केस एवं विवाद विवरण (Case Overview)
| विधिक/प्रशासनिक बिंदु | विवरण (अगस्त 2026) |
| माननीय पीठ | न्यायमूर्ति अमित महाजन (दिल्ली उच्च न्यायालय) |
| याचिकाकर्ता | ऑल इंडिया दलित क्रिश्चियन राइट्स प्रोटेक्शन कमेटी (वरिष्ठ अधिवक्ता संजय घोष) |
| प्रतिवादी | दिल्ली पुलिस / केंद्र सरकार (ASG चेतन शर्मा) |
| मुख्य मुद्दा | जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति और शहरी क्षेत्रों में विरोध प्रदर्शनों से आम जीवन पर असर |
| अदालत का आदेश | पुलिस को 8 अगस्त तक याचिकाकर्ता के आवेदन पर फैसला लेने का निर्देश। |
Jantar Mantar: दिल्ली हाईकोर्ट ने राजधानी के मध्य में स्थित जंतर-मंतर (Jantar Mantar) पर होने वाले लगातार विरोध प्रदर्शनों पर कड़ा रुख अपनाते हुए केंद्र सरकार से सवाल किया है कि वह इस स्थान को विरोध प्रदर्शन (Protest Site) के रूप में पूरी तरह बंद करने पर विचार क्यों नहीं कर रही है।
न्यायमूर्ति अमित महाजन की एकल पीठ ने मौखिक रूप से कहा कि इस तरह के प्रदर्शनों के कारण पूरे शहर को बेवजह “बंधक” (Ransom) नहीं बनाया जाना चाहिए और ऐसे आयोजनों को शहर के बीचों-बीच अनुमति देने के बजाय बंद किया जाना चाहिए।
सुनवाई के दौरान अदालत, केंद्र और वकील के बीच तीखी बहस
यह टिप्पणी ऑल इंडिया दलित क्रिश्चियन राइट्स प्रोटेक्शन कमेटी की याचिका पर सुनवाई के दौरान आई। संस्था ने जंतर-मंतर पर केवल 75 लोगों के साथ शांतिपूर्ण प्रदर्शन की अनुमति मांगी थी, जिस पर दिल्ली पुलिस जुलाई से कोई निर्णय नहीं ले रही थी।
पूरा शहर बंधक बन जाता है: हाई कोर्ट
- न्यायमूर्ति अमित महाजन की टिप्पणी:“आप इसे बंद क्यों नहीं कर देते? मेरे अनुसार, ये सब चीजें शहर के अंदर नहीं होनी चाहिए, हालांकि यह सरकार का फैसला है। पूरे शहर को बेवजह बंधक क्यों बनाया जाना चाहिए?”
- कोर्ट ने कहा कि जब शहर के बीचों-बीच प्रदर्शन होते हैं, तो एम्बुलेंस से लेकर सामान्य यातायात व्यवस्था पूरी तरह ठप हो जाती है, जिससे आम जनता को भारी परेशानी होती है।
केंद्र सरकार (ASG) का पक्ष
- अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) चेतन शर्मा ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले से ही इस बात पर विचार कर रहा है कि क्या जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल बनाया जा सकता है या नहीं।
- ASG ने सुरक्षा कारणों और आगामी 15 अगस्त (स्वतंत्रता दिवस) का हवाला देते हुए कहा कि क्षेत्र में धारा 144 लागू है। उन्होंने कहा, “सुरक्षा बल तैनात हैं। हमें नहीं पता कि कब 75 लोग बढ़कर 75,000 हो जाएं…”
याचिकाकर्ता का तर्क (वरिष्ठ अधिवक्ता संजय घोष)
- याचिकाकर्ता के वकील संजय घोष ने शाहीन बाग मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करना नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है।
- उन्होंने सवाल उठाया कि क्या केंद्र सरकार यह कहना चाहती है कि दिल्ली में कोई लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन नहीं हो सकता?
उच्च न्यायालय का अंतिम आदेश
सभी पक्षों को सुनने के बाद, न्यायमूर्ति अमित महाजन की पीठ ने याचिका का निपटारा करते हुए दिल्ली पुलिस को निर्देश दिया कि वह 8 अगस्त तक याचिकाकर्ता संस्था के आवेदन पर उचित निर्णय (Decision) ले।

