Whole Night Court: देर रात, छुट्टियों या कोर्ट बंद होने के बाद पैदा होने वाली आपातकालीन स्थितियों में नागरिकों को तुरंत कानूनी राहत देने के लिए एक स्थायी संस्थागत तंत्र (Institutional Mechanism) बनाने की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक बेहद महत्वपूर्ण जनहित याचिका (PIL) दायर की गई है।
सभी हाईकोर्टस को नोटिस जारी कर मांगा गया जवाब
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने इस याचिका पर विचार करने के लिए सहमति जताते हुए देश के सभी हाईकोर्टस को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। यदि रात के 2 बजे किसी नागरिक की अवैध गिरफ्तारी होने वाली हो, या तड़के सुबह किसी का आशियाना (मकान) ढहाया जाने वाला हो, या सप्ताहांत (वीकेंड) पर किसी को देश निकाला (Deportation) दिया जा रहा हो तो क्या उस नागरिक को अपनी जीवन और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए कोर्ट खुलने का इंतजार करना चाहिए? संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकारों के हनन के मामलों में नागरिकों को 24 घंटे और सातों दिन (24×7) त्वरित न्यायिक उपचार मिलना ही चाहिए।
मामला क्या है?: वर्तमान व्यवस्था की सीमाएं और 24×7 कोर्ट की मांग
यह याचिका अधिवक्ता माहेरविश रैन (Maheravish Rein) द्वारा व्यक्तिगत रूप से (In Person) दायर की गई है। याचिका में वर्तमान न्यायिक ढांचे की कुछ गंभीर कमियों को उजागर किया गया है।
सीमित अदालती घंटे: याचिका में कहा गया है कि वर्तमान में अदालती उपचार केवल तय कार्य-घंटों (Court Hours), कार्य-दिवसों और सीमित वैकेशन बेंचों (Vacation Benches) तक ही सीमित हैं। इसके कारण रात के समय, सार्वजनिक छुट्टियों या अदालती छुट्टियों के दौरान नागरिकों के पास कोई प्रभावी न्यायिक विकल्प नहीं बचता।
इमरजेंसी बेंच और डिजिटल सुनवाई: याचिका में मांग की गई है कि सुप्रीम कोर्ट और सभी हाई कोर्ट्स में ‘आपातकालीन संवैधानिक पीठ’ (Emergency Constitutional Benches) या ‘ड्यूटी जजों’ (Designated Duty Judges) का एक स्थायी रोस्टर बनाया जाए, जिन्हें रात में भी डिजिटल प्लेटफॉर्म (वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग) के जरिए तुरंत एक्सेस किया जा सके।
कोर्ट रूम जिरह: याचिकाकर्ता की पीड़ा बनाम व्यावहारिक चुनौतियां
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता माहेरविश रैन ने अदालत के सामने वकीलों और वादकारियों को होने वाली व्यावहारिक दिक्कतों को रखा। उन्होंने कहा, “यदि मैं शाम 6 बजे के बाद किसी बेहद जरूरी जीवन और स्वतंत्रता के मामले में याचिका दाखिल करती हूँ, तो अगली सुबह मेरे क्लर्क को रजिस्ट्री के सामने जाकर यह भीख मांगनी पड़ती है और समझाना पड़ता है कि मामला कितना जरूरी है। तब तक पीड़ित नागरिक के मौलिक अधिकार खत्म हो चुके होते हैं।
इस पर पीठ और सरकार की तरफ से दो मुख्य व्यावहारिक चुनौतियां सामने रखी गईं।
रजिस्ट्री पर बोझ और अधूरी याचिकाएं
चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने याचिका की मूल भावना के प्रति सहानुभूति जताते हुए कोर्ट की रजिस्ट्री (Registry) की कड़वी हकीकत सामने रखी। CJI ने कहा, “अक्सर यह देखा जाता है कि रात के समय जल्दबाजी में बेहद अस्पष्ट, अधूरी और बिना तैयारी के (Vague and Incomplete Paperbooks) याचिकाएं दायर कर दी जाती हैं, जिससे सिस्टम पूरी तरह जाम हो जाता है।”
नियमों के दुरुपयोग (Misuse) का खतरा
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता ने एक बहुत ही व्यावहारिक पेंच फंसाया। उन्होंने कहा, “यह तय करना बेहद मुश्किल है कि किस मामले में इतनी आपातकालीन तात्कालिकता (Urgency) है कि उसकी सुनवाई आधी रात को ही की जाए। अगर मैं रात 11 बजे याचिका दायर करूँ कि अगली सुबह 9 बजे कोर्ट की अवमानना (COC) की कार्यवाही है, तो क्या बेंच रात 12 बजे बैठेगी? इस तात्कालिकता का वर्गीकरण करना कठिन है और इसे प्रशासनिक स्तर पर ही संभाला जाना चाहिए।
CJI सूर्यकांत ने सॉलिसिटर जनरल की बात से सहमति जताते हुए कहा, “हां, इस व्यवस्था का दुरुपयोग भी हो सकता है। यह सुविधा केवल और केवल जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Life and Liberty) से जुड़े अत्यंत गंभीर मामलों के लिए ही होनी चाहिए।
केस शीट: सुप्रीम कोर्ट 24×7 आपातकालीन अदालत प्रोटोकॉल समीक्षा (2026)
| कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियां | उच्चतम न्यायालय की विधिक स्थिति और वर्तमान स्थिति |
| संबंधित अदालत | उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) |
| माननीय न्यायाधीश | CJI सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना |
| याचिकाकर्ता | एडवोकेट माहेरविश रैन (जनहित याचिका – PIL) |
| मामला/केस टाइटल | माहेरविश रैन बनाम भारत संघ व अन्य |
| मुख्य मांग | देर रात, वीकेंड और छुट्टियों में आपातकालीन मामलों की सुनवाई के लिए स्थायी SOP। |
| अदालत का वर्तमान कदम | सभी हाई कोर्ट्स को नोटिस जारी कर मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) पर राय मांगी। |
कोर्ट का रुख: एक सर्वमान्य SOP की तलाश
तमाम व्यावहारिक चिंताओं के बावजूद, सुप्रीम कोर्ट ने माना कि यह एक गंभीर संवैधानिक मुद्दा है। कोर्ट ने कहा कि वे इस समस्या के समाधान के लिए एक मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) विकसित करने पर विचार करने के लिए तैयार हैं। इसी सीमित बिंदु पर देश के सभी हाई कोर्ट्स को नोटिस जारी किया गया है ताकि वे बता सकें कि उनके यहां देर रात या छुट्टियों में अर्जेंट मामलों को सुनने का क्या मौजूदा सिस्टम है और इसे कैसे बेहतर बनाया जा सकता है।

