Wednesday, September 16, 2026
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Revoke Time: Probate रद्द कराना है तो 3 साल की समय-सीमा के भीतर आएं, देर से जागे तो राहत नहीं…क्या है लिमिटेशन एक्ट का आर्टिकल 137

Revoke Time: सुप्रीम कोर्ट ने किसी वसीयत के आधार पर अदालत से हासिल किए गए Probate ( वसीयत की कानूनी वैधता का प्रमाण पत्र) को रद्द कराने की कानूनी लड़ाई को लेकर एक दूरगामी फैसला सुनाया है।

वर्ष 1995 में दिए गए एक प्रोबेट को रद्द करने का मामला

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पांचोली की खंडपीठ ने धीरज दत्ता नामक व्यक्ति की अपील को स्वीकार करते हुए यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि वर्ष 1995 में दिए गए एक प्रोबेट को रद्द कराने के लिए वर्ष 2022 में दाखिल की गई अर्जी पूरी तरह से समय-बाधित (Time-Barred) है और कानून देर से जागने वाले मुकदमों को बढ़ावा नहीं दे सकता। अदालत ने स्पष्ट किया है कि चूंकि भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम (Indian Succession Act, 1925) में प्रोबेट हासिल करने या उसे रद्द (Revoke) कराने के लिए कोई समय-सीमा तय नहीं की गई है, इसलिए ऐसे मामलों में लिमिटेशन एक्ट (Limitation Act, 1963) का आर्टिकल 137 लागू होगा, जो ऐसी अर्जियों के लिए अधिकतम 3 वर्ष की समय-सीमा (Limitation Period) तय करता है।

मामला क्या था? (1995 का प्रोबेट, 2011/2013 का नोटिस और 2022 में केस)

यह कानूनी विवाद गौरीप्रोवा सेन नाम की महिला की संपत्ति के उत्तराधिकार से जुड़ा है।

वसीयत और प्रोबेट: महिला ने अक्टूबर 1981 में अपनी मृत्यु से पहले 9 जुलाई 1981 को एक वसीयत निष्पादित की थी, जिसमें उन्होंने अपने भतीजे धीरज दत्ता (याचिकाकर्ता) को एकमात्र निष्पादक (Executor) और लाभार्थी बनाया था। अदालत ने सितंबर 1995 में इस वसीयत का प्रोबेट धीरज दत्ता के पक्ष में जारी कर दिया था।

राजस्व रिकॉर्ड (Mutation) की कार्यवाही: प्रोबेट मिलने के बाद दत्ता ने सरकारी राजस्व रिकॉर्ड में संपत्ति को अपने नाम दर्ज कराने (दाखिल-खारिज/Mutation) की प्रक्रिया शुरू की। इसके तहत वर्ष 2011/2013 में विपक्षी पक्षों (प्रतिवादियों) को कानूनी नोटिस भेजे गए।

विपक्षी पक्ष का दावा: प्रतिवादियों का दावा था कि उन्हें इस प्रोबेट के बारे में पहली बार वर्ष 2019 में पता चला, जिसके बाद उन्होंने संपत्ति को लेकर मुकदमा किया और वर्ष 2022 में भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 263 के तहत प्रोबेट को रद्द करने की अर्जी लगाई।

अदालती सफर: हाई कोर्ट की एकल पीठ (Single Judge) ने इस अर्जी को समय-बाधित मानकर खारिज कर दिया था, लेकिन खंडपीठ (Division Bench) ने इसे सही मान लिया था। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

सुप्रीम कोर्ट का कानूनी रुख: कोर्ट का नोटिस आए, तो आंखें बंद नहीं रख सकते

सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट की खंडपीठ के फैसले को पूरी तरह पलट दिया और एकल पीठ के आदेश को बहाल रखा। जस्टिस संजय करोल द्वारा लिखे गए फैसले में अदालत ने प्रतिवादियों के ‘अज्ञानता’ वाले बहाने की कड़ी आलोचना की:

कंस्ट्रक्टिव नोटिस (Constructive Notice) का सिद्धांत: कोर्ट ने कहा कि जब किसी व्यक्ति को दाखिल-खारिज (Mutation) की कार्यवाही के लिए सरकारी या कानूनी नोटिस तामील (Serve) करा दिया जाता है, तो कानूनन यह मान लिया जाता है कि उसे मुख्य आदेश (इस मामले में 1995 के प्रोबेट) की भी परोक्ष जानकारी (Constructive Notice) मिल चुकी है।

नागरिकों का कर्तव्य: कोर्ट ने एक बेहद व्यावहारिक टिप्पणी

टिप्पणी: यदि किसी कानून की अदालत ने किसी व्यक्ति को कोई नोटिस भेजा है, तो कम से कम उससे यह उम्मीद तो की ही जाती है कि वह यह जानने का प्रयास करे कि यह नोटिस उसे क्यों भेजा गया है और इस संबंध में उसे आगे क्या कानूनी कदम उठाने की आवश्यकता है।

2019 की थ्योरी खारिज: प्रतिवादियों की यह दलील कि ३ साल की समय-सीमा वर्ष २०१९ से गिनी जानी चाहिए, कोर्ट को बिल्कुल रास नहीं आई। कोर्ट ने माना कि जब 2011/2013 में दाखिल-खारिज का नोटिस मिला, तभी से लिमिटेशन का समय शुरू हो गया था। इसलिए 2022 में दाखिल याचिका पूरी तरह काल-बाधित (Hopelessly Time-Barred) है।

विश्लेषण: लिमिटेशन एक्ट का आर्टिकल 137 और इसका प्रभाव

यह फैसला देश की सभी दीवानी (Civil) अदालतों के लिए नजीर है, जहां लोग दशकों पुराने पारिवारिक सेटलमेंट्स या वसीयत को अचानक चुनौती देने पहुंच जाते हैं।

कानूनी प्रावधानसुप्रीम कोर्ट की व्याख्या और वैधानिक स्थिति
भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम (ISA)इस विशेष कानून में प्रोबेट प्राप्त करने या उसे वापस लेने (Revocation) की याचिका दायर करने के लिए कोई विशिष्ट समय-सीमा नहीं दी गई है।
आर्टिकल 137 (Limitation Act)यह एक ‘अवशिष्ट प्रावधान’ (Residual Provision) है। यह कहता है कि किसी भी ऐसी कानूनी अर्जी के लिए, जिसके लिए पूरे कानून में कहीं कोई समय-सीमा तय नहीं है, अधिकतम 3 वर्ष की अवधि ही मान्य होगी। यह अवधि तब से शुरू होती है जब ‘अधिकार उत्पन्न’ (Right to Sue accrues) होता है।
अधिकार कब उत्पन्न हुआ?इस मामले में, अधिकार तब उत्पन्न हुआ जब प्रतिवादियों को म्यूटेशन का नोटिस मिला और उन्हें पता चला (या पता लगाना चाहिए था) कि यह म्यूटेशन वसीयत के प्रोबेट पर आधारित है।

अंतिम निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट ने धीरज दत्ता की अपील को स्वीकार करते हुए प्रतिवादियों की प्रोबेट रद्द करने वाली अर्जी को खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट संदेश दिया कि यदि कोई पक्ष अपने अधिकारों को लेकर लंबे समय तक उदासीन रहता है और कानूनी नोटिसों को नजरअंदाज करता है, तो कानून बाद में उसकी मदद के लिए आगे नहीं आएगा।

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