Sunday, September 20, 2026
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JAG OFFICERS: राफेल उड़ा सकती हैं महिलाएं, तो सेना की लीगल ब्रांच में क्यों कम हैं? सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से पूछा

JAG OFFICERS: सुप्रीम कोर्ट ने सेना की लीगल ब्रांच यानी जज एडवोकेट जनरल (जेएजी) में महिलाओं की कम नियुक्ति पर केंद्र सरकार से सवाल किया है।

महिला उम्मीदवारों के लिए सिर्फ तीन सीटें…

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस मनमोहन की बेंच ने यह टिप्पणी 8 मई को की। कोर्ट ने यह फैसला दो महिला अधिकारियों अर्शनूर कौर और आस्था त्यागी की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुरक्षित रखा। दोनों ने मेरिट में क्रमश: चौथा और पांचवां स्थान हासिल किया था, लेकिन महिला उम्मीदवारों के लिए सिर्फ तीन सीटें होने के कारण उन्हें नियुक्ति नहीं मिल सकी। कोर्ट ने कहा कि जब महिलाएं वायुसेना में राफेल जैसे फाइटर जेट उड़ा सकती हैं, तो फिर सेना की लीगल ब्रांच में उन्हें बराबरी का मौका क्यों नहीं दिया जा रहा है? यह मामला अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार कर रहा है, जो जल्द ही सुनाया जाएगा।

छह पदों में से सिर्फ तीन महिलाओं के लिए आरक्षित थे

महिला उम्मीदवारों ने कोर्ट में दलील दी कि कुल छह पदों में से सिर्फ तीन महिलाओं के लिए आरक्षित थे, जबकि मेरिट में वे पुरुषों से आगे थीं। कोर्ट ने कहा, “प्रथम दृष्टया हम याचिकाकर्ता अर्शनूर कौर के पक्ष में मामला मजबूत मानते हैं।” कोर्ट ने केंद्र को निर्देश दिया कि अर्शनूर को अगली ट्रेनिंग में शामिल करने की प्रक्रिया शुरू की जाए।

जब पदों को जेंडर न्यूट्रल बताया जाता है

महिला राफेल पायलट का उदाहरण देते हुए कोर्ट ने कहा कि अगर महिला पायलट युद्धबंदी बन सकती है, तो फिर सेना में लीगल ब्रांच में महिलाओं की संख्या सीमित क्यों है? कोर्ट ने पूछा कि जब पदों को जेंडर न्यूट्रल बताया जाता है, तो फिर महिलाओं के लिए सीमित वैकेंसी क्यों रखी जाती हैं? इस दौरान केंद्र की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि सेना में महिलाओं की नियुक्ति एक प्रगतिशील प्रक्रिया है, जो ऑपरेशनल जरूरतों के अनुसार तय होती है। उन्होंने कहा कि 2012 से 2023 तक पुरुष और महिला अधिकारियों की भर्ती का अनुपात 70:30 था, जिसे अब 2024 से 50:50 किया गया है।

सेना की हर ब्रांच में जेंडर आधारित वैकेंसी होती हैं

भाटी ने कहा कि सेना की हर ब्रांच में जेंडर आधारित वैकेंसी होती हैं, जो मैनपावर की जरूरतों के अनुसार तय की जाती हैं। उन्होंने कहा कि जेएजी ब्रांच सिर्फ कानूनी सलाह देने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सेना की ऑपरेशनल तैयारियों का भी अहम हिस्सा है। भाटी ने यह भी कहा कि पुरुष और महिला उम्मीदवारों के लिए अलग-अलग SSB (सेवा चयन बोर्ड) जरूरी हैं, क्योंकि इनमें शारीरिक परीक्षण शामिल होते हैं, जिनमें करीबी इंटरैक्शन होता है। उन्होंने कहा कि डिफेंस सर्विसेज में जेंडर इंटीग्रेशन एक विकसित होती प्रक्रिया है, जो समय-समय पर समीक्षा और अध्ययन के आधार पर तय होती है।

यह है महत्वपूर्ण बिंदु

  1. मेरिट में आगे होने के बावजूद महिला उम्मीदवारों को नियुक्ति नहीं
    अर्शनूर कौर और आस्था त्यागी ने मेरिट में पुरुषों से बेहतर प्रदर्शन किया, लेकिन महिला वैकेंसी सीमित होने के कारण चयन नहीं हो सका।
  2. सुप्रीम कोर्ट ने पूछा- जब पद जेंडर न्यूट्रल हैं तो फिर बंटवारा क्यों?
    कोर्ट ने कहा कि जेंडर न्यूट्रल का मतलब 50:50 नहीं, बल्कि यह है कि चयन में जेंडर का कोई फर्क न हो।
  3. केंद्र का पक्ष- ऑपरेशनल जरूरतों के अनुसार तय होती है भर्ती
    सरकार ने कहा कि सेना की जरूरतों और तैयारियों के अनुसार ही महिलाओं की नियुक्ति तय होती है, और यह एक प्रगतिशील प्रक्रिया है।
  4. महिला पायलट का उदाहरण देकर कोर्ट ने उठाया सवाल
    कोर्ट ने कहा कि जब महिला राफेल उड़ा सकती है और युद्धबंदी बन सकती है, तो फिर लीगल ब्रांच में उन्हें बराबरी का मौका क्यों नहीं?
  5. 2024 से भर्ती अनुपात 50:50 किया गया
    केंद्र ने बताया कि 2024 से पुरुष और महिला अधिकारियों की भर्ती का अनुपात 50:50 कर दिया गया है, जो पहले 70:30 था।

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