Reproductive Autonomy: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सरोगेसी (किराए की कोख) के नियमों और उम्र सीमा को लेकर एक बेहद संवेदनशील और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।
अनुच्छेद 21 के तहत किसी भी जोड़े की ‘प्रजनन स्वायत्तता’ का अधिकार भी शामिल
हाईकोर्ट के जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने ‘अंशु शुक्ला और अन्य बनाम भारत संघ व अन्य’ मामले में फैसला सुनाते हुए साफ किया कि नया सरोगेसी कानून आने से पहले ही माता-पिता बनने की कानूनी प्रक्रिया (भ्रूण फ्रीजिंग) शुरू करने वाले जोड़ों को इस उम्र सीमा के पेंच से छूट मिलनी चाहिए। अदालत ने कहा, संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्राप्त व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Personal Liberty) के अधिकार में किसी भी जोड़े की ‘प्रजनन स्वायत्तता’ (Reproductive Autonomy) यानी संतानोत्पत्ति का अधिकार भी शामिल है। यदि किसी दंपत्ति ने सरोगेसी (Regulation) अधिनियम, 2021 के लागू होने से पहले ही अपने भ्रूण (Embryos) बनाकर सुरक्षित (Freeze) रख लिए थे, तो उन पर नए कानून के तहत तय की गई सख्त उम्र सीमा को जबरन या भूतलक्षी (Retrospective) रूप से लागू नहीं किया जा सकता। ऐसा करना उनके मौलिक अधिकारों का हनन होगा।
मामला क्या है?: 17 साल का इंतजार और 50 वर्ष की उम्र सीमा
यह याचिका एक ऐसे दंपत्ति की ओर से दायर की गई थी जिनकी शादी को 17 साल से ज्यादा हो चुके थे और तमाम फर्टिलिटी ट्रीटमेंट (Fertility Treatment) के बाद भी वे प्राकृतिक रूप से माता-पिता नहीं बन पा रहे थे।
2015 में भ्रूण किए सुरक्षित: डॉक्टरों की सलाह पर इस जोड़े ने 18 जुलाई 2015 को ही अपने तीन भ्रूणों (Embryos) को बनाकर लैब में सुरक्षित (Freeze) रखवा दिया था ताकि वे भविष्य में सरोगेसी के जरिए माता-पिता बन सकें।
उम्र का पेंच और नया कानून: जब तक यह दंपत्ति सरोगेसी की प्रक्रिया को अंतिम रूप देने के लिए आगे बढ़ा, तब तक 25 जनवरी 2022 से देश में नया ‘सरोगेसी (रेगुलेशन) एक्ट, 2021’ लागू हो गया। इस नए कानून के तहत सरोगेसी चाहने वाली महिला की अधिकतम उम्र 50 वर्ष तय की गई है, और याचिकाकर्ता पत्नी इस वैधानिक उम्र सीमा को पार कर चुकी थीं।
अदालत से गुहार: जोड़े ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाकर गुहार लगाई कि वे 2015 से ही इस प्रक्रिया में लगे हैं, इसलिए उन्हें परोपकारी सरोगेसी (Altruistic Surrogacy) के जरिए माता-पिता बनने की अनुमति दी जाए।
हाई कोर्ट की विधिक व्याख्या: क्या कहता है नया कानून और सुप्रीम कोर्ट के नजीर?
नए सरोगेसी कानून की धारा 4(iii)(c)(I) के तहत सरोगेसी का लाभ उठाने के लिए महिला की उम्र 23 से 50 वर्ष और पुरुष की उम्र 26 से 55 वर्ष के बीच होना अनिवार्य है। लेकिन इलाहाबाद हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को राहत देते हुए दो मुख्य कानूनी पहलुओं को रेखांकित किया।
सुप्रीम कोर्ट के ‘विजया कुमारी’ फैसले का हवाला
हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले विजया कुमारी एस. बनाम भारत संघ का हवाला दिया, जिसमें शीर्ष अदालत ने माना था कि भ्रूण (Embryos) का निर्माण और उन्हें फ्रीज कर सुरक्षित रखना ही इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि दंपत्ति ने सरोगेसी के जरिए माता-पिता बनने के अपने इरादे को कानूनी रूप से स्थापित (Crystallise) कर लिया है। एक बार भ्रूण फ्रीज होने के बाद, जोड़े की तरफ से अपनी मंशा साबित करने के लिए किसी अन्य कदम की आवश्यकता नहीं रह जाती।
‘अरुण मुथुवेल’ मामले की नजीर
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के एक अन्य फैसले अरुण मुथुवेल बनाम भारत संघ का भी जिक्र किया, जहां सुप्रीम कोर्ट ने उन जोड़ों को विशेष राहत दी थी जिन्होंने सरोगेसी कानून लागू होने से पहले अपने भ्रूण फ्रीज करा लिए थे। हाई कोर्ट ने कहा कि इन परिस्थितियों में वैधानिक उम्र प्रतिबंध याचिकाकर्ताओं पर लागू नहीं माना जा सकता।
केस शीट: इलाहाबाद हाई कोर्ट सरोगेसी आयु सीमा एवं प्रजनन अधिकार समीक्षा (2026)
| कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियां | उच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और मुख्य आदेश |
| संबंधित अदालत | इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी |
| याचिकाकर्ता | अंशु शुक्ला और अन्य |
| प्रासंगिक कानून और धारा | सरोगेसी (रेगुलेशन) एक्ट, 2021 की धारा 4(iii)(c)(I) |
| संवैधानिक संरक्षण | अनुच्छेद 21 (Right to Reproductive Autonomy – प्रजनन स्वायत्तता) |
| अदालत का अंतिम निर्देश | उम्र सीमा से छूट; 3 सप्ताह के भीतर सीएमओ (CMO) लखनऊ को आदेश पारित करने के निर्देश। |
कोर्ट का अंतिम आदेश और आगे की राह
हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता जोड़े को सरोगेसी प्रक्रिया के साथ आगे बढ़ने की पूरी अनुमति दे दी है।
तीन सप्ताह की समय सीमा: अदालत ने दंपत्ति को निर्देश दिया है कि वे इस आदेश के साथ तीन सप्ताह के भीतर सक्षम प्राधिकारी या मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO), लखनऊ के समक्ष धारा 35 के तहत आवेदन करें।
अधिकारियों को सख्त निर्देश: सक्षम प्राधिकारी को निर्देश दिया गया है कि वे सुप्रीम कोर्ट के इन तमाम फैसलों और वर्तमान आदेश को ध्यान में रखते हुए दंपत्ति की सुनवाई करें और उनके पक्ष में एक तार्किक व सकारात्मक आदेश (Reasoned Order) पारित करें।

