Legal Dignity: न्यायपालिका के भीतर से उपजे एक बेहद संगीन और सनसनीखेज आपराधिक मामले में पंजाब की एक अदालत ने पंजाब पुलिस को करारा झटका दिया है।
पुलिस की दूसरी ‘कैंसिलेशन रिपोर्ट’ (क्लोजर रिपोर्ट) को खारिज किया
ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट फर्स्ट क्लास (JMFC) प्रभा पराशर ने एक मृत एडिशनल डिस्ट्रिक्ट जज (ADJ) के घर से सोने-चांदी के गहने और नकदी चोरी करने के आरोपी सिविल जज विक्रमदीप सिंह और अन्य के खिलाफ दर्ज केस को बंद करने की पुलिस की दूसरी ‘कैंसिलेशन रिपोर्ट’ (क्लोजर रिपोर्ट) को भी खारिज कर दिया है। अदालत ने पुलिस की जांच पर गंभीर सवाल उठाते हुए मामले में वैज्ञानिक और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों के जरिए दोबारा गहन जांच (Further Investigation) के आदेश दिए हैं।
महज एक ‘गलतफहमी’ बताकर फाइल बंद नहीं कर सकती
अदालत ने कहा, जब एक जज के घर में चोरी का आरोप किसी दूसरे मौजूदा जज पर हो, तो पुलिस उसे महज एक ‘गलतफहमी’ बताकर फाइल बंद नहीं कर सकती। भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत दर्ज ये अपराध गैर-शमनीय (Non-compoundable – जिनमें समझौता नहीं हो सकता) हैं। सिर्फ ईमेल पर आए हलफनामों या शिकायतकर्ता के पीछे हट जाने से केस खत्म नहीं होगा। पुलिस को यह जांचना ही होगा कि उस रात सीसीटीवी फुटेज में दिख रहे बैगों में क्या ले जाया गया था और आरोपी जज की कॉल डिटेल्स क्या कहती हैं।
पूरा मामला क्या है?: ADJ की मौत की रात ‘जज साहब’ के घर में संदेहास्पद एंट्री
यह पूरा नाटकीय घटनाक्रम पटियाला के लाहौरी गेट पुलिस स्टेशन में 21 मार्च (2026) को दर्ज एक एफआईआर (FIR) से जुड़ा है।
अस्पताल में मौत, घर पर छापा: संगरूर के तत्कालीन एडिशनल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज (ADJ) कंवलजीत सिंह का 1 अगस्त 2025 को अमर अस्पताल में निधन हो गया था। आरोप है कि उसी रात जब पूरा परिवार सदमे में था, सिविल जज विक्रमदीप सिंह, मृत जज की हाउसहेल्प अमरजीत कौर उर्फ पिंकी, एक सरकारी अधिकारी गौरव गोयल और एक अज्ञात व्यक्ति तीन अलग-अलग कारों में मृत जज के पटियाला स्थित निवास पर पहुंचे।
गहने और कैश गायब करने का आरोप: पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला के लॉ विभाग के प्रोफेसर डॉ. भूपिंदर सिंह विर्क (जिन्हें मृत जज के बेटे ने पावर ऑफ अटॉर्नी दी थी) ने शिकायत दर्ज कराई कि सीसीटीवी फुटेज के अनुसार, गौरव गोयल बाहर रुक गए जबकि जज विक्रमदीप सिंह और बाकी दो लोग घर के अंदर गए। उन्होंने अलमारियों को खंगाला और वहां रखे पुश्तैनी सोने के आभूषण, जेवरात और बड़ी मात्रा में कैश लेकर चले गए।
केस में मोड़: ‘गलतफहमी’ का दावा और पुलिस की जल्दबाजी
इस हाई-प्रोफाइल मामले में अप्रैल (2026) में पटियाला कोर्ट ने आरोपी जज विक्रमदीप सिंह की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी थी, जिसके तुरंत बाद पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने उनका तबादला पटियाला से तरनतारन जिला अदालत में कर दिया था।
इसके बाद केस में एक अजीब मोड़ आया:
शिकायतकर्ता के सुर बदले: 16 अप्रैल को शिकायतकर्ता प्रोफेसर विर्क ने पुलिस को एक पूरक बयान (Supplementary Statement) देकर कहा कि गायब हुआ सामान और नकदी घर में ही मिल गई है। यह एफआईआर महज़ एक ‘गलतफहमी’ का नतीजा थी।
आरोपी जज की दलील: आरोपी जज विक्रमदीप सिंह का दावा था कि मृत ADJ के बेटे अंगदपाल सिंह ने (जो उस समय कनाडा में थे) फोन पर उनसे कहा था कि वे घर जाकर कीमती सामान सुरक्षित कर लें। जज ने दावा किया कि बाद में उन्होंने सारा सामान अंगदपाल को सुरक्षित लौटा दिया था।
पुलिस का रुख: शिकायतकर्ता के यू-टर्न लेते ही पंजाब पुलिस ने मामले को रफा-दफा करने के लिए अप्रैल में पहली कैंसिलेशन रिपोर्ट दाखिल की, जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया। पुलिस ने दोबारा जांच का नाटक किया और जुलाई में फिर से क्लोजर रिपोर्ट लगा दी, जिसे मजिस्ट्रेट प्रभा पराशर ने 10 जुलाई के अपने आदेश में पूरी तरह ठुकरा दिया।
कोर्ट की फटकार: ईमेल वाले हलफनामे पर भरोसा क्यों? मजिस्ट्रेट के 7 सख्त निर्देश
मजिस्ट्रेट प्रभा पराशर ने साफ कहा कि पुलिस ने अप्रैल में उनके द्वारा उठाई गई कमियों को दूर करने के बजाय महज़ कागजी खानापूर्ति की है। कोर्ट ने जांच अधिकारी (IO) को 7 बिंदुओं पर सख्त और वैज्ञानिक जांच करने का हुक्म दिया है।
न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा पुलिस को दिए गए 7 कड़े आदेश
मजिस्ट्रेट ने सख्त लहजे में कहा कि पुलिस ने आरोपी जज के पिता द्वारा दिए गए एक स्पष्टीकरण पत्र को ही अंतिम सच मान लिया, जबकि जांच अधिकारी का काम उस दावे को स्वतंत्र रूप से सत्यापित (Independently Verify) करना था।
- CCTV फुटेज की जांच: फुटेज में आरोपी जो बैग ले जाते दिख रहे हैं, उनमें वास्तव में क्या सामान था, उसकी सटीक पहचान की जाए।
- इन्वेंट्री मिलान: चोरी गए सामान और कानूनी वारिसों (बेटों) को लौटाए गए सामान की एक मुकम्मल सूची बनाकर उनका मिलान किया जाए।
- रिकवरी की तारीख/स्थान: हर एक आभूषण और कैश किस तारीख को, किस जगह और किस तरीके से बेटों को सौंपा गया, उसकी रसीद या दस्तावेजी सबूत लाएं।
- CDR और कॉल रिकॉर्डिंग: आरोपी जज और मृत जज के बेटे के बीच हुई बातचीत के कॉल डिटेल रिकॉर्ड्स (CDR) और उपलब्ध हो तो वॉइस रिकॉर्डिंग लाएं।
- बेटों के बयान (VC के जरिए): ईमेल पर आए हलफनामों के बजाय मृत जज के बेटों (अंगदपाल व अर्जनपाल) के बयान व्यक्तिगत रूप से या वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज किए जाएं।
- सह-आरोपियों की भूमिका: सीसीटीवी में दिख रही हाउसहेल्प पिंकी और सरकारी अफसर गौरव गोयल की व्यक्तिगत भूमिका की स्वतंत्र जांच हो।
- इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य: ईमेल से आए हलफनामे, स्क्रीनशॉट्स और डिजिटल सामग्रियों का 65B सर्टिफिकेट के साथ कोर्ट रिकॉर्ड पर रखा जाए।
केस शीट: पंजाब कोर्ट बनाम जज विक्रमदीप सिंह चोरी मामला समीक्षा (2026)
| कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियां | जिला अदालत की विधिक स्थिति और वर्तमान स्थिति |
| संबंधित अदालत | ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट फर्स्ट क्लास (JMFC), पटियाला, पंजाब |
| माननीय न्यायाधीश | प्रभा पराशर (Judicial Magistrate Ist Class) |
| आरोपी न्यायिक अधिकारी | सिविल जज विक्रमदीप सिंह (तत्कालीन पटियाला, वर्तमान तरनतारन) |
| पीड़ित पक्ष | दिवंगत एडिशनल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज कंवलजीत सिंह का परिवार |
| लागू कानून/धाराएं | भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 331(4) और 305 |
| अपराध की प्रकृति | गैर-compoundable (गैर-शमनीय): शिकायतकर्ता के चाहने पर भी केस बंद नहीं हो सकता। |
| अदालत का अंतिम निर्णय | दूसरी क्लोजर रिपोर्ट खारिज; पुलिस को नई वैज्ञानिक जांच के साथ फ्रेश रिपोर्ट पेश करने का आदेश। |
मजिस्ट्रेट प्रभा पराशर की अहम टिप्पणी
मजिस्ट्रेट प्रभा पराशर ने इस मामले में जिस अनुकरणीय न्यायिक निडरता का परिचय दिया है, वह काबिले तारीफ है। उन्होंने पुलिस को साफ संदेश दिया है कि बीएनएस (BNS) के तहत चोरी और गंभीर अपराधों के मामले ‘पब्लिक रॉन्ग’ (समाज के प्रति अपराध) होते हैं, जिन्हें पीड़ित के मुकर जाने पर भी बंद नहीं किया जा सकता। अब देखना यह है कि पंजाब पुलिस कॉल डिटेल्स और सीसीटीवी की इस वैज्ञानिक आंच में अपने ही बिरादरी के एक जज के खिलाफ कितनी ईमानदारी से सबूत जुटाती है।

