाए आने वाली लगातार खांसी और गले में जमा होने वाला बलगम, जैसे गला किसी दलदल में तब्दील हो गया हो।
  • उन्होंने निकोटीन पैच और निकोटीन च्युइंग गम का सहारा लिया, लेकिन लत इतनी प्रबल थी कि गम चबाते हुए भी सिगरेट सुलगा लेते थे—बिल्कुल उस डाइटिंग करने वाले की तरह जो केक छोड़ने की कसम खाकर सीधे आइसिंग चाटने लगता है।
  • “मैंने खुद से कहा कि मैं इसे छोड़ दूंगा—पक्के इरादे के साथ दो बार, तीन बार, और फिर साल में लगभग चालीस बार। हर जनवरी (नए साल) पर खुद से वही सलाह मिलती रही, जिस पर मैं कभी अमल नहीं कर सका।”

4. युवाओं को चेतावनी: ‘उबलता मेंढक मत बनो’

  • जज ने ईमानदारी से स्वीकार किया कि वे अब इसे छोड़ने की कसमें खाना छोड़ चुके हैं और उनके संकल्प धूल फांक रहे हैं, हालांकि उम्मीद बची है कि न्यायिक जिम्मेदारियों से सेवानिवृत्ति के बाद शायद इच्छाशक्ति काम कर जाए।
  • अंत में वे युवाओं को सीधी सलाह देते हैं:“जो इस रास्ते पर चल चुका है, उसकी तरफ से यह सार्वजनिक सेवा संदेश है: पहली सिगरेट हमेशा हानिरहित समय जैसी लगती है—परंतु यह ऐसी नहीं है। 20 साल की उम्र में अहंकार में चूर होकर मैंने जो कहा उस पर भरोसा मत करो, बल्कि शरीर की इस खांसी की चेतावनी को समझो। उस मूर्ख की तरह मत बनो जो दूसरों पर हंसता रहा और अंततः गर्म पानी में उबलता हुआ मेंढक (Boiling Frog) बन गया।”

फैसले में शामिल कविता का मूल पाठ (Original Poem)

"I entered law school pure as morning dew,
Sneered at the smokers puffing by the gate,
“Weak-willed,” I scoffed, “I'd never join that crew”
Famous last words. Reader, I was bait.

It started with a 'chaii', innocent and warm,
A senior offered, “Try one, just for fun.”
I took it like a soldier joins a storm
Bravely, stupidly, and one by one.

The “occasional” 'sutta' soon grew bold,
It multiplied like rabbits, unrestrained.
My lungs, once mine, were quietly sold
To a landlord who never once explained the lease.

I told myself I merely dabbled,
A social smoker, cultured, in control.
Meanwhile the count crept steadily
From “just one more” to “buy the whole damn pack.”

Then came the cough, my body's stand-up act,
Performing nightly, free of charge, unasked.
The phlegm arrived, a most unwelcome fact,
As if my throat had been recently tasked
With hosting a swamp.

I tried the patch, it itched.
I tried the gum, I chewed it, then lit up regardless,
Like a dieter who's sworn off cake, then switched
Straight to the icing, calling it “harmless.”

“I'll quit,” I said, with great conviction twice,
Then thrice, then roughly forty times a year.
Each January brought the same advice
From me, to me, which I did not adhere.

I've quit the quitting now, if I'll be honest,
The resolution's gathering dust and shame,
But hope remains perhaps once this is finished
(This job, this judgment), willpower makes a claim.

So here's my public service, dressed in rhyme,
From one who walked the very path you tread:
The first cigarette feels like harmless time
It isn't. Trust the cough, not what I said
At twenty, full of swagger, sure and free.
Don't be the fool who scoffed, only to become a boiling frog."

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हुक्का और सिगरेट के मेडिकल नुकसान: 1 घंटा हुक्का = 100 सिगरेट

उपसंहार में पीठ ने केवल काव्यात्मक अभिव्यक्ति ही नहीं दी, बल्कि गंभीर चिकित्सा तथ्यों को भी न्यायिक रिकॉर्ड पर दर्ज किया:

  1. 1 घंटे का हुक्का = 100 सिगरेट:
    • अदालत ने मेडिकल साइंस के हवाले से कहा कि लगभग एक घंटे के एक हुक्का सेशन में व्यक्ति अनुमानित रूप से 200 कश (Puffs) खींचता है, जो शरीर को नुकसान पहुंचाने के मामले में 100 सिगरेट पीने के बराबर है।
  2. समान रूप से जानलेवा:
    • अदालत ने इस गलतफहमी को खारिज किया कि हुक्का पानी से छनकर आने के कारण सुरक्षित है:“हुक्का सिगरेट जितना ही लत लगाने वाला है, सिगरेट जितना ही हानिकारक है और इसमें सिगरेट के समान ही घातक जहरीले रसायन पाए जाते हैं।”
  3. अन्य राज्यों की तर्ज पर कड़े संशोधन का आह्वान:
    • अदालत ने रेखांकित किया कि गुजरात, पंजाब, राजस्थान, महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्यों ने COTPA कानून में राज्य स्तरीय संशोधन करके हुक्का बारों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया है और सजा व जुर्माने को कड़ा किया है।
    • पीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार से अपेक्षा की कि वह जनहित में आगे आए और स्मोकिंग जोन में हुक्का परोसने पर कठोर दंडात्मक प्रावधानों वाली औपचारिक अधिसूचना जारी करे।

Danger Of Smoking: विधिक विवरण

  • केस संदर्भ: आफटेक फूड्स एंड बेवरेजेस प्राइवेट लिमिटेड व अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य [रिट याचिका (सिविल) – 90 पन्नों का निर्णय – इलाहाबाद उच्च न्यायालय]
  • पीठ: न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति अवधेश कुमार चौधरी
  • प्रासंगिक कानून एवं संवैधानिक आधार:
    • सिगरेट और अन्य तंबाकू उत्पाद अधिनियम, 2003 (COTPA)
    • सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान निषेध नियमावली, 2008 (यथासंशोधित 2017) का नियम 4(3)
    • भारत का संविधान – अनुच्छेद 21 (स्वास्थ्य और जीवन का अधिकार)
    • भारत का संविधान – अनुच्छेद 47 (जन स्वास्थ्य में सुधार राज्य का प्राथमिक संवैधानिक कर्तव्य)
  • प्रशासनिक निर्देश: फैसले की आधिकारिक प्रति उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव (Chief Secretary) और पुलिस महानिदेशक (DGP) को आवश्यक अनुपालन और विधिक अधिसूचना जारी करने के विचारार्थ प्रेषित।

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