Wednesday, October 28, 2026
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Infertility & Divorce: निःसंतानता या बांझपन तलाक का आधार नहीं…’मानसिक क्रूरता’ पर लगाई मुहर, ₹34.76 लाख का गुजारा भत्ता मंजूर

केस मैट्रिक्स: Patna High Court Ruling on Infertility & Divorce

पहलूविवरण
संबंधित अदालतपटना उच्च न्यायालय (Patna High Court)
माननीय पीठजस्टिस बिबेक चौधरी एवं जस्टिस चंद्र शेखर झा
विवाह की तिथि12 जून 2010
स्थायी गुजारा भत्ता₹34.76 लाख (दो किश्तों में देय)
पति का पेशा व वेतनसहायक शिक्षक (₹86,900 प्रति माह)
संबंधित कानूनहिंदू विवाह अधिनियम, धारा 13(1)(ia) (मानसिक क्रूरता)
मुख्य कानूनी सिद्धांतबांझपन या संतान न होना तलाक का कानूनी आधार नहीं है; लगातार आपराधिक मुकदमेबाजी और अविश्वास से उत्पन्न स्थिति ‘मानसिक क्रूरता’ है।

Infertility & Divorce: पटना हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवादों और निःसंतानता (Childlessness) के संवेदनशील मुद्दे पर एक दूरगामी फैसला सुनाया है।

रिश्ता मानसिक क्रूरता (Mental Cruelty) के आधार पर पूरी तरह टूट चुका है

हाईकोर्ट के जस्टिस बिबेक चौधरी और जस्टिस चंद्र शेखर झा की खंडपीठ ने पत्नी की अपील को खारिज करते हुए पति (जो एक सहायक शिक्षक हैं) को पत्नी के भरण-पोषण के लिए ₹34.76 लाख का स्थायी गुजारा भत्ता (Permanent Alimony) देने का आदेश दिया। अदालत ने स्पष्ट किया है कि सालों तक इलाज या IVF कराने के बाद भी संतान न होना या दंपत्ति का बच्चा न होना कानूनन तलाक का आधार नहीं बन सकता। हालांकि, लंबे समय तक चले आपराधिक मामलों, गंभीर आरोपों और आपसी विश्वास के पूरी तरह खत्म हो जाने के कारण अदालत ने माना कि रिश्ता मानसिक क्रूरता (Mental Cruelty) के आधार पर पूरी तरह टूट चुका है, और तलाक की डिग्री को सही ठहराया।

मामला क्या था?: IVF इलाज, एफआईआर और तलाक

विवाह और IVF का दौर: दंपत्ति का विवाह 12 जून 2010 को हुआ था। संतान प्राप्ति के लिए दोनों ने सालों तक IVF सहित कई जटिल चिकित्सा उपचार कराए। पति ने इलाज का पूरा खर्च उठाया और चिकित्सा प्रक्रियाओं में लगातार शामिल रहा।

आपराधिक मामले: वर्ष 2018 में पत्नी ने पति और उसके परिवार के खिलाफ हत्या के प्रयास और दहेज प्रताड़ना का आपराधिक मामला दर्ज कराया। हालांकि, मुकदमे की सुनवाई के बाद पति को सभी आरोपों से बरी (Acquitted) कर दिया गया।

फैमिली कोर्ट का फैसला: फैमिली कोर्ट ने क्रूरता और परित्याग के आधार पर पति के पक्ष में तलाक की डिग्री मंजूर कर ली, जिसके खिलाफ पत्नी ने हाई कोर्ट में अपील दायर की।

पटना हाई कोर्ट की मुख्य विधिक व्याख्याएं

“संतान न होना तलाक की वजह नहीं बन सकता”

हाई कोर्ट ने बांझपन (Infertility) को तलाक का आधार मानने से इनकार करते हुए टिप्पणी की, पति-पत्नी का विवाह केवल इसलिए भंग नहीं किया जा सकता कि वे संतान पैदा करने में विफल रहे, और न ही केवल लंबे समय से अलग रहने के कारण तलाक दिया जा सकता है। शादी तब टूटती है जब आपसी विश्वास पूरी तरह खत्म हो जाता है, गंभीर आपराधिक मुकदमे शुरू हो जाते हैं, और कुल मिलाकर ऐसा व्यवहार स्थापित होता है जो ‘मानसिक क्रूरता’ के दायरे में आता है।

आपराधिक आरोपों से बरी होना और क्रूरता का आंकलन

अदालत ने कहा कि हालांकि आपराधिक मामले में बरी होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि आरोप जानबूझकर झूठे थे, लेकिन सालों तक गंभीर मुकदमेबाजी झेलना और आरोप साबित न हो पाना वैवाहिक रिश्ते में विश्वास को पूरी तरह खत्म कर देता है।

तलाक के बाद पति का दूसरा विवाह

निचली अदालत से तलाक मिलने के बाद लंबित अपील के दौरान पति ने दूसरी शादी कर ली थी। हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दूसरी शादी करने से पत्नी की अपील अमान्य नहीं होती, लेकिन चूंकि कानूनी आधारों पर तलाक सही पाया गया है, इसलिए इस अपील को खारिज किया जाता है।

गुजारा भत्ता (Permanent Alimony) का निर्धारण

पति का मासिक वेतन ₹86,900 (सहायक शिक्षक) देखते हुए कोर्ट ने माना कि होम लोन या पर्सनल लोन की EMI को काटकर वेतन कम नहीं आंका जा सकता। कोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम (Hindu Marriage Act) के तहत शक्तियों का प्रयोग करते हुए निम्नलिखित आदेश दिए:

कुल गुजारा भत्ता: पति अपनी पूर्व पत्नी को कुल ₹34.76 लाख का भुगतान करेगा।

यूं होगी किश्तों में भुगतान

पहला किश्त: आदेश की प्रति फैमिली कोर्ट को मिलने के 15 दिनों के भीतर।

दूसरा किश्त: पहली किश्त देने के 60 दिनों के भीतर।

गैर-भुगतान की स्थिति: यदि पति राशि का भुगतान नहीं करता है, तो पत्नी कानूनी रूप से वसूली की कार्यवाही शुरू करने की हकदार होगी।

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