Interim Maintenance: वैवाहिक विवादों और भरण-पोषण के अधिकारों को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील विधिक व्यवस्था दी है।
अपील लंबित रहने के दौरान आश्रित जीवनसाथी को वित्तीय संकट का सामना न करना पड़े
हाईकोर्ट के जस्टिस विवेक चौधरी और जस्टिस रेनू भटनागर की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि ‘कार्यवाही’ (Proceeding) शब्द के दायरे में ट्रायल कोर्ट से लेकर अपील के चरण तक की पूरी प्रक्रिया शामिल है, ताकि अपील लंबित रहने के दौरान आश्रित जीवनसाथी को वित्तीय संकट का सामना न करना पड़े। अदालत ने कहा, “फैमिली कोर्ट (पारिवारिक न्यायालय) द्वारा तलाक की डिक्री (Divorce Decree) पारित कर देने मात्र से अंतरिम भरण-पोषण (Interim Maintenance) का आदेश स्वतः समाप्त नहीं हो जाता। चूंकि कानूनन अपील को मूल वैवाहिक कार्यवाही का ही विस्तार (Continuation) माना जाता है, इसलिए जब तक हाई कोर्ट में अपील लंबित है, तब तक आर्थिक रूप से आश्रित पत्नी धारा 24 के तहत गुजारा भत्ता पाने की हकदार है।”
मामला क्या है?: आर्मी ऑफिसर पति और MBA पास पत्नी का कानूनी विवाद
यह विधिक विवाद एक सैन्य अधिकारी और उनकी उच्च शिक्षित पत्नी के बीच का है।
पृष्ठभूमि: दोनों की शादी दिसंबर 2012 में हुई थी, लेकिन मतभेदों के कारण मई 2015 से वे अलग रह रहे हैं। पति भारतीय सेना (Indian Army) में एक सेवारत अधिकारी हैं, जबकि पत्नी एक MBA (HR) ग्रेजुएट हैं। पति ने क्रूरता और परित्याग के आधार पर हिंदू विवाह अधिनियम (HMA) की धारा 13(1)(ia) और (ib) के तहत तलाक का मुकदमा दायर किया था।
ट्रायल के दौरान अंतरिम राहत: जनवरी 2024 में फैमिली कोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24 के तहत पत्नी की अर्जी स्वीकार करते हुए पति के नियोक्ता (सेना) को निर्देश दिया कि वह पति के ग्रॉस वेतन से 30% की कटौती कर सीधे पत्नी को प्रति माह भरण-पोषण के रूप में दे। इस आदेश को दिल्ली हाई कोर्ट ने भी बरकरार रखा था।
तलाक और नया विवाद: जुलाई 2025 में फैमिली कोर्ट ने पति के पक्ष में फैसला सुनाते हुए शादी को भंग (Dissolve) कर दिया। इसके खिलाफ पत्नी ने दिल्ली हाई कोर्ट में अपील दायर की और मांग की कि ट्रायल के दौरान मिल रहा भरण-पोषण अपील के लंबित रहने तक जारी रहना चाहिए। पति का तर्क था कि चूंकि तलाक हो चुका है, इसलिए धारा 24 के तहत अंतरिम व्यवस्था समाप्त हो गई है और पत्नी को अब धारा 25 (स्थायी गुजारा भत्ता) के तहत अलग से अर्जी लगानी चाहिए।
हाई कोर्ट का विधिक विश्लेषण: “कमाने की क्षमता” बनाम “वास्तविक कमाई”
जस्टिस विवेक चौधरी और जस्टिस रेनू भटनागर की बेंच ने पति की सभी दलीलों को खारिज करते हुए कानून के मूल सिद्धांतों को रेखांकित किया।
अपील मूल मुकदमे का ही हिस्सा: कोर्ट ने ‘जगदीश सिंह बनाम माधुरी देवी’ मामले में सुप्रीम कोर्ट के नजीर का हवाला देते हुए कहा कि जब तक अपील का अंतिम फैसला नहीं आ जाता, तब तक वैवाहिक विवाद को पूरी तरह समाप्त या अंतिम (Final) नहीं माना जा सकता। इसलिए धारा 24 के तहत अंतरिम भरण-पोषण का अधिकार अपील के दौरान भी जारी रहता है।
योग्यता का मतलब कमाई नहीं: पति ने दलील दी थी कि पत्नी MBA ग्रेजुएट है और उसके पास पुराना वर्क एक्सपीरियंस भी है, इसलिए वह खुद का खर्च उठाने में पूरी तरह सक्षम है। सुप्रीम कोर्ट के ‘शैलजा बनाम खोब्बान्ना’ फैसले का हवाला देते हुए हाई कोर्ट ने कहा, कमाने की क्षमता (Capability) और वास्तविक कमाई (Actual Earning) के बीच का अंतर बुनियादी है। केवल उच्च शिक्षित होना यह साबित नहीं करता कि पत्नी वास्तव में कमा रही है।
पुराना आदेश दोबारा नहीं खुलेगा: कोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट जनवरी 2024 में ही पत्नी की योग्यता और बैंक स्टेटमेंट जांचने के बाद 30% भरण-पोषण तय कर चुका है, जो फाइनल हो चुका था। इसलिए पति अब अपील के स्तर पर उसी पुराने वित्तीय मुद्दे को दोबारा नहीं उठा सकता।
धारा 24 और 25 का अलग क्षेत्र: कोर्ट ने साफ किया कि धारा 24 मुकदमे के दौरान (अपील सहित) तात्कालिक राहत के लिए है, जबकि धारा 25 मुकदमा पूरी तरह खत्म होने के बाद स्थायी गुजारा भत्ते के लिए है। एक की पेंडेंसी से दूसरे का अधिकार खत्म नहीं होता।
अदालत का अंतिम विधिक आदेश
अपील की गंभीरता और पत्नी के अधिकारों को ध्यान में रखते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय ने निम्नलिखित निर्देश जारी किए।
कटौती जारी रखने का निर्देश: सेना (पति के नियोक्ता) को आदेश दिया गया है कि वह पति के वर्तमान ग्रॉस वेतन से 30% की मासिक कटौती जारी रखे और उसे सीधे पत्नी के खाते में भेजे।
प्रभावी तिथि: यह आदेश 25 अगस्त 2025 (जिस दिन पत्नी ने हाई कोर्ट में यह अर्जी लगाई थी) से प्रभावी माना जाएगा और अपील के अंतिम निपटारे तक लागू रहेगा।
स्वतंत्र निर्णय: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि फैमिली कोर्ट में लंबित धारा 25 (स्थायी गुजारा भत्ता) की अर्जी पर इस आदेश का कोई असर नहीं पड़ेगा और उसका फैसला गुण-दोष के आधार पर स्वतंत्र रूप से होगा।
विधिक केस शीट: दिल्ली हाई कोर्ट अंतरिम भरण-पोषण विस्तार समीक्षा
| कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियां | उच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और वर्तमान निर्णय |
| संबंधित अदालत | दिल्ली उच्च न्यायालय (Division Bench) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस विवेक चौधरी और जस्टिस रेनू भटनागर |
| मुख्य विधिक धारा | धारा 24, हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (अंतरिम भरण-पोषण) |
| तलाक डिक्री का प्रभाव | अपील लंबित होने के कारण डिक्री के बावजूद अंतरिम भरण-पोषण बंद नहीं होगा |
| वित्तीय कटौती का प्रतिशत | पति के ग्रॉस वेतन (Statutory Deductions के बाद) का 30% |
| आदेश की प्रभावी तिथि | 25 अगस्त 2025 से अपील के निस्तारण तक |
अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक न्याय का आखिरी दरवाजा (Appellate Remedy) खुला है, तब तक अंतरिम भरण-पोषण का विधिक अधिकार भी जिंदा रहेगा। यह फैसला ‘सक्षम होने’ और ‘वास्तव में कमाने’ के विधिक अंतर को भी मजबूत करता है, जो भविष्य के वैवाहिक मुकदमों में एक महत्वपूर्ण नजीर बनेगा।

