Monday, October 26, 2026
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RSS Route: अदालत के दिशा-निर्देशों का इस्तेमाल सर्जरी के लिए नहीं; बल्कि मरीज को मारने के लिए स्कैल्पल (चाकू) की तरह कर रही पुलिस, प्रोक्रूस्ट्स जैसा व्यवहार बंद करे

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अदालत की मुख्य टिप्पणियां और कानूनी बिंदु

1. “दिशानिर्देशों को खारिज करने का जरिया न बनाएं”:

न्यायामूर्ति वी. लक्ष्मीनारायणन ने कहा कि उच्च न्यायालय ने पहले यह दिशानिर्देश इसलिए तय किए थे ताकि पुलिस निष्पक्ष रूप से विचार कर सके। लेकिन पुलिस उन्हीं नियमों को अनुमति रद्द करने के हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रही है।

2. तमिलनाडु पुलिस के ढर्रे पर तंज:

अदालत ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर टिप्पणी करते हुए कहा: “तमिलनाडु पुलिस के श्रेय में एक बात जरूर कही जा सकती है—वे खारिज करने के लिए कोई नया कारण लेकर नहीं आए हैं। वे लगातार उन्हीं पुराने कारणों को दोहरा रहे हैं जिन्हें यह अदालत पहले ही ‘लंगड़ा’ (Lame) और बेबुनियाद करार दे चुकी है।”

3. ‘प्रोक्रस्टेस’ (Procrustes) मानसिकता से बचने की सलाह:

  • यूनानी पौराणिक कथाओं के चरित्र का उदाहरण देते हुए कोर्ट ने कहा कि पुलिस को ‘प्रोक्रस्टियन बेड’ की तरह काम नहीं करना चाहिए, जहाँ हर आवेदन को एक ही तयशुदा खांचे में रखकर खारिज कर दिया जाता है।
  • अदालत ने पुलिस को निर्देश दिया कि वे आवेदनों में केवल कमियां ढूंढने के बजाय उन्हें संसाधित (Process) करने और नियमों के तहत स्वीकृति (Approve) प्रदान करने का सकारात्मक प्रयास करें।

चेन्नई: भारत का संविधान के अनुच्छेद 19(1)(b) (बिना हथियारों के शांतिपूर्ण सभा व जुलूस निकालने का मौलिक अधिकार), अनुच्छेद 19(1)(a) (वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता), अनुच्छेद 19(3) (युक्तियुक्त निर्बंधन / Reasonable Restrictions), पुलिस अधिनियम की धारा 41/41A (जुलूस व रैलियों का विनियमन बनाम निषेध), तथा प्रशासनिक प्राधिकारियों द्वारा अदालती दिशा-निर्देशों के दुरुपयोग और असहमति को दबाने की प्रवृत्ति पर मद्रास उच्च न्यायालय ने एक अत्यंत तीखा एवं कड़ा आदेश पारित किया है।

मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति वी. लक्ष्मीनारायणन (Justice V Lakshminarayanan) की एकल पीठ ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के उत्तर तमिलनाडु के सचिव वी.जी. जगदीशन द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य पुलिस की कार्यशैली पर गंभीर नाराजगी व्यक्त की।

अदालत ने टिप्पणी की कि पुलिस शांतिपूर्ण रूट मार्च को विनियमित करने के लिए अदालत द्वारा तय किए गए दिशा-निर्देशों का इस्तेमाल “सर्जरी करने के लिए नहीं, बल्कि मरीज की जान लेने के लिए स्कैल्पल (शल्य-चिकित्सा वाले चाकू) की तरह” कर रही है। अदालत ने पुलिस को ग्रीक पौराणिक चरित्र ‘प्रोक्रूस्ट्स’ (Procrustes) की तरह एक ही सांचे में ढालकर सभी आवेदनों को खारिज करने से बचने की चेतावनी देते हुए निर्देश दिया कि वह राज्य भर के 128 स्थानों पर 25 अक्टूबर और 1 नवंबर 2026 को आरएसएस के स्थापना दिवस रूट मार्च के आयोजनों को तुरंत स्वीकृति और सुरक्षा प्रदान करे।

उच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं विधिक टिप्पणियां

1. ‘स्कैल्पल का उपयोग सर्जरी के लिए होता है, मरीज को मारने के लिए नहीं’

न्यायमूर्ति वी. लक्ष्मीनारायणन ने पुलिस द्वारा अनुमतियां खारिज करने के यांत्रिक रवैये पर कड़ा प्रहार करते हुए कहा: “अदालत ने यह सुनिश्चित करने के लिए दिशा-निर्देश तय किए थे कि अनुमति देने की शक्ति का अंतिम रूप से कैसे प्रयोग किया जाए। किंतु पुलिस द्वारा उन्हीं दिशा-निर्देशों का उपयोग अब अनुमतियों को खारिज करने के साधन के रूप में किया जा रहा है। पुलिस अदालत के दिशा-निर्देशों का इस्तेमाल एक स्कैल्पल (Scalpel) की तरह कर रही है—सर्जरी करके उपचार करने के लिए नहीं, बल्कि मरीज को मार डालने के लिए।”

2. ‘तमिलनाडु पुलिस का वही पुराना और खोखला बहाना’:

  • अदालत ने पुलिस द्वारा बार-बार दिए जाने वाले खारिज कारणों पर व्यंग्य करते हुए कहा:“तमिलनाडु पुलिस के खाते में एक बात तो कहनी ही पड़ेगी—वे खारिज करने के लिए कोई नया कारण लेकर नहीं आए हैं। वे लगातार उन्हीं पुराने कारणों को दोहरा रहे हैं जिन्हें इस अदालत ने बार-बार ‘लंगड़ा/खोखला’ (Lame reasons) पाया है।”
  • अदालत ने रेखांकित किया कि कानून-व्यवस्था की सामान्य आशंका या बल की कमी का वही घिसा-पिटा तर्क देकर हर साल शांतिपूर्ण आयोजनों को रोकना प्रशासनिक दुर्भावना को दर्शाता है।

3. ‘प्रोक्रूस्ट्स की तरह व्यवहार न करे पुलिस’ (Not to behave like Procrustes):

  • न्यायाधीश ने पुलिस को ग्रीक पौराणिक कथा के अत्याचारी चरित्र ‘प्रोक्रूस्ट्स’ का उदाहरण देते हुए सचेत किया (जो अपने बिस्तर के हिसाब से मेहमानों के पैर काट देता था या उन्हें खींचता था):“पुलिस को प्रोक्रूस्ट्स जैसा व्यवहार नहीं करना चाहिए। उन्हें सभी आवेदनों को उसी पुराने बिस्तर पर रखकर केवल खारिज करने के बहाने नहीं खोजने चाहिए, जैसा कि वे इन सभी वर्षों में करते आए हैं। पुलिस का प्रयास आवेदनों को सकारात्मक रूप से संसाधित करने और उन्हें मंजूरी देने की दिशा में होना चाहिए।”

4. 128 स्थानों पर दो चरणों में रूट मार्च की अनुमति:

  • उच्च न्यायालय ने पुलिस के अस्वीकृति आदेशों को निरस्त करते हुए आदेश दिया कि संघ को निम्नलिखित दो तिथियों में अपने रूट मार्च आयोजित करने की औपचारिक अनुमति तुरंत जारी की जाए:
    • 25 अक्टूबर 2026 (प्रथम चरण), और
    • 1 नवंबर 2026 (द्वितीय चरण)।
  • यह अनुमति पूरे तमिलनाडु के कुल 128 विनिर्दिष्ट स्थानों पर लागू होगी, जहाँ पुलिस को पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया है।

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (2022–2026)

चरण / विवरणतथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के तर्क
याचिकाकर्तावी.जी. जगदीशन — राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के उत्तर तमिलनाडु प्रांत सचिव।
प्रतिवादीतमिलनाडु राज्य (गृह विभाग) एवं राज्य पुलिस महानिदेशक (DGP) व जिला पुलिस अधिकारी।
प्रार्थित आयोजनसंगठन के स्थापना दिवस एवं विजयादशमी के उपलक्ष्य में राज्य भर के 128 स्थानों पर शांतिपूर्ण रूट मार्च और जनसभा का आयोजन।
पुलिस की अस्वीकृति का आधारराज्य पुलिस ने हर वर्ष की तरह कानून-व्यवस्था की सामान्य चिंता, अन्य संगठनों द्वारा संभावित विरोध, संवेदनशील इलाकों से गुजरने और पर्याप्त पुलिस बल की अनुपलब्धता का हवाला देकर अनुमति देने से इनकार कर दिया था।
याचिकाकर्ता की दलीलें1. सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु राज्य बनाम वी. सुब्रमण्यम (2023) में स्पष्ट कर दिया था कि रूट मार्च निकालना नागरिकों का मौलिक अधिकार है।
2. संगठन शांतिपूर्ण आयोजन और अदालत द्वारा तय सभी शर्तों का पालन करने को तैयार है, किंतु पुलिस दुर्भावना से ग्रस्त होकर हर बार खारिज कर देती है।
हाईकोर्ट का अंतिम आदेशपुलिस के अस्वीकृति आदेशों पर रोक; 25 अक्टूबर और 1 नवंबर 2026 को 128 स्थानों पर रूट मार्च की औपचारिक अनुमति जारी करने का आदेश।

विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: सभा करने की स्वतंत्रता बनाम राज्य का नियामक दायित्व

  • सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक नजीरें — हिम्मत लाल के. शाह बनाम पुलिस कमिश्नर, अहमदाबाद [(1973) 1 SCC 227] एवं हालिया फैसले:
    • सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने स्थापित किया है कि सार्वजनिक सड़कों या पार्कों में शांतिपूर्ण जुलूस निकालना नागरिकों का एक अंतर्निहित लोकतांत्रिक अधिकार है जो अनुच्छेद 19(1)(a) और 19(1)(b) से संरक्षित है।
    • राज्य को शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए समय और मार्ग जैसी उचित शर्तें लगाने (Regulatory Power) का अधिकार है, किंतु पुलिस इस शक्ति का प्रयोग किसी कार्यक्रम को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पूर्णतः प्रतिबंधित करने (Complete Prohibition) के लिए नहीं कर सकती।
  • अदालती दिशा-निर्देशों का सुरक्षात्मक उद्देश्य:
    • जब उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय किसी संवेदनशील विषय पर दिशा-निर्देश (Guidelines) तय करते हैं, तो उनका उद्देश्य नागरिकों के अधिकारों की रक्षा और पुलिस को मनमानी से रोकना होता है।
    • यदि पुलिस प्रशासन उन्हीं दिशा-निर्देशों की तकनीकी और संकीर्ण व्याख्या करके नागरिकों के अधिकारों को खत्म करने लगे, तो यह विधि के शासन (Rule of Law) की आत्मा पर आघात है। मद्रास उच्च न्यायालय की ‘स्कैल्पल’ वाली टिप्पणी इसी प्रशासनिक हठधर्मिता को रेखांकित करती है।

विधिक विवरण

  • न्यायालय: मद्रास उच्च न्यायालय (मूल रिट क्षेत्राधिकार)
  • केस संदर्भ: वी.जी. जगदीशन (सचिव, RSS उत्तर तमिलनाडु) बनाम तमिलनाडु राज्य व अन्य [रिट याचिका संख्या / 2026]
  • पीठ: न्यायमूर्ति वी. लक्ष्मीनारायणन (एकल पीठ)
  • निर्णय की तिथि: अक्टूबर 2026
  • स्वीकृत तिथियां एवं स्थान: 25 अक्टूबर 2026 एवं 1 नवंबर 2026 (तमिलनाडु के 128 विनिर्दिष्ट स्थानों पर)

प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:

  • भारत का संविधान — अनुच्छेद 19(1)(a) (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता), अनुच्छेद 19(1)(b) (शांतिपूर्ण सभा का अधिकार), अनुच्छेद 19(3) (युक्तियुक्त निर्बंधन) एवं अनुच्छेद 226
  • तमिलनाडु नगर पुलिस अधिनियम, 1888 / पुलिस अधिनियम, 1861 — धारा 41/41A (जुलूसों और सभाओं का विनियमन)
  • संबद्ध न्यायिक नजीरें:
    • तमिलनाडु राज्य बनाम वी. सुब्रमण्यम व अन्य (सुप्रीम कोर्ट, 2023) — रूट मार्च पर पूर्ण रोक अवैध
    • हिम्मत लाल के. शाह बनाम पुलिस कमिश्नर (संविधान पीठ, 1973) — सभा के अधिकार का संवैधानिक संरक्षण
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
    • शांतिपूर्ण सभा के मौलिक अधिकार का संरक्षण: ‘अदालत द्वारा रूट मार्च के विनियमन हेतु बनाए गए दिशा-निर्देशों का उद्देश्य अधिकारों की रक्षा करना है, न कि उन्हें समाप्त करना; कानून-व्यवस्था के सामान्य या पुराने बहानों पर बार-बार अनुमति से इनकार करना अवैध और मनमाना है; पुलिस को अनुमतियों को संसाधित और स्वीकृत करने की सकारात्मक मानसिकता के साथ कार्य करना चाहिए।’
  • अंतिम परिणाम: रिट याचिका पूर्णतः स्वीकार; पुलिस द्वारा अनुमतियां खारिज करने के पूर्व आदेश अपास्त; राज्य पुलिस को 25 अक्टूबर और 1 नवंबर 2026 को राज्य भर के 128 स्थानों पर निर्धारित मार्गों पर रूट मार्च की औपचारिक अनुमति जारी करने और पर्याप्त सुरक्षा प्रबंध सुनिश्चित करने का निर्देश जारी।

RSS Route: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतमद्रास उच्च न्यायालय (Madras High Court)
न्यायाधीशन्यायमूर्ति वी. लक्ष्मीनारायणन (Justice V Lakshminarayanan)
याचिकाकर्तावी. जी. जगदीशन (आरएसएस सचिव, उत्तरी तमिलनाडु)
प्रतिवादीतमिलनाडु राज्य पुलिस प्रशासन
मुख्य विवादRSS के स्थापना दिवस रूट मार्च की अनुमति याचिकाओं को पुलिस द्वारा लगातार खारिज करना।
अदालत का फैसलापुलिस के खारिज करने के रवैये पर कड़ी फटकार; 128 स्थानों पर 25 अक्टूबर और 1 नवंबर को रूट मार्च की अनुमति देने के निर्देश।
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