Tuesday, September 1, 2026
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Freedom of Press: हाथ में मोबाइल-माइक लेकर हर कोई रिपोर्टर नहीं बन जाएगा….प्रेस की आजादी पर रेगुलेशन की जरूरत, पढ़िए अदालती फरमान

Freedom of Press: डिजिटल मीडिया और यूट्यूब पत्रकारों (YouTube Reporters) के नाम पर चल रही अनियंत्रित पत्रकारिता पर दिल्ली हाईकोर्ट ने बेहद तल्ख टिप्पणी की है।

पत्रकारिता का प्रशिक्षण, नैतिक आधार या जवाबदेही भी पत्रकार के लिए जरूरी: अदालत

हाईकोर्ट के जस्टिस गिरीश कठपालिया की एकल पीठ ने साफ कहा कि अब वक्त आ गया है जब विधायिका (Legislature) को प्रेस की स्वतंत्रता को बनाए रखने के साथ-साथ पेशेवर जवाबदेही और नैतिक मानक तय करने के लिए एक उचित नियामक ढांचे (Regulatory Framework) पर विचार करना चाहिए।कहा, लोकतांत्रिक समाज में प्रेस की स्वतंत्रता (Freedom of Press) एक अनिवार्य स्तंभ है, लेकिन इसका उपयोग गैर-जिम्मेदाराना पत्रकारिता, डराने-धमकाने या सार्वजनिक व्यवस्था को खतरे में डालने वाली सामग्री प्रसारित करने के लिए एक ढाल (Shield) के रूप में नहीं किया जा सकता। आज के दौर में, मोबाइल फोन और माइक से लैस कोई भी व्यक्ति खुद को ‘रिपोर्टर’ घोषित कर देता है, भले ही उसके पास कोई पत्रकारिता का प्रशिक्षण, नैतिक आधार या जवाबदेही न हो।

मामला क्या है?: यूट्यूबर्स से मारपीट और 1 साल की कैद

यह कानूनी मामला 4 जुलाई 2025 को दिल्ली के सीमापुरी इलाके की एक अनधिकृत कॉलोनी में हुई एक घटना से जुड़ा है।

घटना की पृष्ठभूमि: खुद को “मीडिया से” बताने वाले दो फ्रीलांस यूट्यूबर्स वहां वीडियो रिकॉर्डिंग कर रहे थे। आरोप है कि स्थानीय निवासियों की भीड़ ने उन पर हमला कर दिया, उनका कैमरा, मोबाइल फोन छीन लिया और बाइक को नुकसान पहुंचाया।

आरोपियों की जमानत: पुलिस ने इस मामले में भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत एफआईआर दर्ज कर आबिद अली और फुरकान को 5 जुलाई 2025 को गिरफ्तार किया था। आरोपी पिछले लगभग एक साल से जेल में बंद थे, जबकि ट्रायल अभी शुरू भी नहीं हुआ था। हाई कोर्ट ने अब दोनों आरोपियों को नियमित जमानत (Regular Bail) दे दी है।

कोर्ट का हंटर: माइक थमाकर जबरन जवाब मांगना पत्रकारिता नहीं’

जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस कठपालिया ने सोशल मीडिया के दौर में अनियंत्रित हो चुके मीडिया के धड़े पर कड़े सवाल उठाए।

जबरन चुप्पी का फायदा उठाना: कोर्ट ने नोट किया कि आजकल स्वघोषित पत्रकारों के लिए नागरिकों के सामने आक्रामक रूप से माइक अड़ाना आम बात हो गई है। यदि कोई व्यक्ति शांत रहना चुनता है, तो उसकी चुप्पी को सवालों से बचने के प्रयास के रूप में दिखाकर एक भ्रामक सार्वजनिक नैरेटिव (Misleading Narrative) तैयार कर दिया जाता है।

सामुदायिक सद्भाव को खतरा: अदालत ने आगाह किया कि कुछ मीडिया तत्व असत्यापित आरोपों के माध्यम से विशेष सामाजिक समूहों को निशाना बनाते हैं या उन्हें बदनाम करते हैं। ऐसी सनसनीखेज पत्रकारिता सामाजिक विभाजन को गहरा करने और सांप्रदायिक वैमनस्य या सार्वजनिक अव्यवस्था को भड़काने की क्षमता रखती है।

अधिकार के साथ कर्तव्य: कोर्ट ने कहा कि जनता की राय (Public Opinion) को आकार देने की शक्ति के साथ संयम, निष्पक्षता और जिम्मेदारी बरतने का कर्तव्य भी आता है।

दिल्ली पुलिस की कार्यप्रणाली पर कोर्ट भड़का

हाई कोर्ट ने आरोपियों को जमानत देते हुए दिल्ली पुलिस और जांच एजेंसी (Investigating Agency) की घोर लापरवाही पर गंभीर नाराजगी व्यक्त की।

अदालत की मदद न करना: कोर्ट ने कहा कि बार-बार निर्देश देने के बावजूद न तो जांच अधिकारी (IO) और न ही थाना प्रभारी (SHO) ने कोर्ट की प्रभावी सहायता की। कोर्ट ने टिप्पणी की, “वकील हड़ताल पर हो सकते हैं, लेकिन न तो जज और न ही पुलिस हड़ताल पर हैं (और न ही हो सकते हैं)।”

कहानियों में विरोधाभास: पुलिस ने पहले दावा किया कि आरोपी आबिद अली ने बस में घुसकर मारपीट की, लेकिन जब कोर्ट रूम में वीडियो चलाया गया तो यह दावा झूठा निकला। दूसरे आरोपी फुरकान की पहचान को लेकर भी पुलिस भ्रमित थी; सेशंस कोर्ट में उसे सफेद शर्ट में बताया गया जबकि चार्जशीट में उसे भूरी टी-शर्ट में दिखाया गया।

समानता का सिद्धांत: चूंकि मामले के चार अन्य सह-आरोपियों को पहले ही जमानत मिल चुकी थी, इसलिए कोर्ट ने कहा कि इन आवेदकों को अनिश्चित काल के लिए सलाखों के पीछे नहीं रखा जा सकता।

विधिक केस शीट: दिल्ली हाई कोर्ट प्रेस स्वतंत्रता एवं जमानत समीक्षा (2026)

कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियांउच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और वर्तमान निर्णय
संबंधित अदालतदिल्ली उच्च न्यायालय (High Court of Delhi)
माननीय न्यायाधीशजस्टिस गिरीश कठपालिया (Justice Girish Kathpalia)
दर्ज एफआईआर स्थलसीमापुरी पुलिस स्टेशन, दिल्ली (घटना वर्ष: 2025)
मुख्य कानूनी मुद्दायूट्यूब पत्रकारों पर हमला बनाम प्रेस की स्वतंत्रता और गैर-जिम्मेदार पत्रकारिता
जांच एजेंसी की स्थितिसाक्ष्यों में विरोधाभास और कोर्ट की सहायता न करने पर अदालत द्वारा फटकार
अदालत का अंतिम आदेशदोनों मुख्य आरोपियों (आबिद और फुरकान) को नियमित जमानत मंजूर।

संसद (Legislature) को अब वास्तव में डिजिटल और अनियंत्रित मीडिया के लिए एक ऐसी आचार संहिता या विधिक ढांचा तैयार करने की जरूरत है, जिससे अभिव्यक्ति की आजादी भी बची रहे और नागरिकों की निजता व सामाजिक शांति भी सुरक्षित रहे।

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