Indian Navy: केरल के तटीय इलाके में मालवाहक जहाज ‘एमएससी एल्सा-3’ (MSC Elsa-3) के दुर्घटनाग्रस्त होकर डूबने और उससे फैले खतरनाक रसायनों व तेल (Oil Spill) के कारण हुए गंभीर पर्यावरणीय नुकसान पर केरल हाईकोर्ट ने बेहद कड़ा रुख अपनाया है।
खतरनाक रसायनों व तेल से हो रहा गंभीर पर्यावरणीय नुकसान
हाईकोर्ट के जस्टिस राजा विजयाराघवन वी. और जस्टिस के.वी. जयकुमार की खंडपीठ ने ‘टी.एन. प्रतापन बनाम भारत संघ व अन्य’ से जुड़ी जनहित याचिकाओं पर सुनवाई की। अदालत ने केंद्र सरकार को नौसेना की तैनाती की संभावना तलाशने के सख्त निर्देश दिए हैं। किसी निजी विदेशी शिपिंग कंपनी द्वारा नियुक्त कन्सल्टेंट्स की रिपोर्ट को अंतिम सच नहीं माना जा सकता, जिसने दावा किया है कि समुद्र की तलहटी (Seabed) में डूबे जहाज और कंटेनरों से पर्यावरण को कोई खतरा नहीं है। हमारे पास भारतीय नौसेना (Indian Navy) जैसी सक्षम सेना है जिसके पास गहरे समुद्र में गोताखोरी (Saturation Diving), रिमोटली ऑपरेटेड व्हीकल (ROV) और आईएनएस निस्तार (INS Nistar) जैसे अत्याधुनिक डाइविंग सपोर्ट वेसल मौजूद हैं। केंद्र सरकार को तुरंत देखना चाहिए कि क्या समुद्र के भीतर हुए नुकसान के स्वतंत्र आकलन के लिए नौसेना को तैनात किया जा सकता है।
मामला क्या है?: MSC एल्सा-3 हादसा और विरोधाभासी रिपोर्टें
यह पूरा कानूनी विवाद केरल तट के पास डूबे एक विशाल मालवाहक जहाज के मलबे और उसके भीतर मौजूद खतरनाक रसायनों से होने वाले नुकसान के मुआवजे व पर्यावरण बहाली (Environmental Restoration) से जुड़ा है।
निजी कंपनी का दावा: डूबे हुए जहाज की मालिक, ‘मेडिटेरेनियन शिपिंग कंपनी’ (MSC) ने अपनी निजी कन्सल्टेंट्स की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कोर्ट में दावा किया कि समुद्र की तलहटी में पड़े कंटेनर जहाजों के आवागमन (Navigational Hazard) या पर्यावरण के लिए कोई खतरा नहीं हैं।
महानिदेशक शिपिंग (DGS) की चेतावनी: इसके विपरीत, भारत के महानिदेशक शिपिंग (Directorate General of Shipping) ने अदालत में हलफनामा दायर कर साफ किया कि डूबे हुए कंटेनर पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा हैं। जहाज में ‘कैल्शियम कार्बाइड’ (Calcium Carbide) जैसी खतरनाक सामग्री लदी थी, जो अंतरराष्ट्रीय समुद्री खतरनाक सामान (IMDG) कोड के दायरे में आती है।
हाई कोर्ट की विधिक टिप्पणियां: निजी रिपोर्टों पर भरोसा क्यों नहीं?
सुनवाई के दौरान जब केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASGI) पी. श्रीकुमार ने कहा कि वे अंतिम कार्रवाई से पहले जारी जांच के नतीजों का इंतजार कर रहे हैं, तो अदालत ने इस देरी पर नाराजगी जताई। ASGI ने भी कोर्ट के सुर में सुर मिलाते हुए कहा, “हम जहाज मालिक (MSC) की निजी रिपोर्ट को निर्णायक रूप से स्वीकार नहीं कर सकते। हमें अपने मैदानी अध्ययन (Field Study) के साथ इसकी तुलना करनी होगी। कृपया हमें 30 जुलाई तक का समय दें। इस पर हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार को जांच में तेजी लाने के लिए देश की सैन्य शक्ति का उपयोग करने का सुझाव दिया।
भारतीय नौसेना की विशेषज्ञता और INS निस्तार का उपयोग
अदालत ने न्यायमित्र (Amicus Curiae) की रिपोर्ट का हवाला देते हुए रेखांकित किया कि भारतीय नौसेना के पास गहरे समुद्र में बचाव कार्य (Salvage Expertise) और गोताखोरी की बेजोड़ क्षमता है। नौसेना के पास स्वदेशी रूप से डिजाइन किया गया डाइविंग सपोर्ट वेसल ‘आईएनएस निस्तार’ (INS Nistar) है, जो समुद्र की अगाध गहराइयों में जाकर ‘सैचुरेशन डाइविंग’ ऑपरेशन्स को अंजाम दे सकता है। “ASGI तुरंत रक्षा मंत्रालय (Ministry of Defence) से निर्देश प्राप्त करें कि क्या समुद्र की तलहटी में पड़े मलबे की वास्तविक स्थिति और पर्यावरण को हो रहे नुकसान का पता लगाने के लिए नौसेना को काम पर लगाया जा सकता है।”
स्वतंत्र वैज्ञानिक जांच अनिवार्य
अदालत ने यह भी नोट किया कि राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान (NIO) को भी दीर्घकालिक प्रभाव अध्ययन का काम सौंपा गया है, लेकिन केवल इतना ही यह जांचने के लिए काफी नहीं है कि विदेशी कंपनी की रिपोर्ट कितनी विश्वसनीय है। हमारे मन में कोई संदेह नहीं है कि प्रतिवादी (MSC) की रिपोर्ट में निहित निष्कर्षों को सत्यापित करने के लिए एक स्वतंत्र विशेषज्ञ एजेंसी या वैज्ञानिक सलाहकार को नियुक्त किया जाना चाहिए।
केस शीट: केरल हाई कोर्ट समुद्री पर्यावरण क्षति एवं नौसेना तैनाती समीक्षा (2026)
| कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियां | उच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और मुख्य निर्देश |
| संबंधित अदालत | केरल उच्च न्यायालय (Kerala High Court) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस राजा विजयाराघवन वी. और जस्टिस के.वी. जयकुमार |
| मुख्य याचिकाकर्ता | टी.एन. प्रतापन (जनहित याचिका – PIL) |
| दुर्घटनाग्रस्त जहाज | एमएससी एल्सा-3 (MSC Elsa-3) |
| खतरनाक कार्गो/रसायन | कैल्शियम कार्बाइड (IMDG कोड के तहत वर्गीकृत) |
| अदालत का मुख्य निर्देश | रक्षा मंत्रालय से नौसेना और INS निस्तार की तैनाती पर निर्देश लेने के आदेश। |
| अगली सुनवाई | अगस्त 2026 के पहले सप्ताह में काउंटर एफिडेविट के साथ सूचीबद्ध। |
कोर्ट का अंतिम आदेश और आगे की राह
केरल हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार (ASGI) को निर्देश दिया है कि वह रक्षा मंत्रालय से बात करके यह स्पष्ट करे कि क्या नौसेना के गोताखोर और रोबोटिक उपकरण (ROVs) समुद्र के नीचे जाकर सच का पता लगा सकते हैं। इसके साथ ही, कोर्ट ने केंद्र सरकार के अलावा अन्य सभी संबंधित प्रतिवादियों से भी अगस्त में होने वाली अगली सुनवाई से पहले अपने स्वतंत्र जवाबी हलफनामे (Independent Counter Affidavits) दाखिल करने को कहा है।

