Tuesday, October 27, 2026
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Legal Term: दुष्कर्म साबित करने के लिए बाल पीड़िता द्वारा पेनेट्रेशन (प्रवेश) शब्द बोलना अनिवार्य नहीं; गवाही को उम्र और आघात के संदर्भ में समझा जाए

हाईकोर्ट की मुख्य कानूनी टिप्पणियां

  • तकनीकी शब्दों की बाध्यता नहीं: हाईकोर्ट ने कहा कि साढ़े चार साल की बच्ची से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह अपराध के कानूनी तत्वों को समझे या यौन कृत्य का सटीक विवरण तकनीकी शब्दों में दे।“बाल गवाह की गवाही को तकनीकी, कानूनी या चिकित्सीय शब्दावली के आधार पर नहीं परखा जा सकता, बल्कि इसके सार, आसपास की परिस्थितियों और उस स्वाभाविक तरीके पर विचार करके सराहा जाना चाहिए, जिससे इतनी कम उम्र का बच्चा बलात्कार की दुखद घटना का वर्णन करता है।”
  • बच्चों की भाषा का सही अर्थ निकाला जाए: ट्रायल कोर्ट ने यह मानकर आरोपी को बरी किया था कि बच्ची ने बयान में “पेनेट्रेशन” (Penetration) शब्द का प्रयोग नहीं किया था। इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि बच्चे की अपनी सरल भाषा भी स्पष्ट रूप से पेनेट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट का संकेत देती है, जिसे केवल तकनीकी शब्द के अभाव में खारिज नहीं किया जा सकता।
  • सिखाए-पढ़ाए जाने (Tutoring) की आशंका: कोर्ट ने माना कि कम उम्र के बच्चों को सिखाना-पढ़ाना आसान होता है, लेकिन केवल इस आशंका के आधार पर उनकी गवाही को खारिज नहीं किया जा सकता। इसके लिए कोर्ट को सतर्कतापूर्वक गवाही का विश्लेषण करना चाहिए।
  • जांच की कमियां गवाही को कमजोर नहीं करतीं: पुलिस द्वारा आरोपी और पीड़िता के रक्त समूह (Blood Group) का मिलान न कर पाने जैसी जांच की कमियों के बावजूद, पीड़िता का बयान और अन्य साक्ष्य अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त हैं।

नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट ने बाल यौन उत्पीड़न मामलों में साक्ष्य के मूल्यांकन को लेकर एक महत्वपूर्ण और संवेदनशील विधिक व्यवस्था दी है।

न्यायमूर्ति नवीन चावला और न्यायमूर्ति रविंदर डुडेजा की खंडपीठ ने 2010 के निचली अदालत के फैसले को पलटते हुए साढ़े चार साल की बच्ची से दुष्कर्म के आरोपी को आईपीसी की धारा 376(2)(f) के तहत दोषी करार दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यौन उत्पीड़न की शिकार मासूम बच्ची की गवाही का मूल्यांकन तकनीकी, कानूनी या चिकित्सीय शब्दावली (Technical, Legal or Medical Terminology) की कसौटी पर नहीं किया जा सकता।

उच्च न्यायालय की प्रमुख विधिक टिप्पणियां

1. तकनीकी शब्दावली की अपेक्षा अनुचित अदालत ने बाल गवाह के बयानों की प्रकृति पर जोर देते हुए कहा: “एक बाल गवाह की गवाही का मूल्यांकन तकनीकी, कानूनी या मेडिकल शब्दावली की कसौटी पर नहीं किया जा सकता, बल्कि इसके मूल तत्व (Substance), आसपास की परिस्थितियों और उस स्वाभाविक तरीके पर विचार करके किया जाना चाहिए, जिस तरह इतनी कम उम्र का बच्चा बलात्कार जैसी दर्दनाक और आघातकारी (Traumatic) घटना का वर्णन करता है।”

2. बच्चों से कानूनी तत्वों की सटीकता की उम्मीद नहीं की जा सकती ट्रायल कोर्ट के संकीर्ण दृष्टिकोण को खारिज करते हुए पीठ ने रेखांकित किया: “इतनी कोमल उम्र के बच्चे से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह किसी अपराध के कानूनी तत्वों (Legal Ingredients) को समझे या व्यक्त करे, अथवा कथित यौन कृत्य का सटीकता के साथ वर्णन करे। घटना का उसका विवरण, यद्यपि बच्चों की भाषा में व्यक्त किया गया है, स्पष्ट रूप से पेनेट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट के घटित होने की पुष्टि करता है। इसे केवल इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता क्योंकि उसने स्पष्ट रूप से ‘पेनेट्रेशन’ (Penetration) शब्द का प्रयोग नहीं किया था।”

3. ट्यूटरिंग (सिखाए-पढ़ाए जाने) की आशंका और सूक्ष्म जांच पीठ ने स्पष्ट किया कि हालांकि कम उम्र के बच्चों को बहकाना या सिखाना आसान होता है, लेकिन केवल इस आशंका के आधार पर उनकी गवाही को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। अदालत को निष्पक्ष और सतर्क होकर गवाही की वास्तविकता परखनी चाहिए।

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मामले की पृष्ठभूमि और ट्रायल कोर्ट की त्रुटि

  • साढ़े चार साल की बच्ची से दरिंदगी: आरोपी पर साढ़े चार वर्ष की मासूम बच्ची के साथ दुष्कर्म का आरोप था।
  • ट्रायल कोर्ट का 2010 का फैसला: ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को आईपीसी की धारा 376 (बलात्कार) के आरोप से बरी कर दिया था और उसे केवल धारा 354 (छेड़छाड़/हमला) के तहत दोषी ठहराया था। निचली अदालत का मानना था कि चूंकि बच्ची ने अपने बयान में सीधे “पेनेट्रेशन” शब्द नहीं बोला, इसलिए बलात्कार का अपराध संदेह से परे साबित नहीं हुआ।
  • दिल्ली पुलिस की अपील: दिल्ली पुलिस ने इस दोषमुक्ति (Acquittal) के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दायर की थी।

हाईकोर्ट द्वारा दोषसिद्धि तय करने के मुख्य आधार

  1. घटना की बुनियादी याददाश्त: घटना के एक साल से अधिक समय बाद ट्रायल कोर्ट में बयान दर्ज होने के बावजूद, मासूम पीड़िता ने यौन उत्पीड़न से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्यों को स्पष्टता से याद रखा था।
  2. जांच की कमियां अभियोजन को कमजोर नहीं करतीं: हाईकोर्ट ने माना कि पुलिस जांच में कुछ खामियां—जैसे पीड़िता और आरोपी का ब्लड ग्रुप निर्धारित न कर पाना—मौजूद थीं, लेकिन ये कमियां रिकॉर्ड पर मौजूद प्रत्यक्ष, विश्वसनीय और पुष्टिकारक साक्ष्यों को खारिज नहीं करतीं।
  3. ट्रायल कोर्ट का भटकाव: खंडपीठ ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने चश्मदीद और वैज्ञानिक दोनों प्रकार के साक्ष्यों का आकलन करने में खुद को भटका लिया था और बलात्कार के घटकों की जांच करते समय एक अनावश्यक रूप से संकीर्ण दायरा अपनाया था।

गैर-जमानती वारंट और सजा पर सुनवाई

  • दोषी घोषित: हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का फैसला पलटते हुए आरोपी को आईपीसी की धारा 376(2)(f) के तहत गंभीर अपराध का दोषी ठहराया।
  • सजा की अवधि पर सुनवाई (10 सितंबर): सजा की मात्रा (Quantum of Sentence) पर सुनवाई के लिए मामले को 10 सितंबर 2026 को सूचीबद्ध किया गया है।
  • गैर-जमानती वारंट (NBW): सुनवाई के दौरान दोषी अदालत में उपस्थित नहीं था, जिसके चलते हाईकोर्ट ने उसे हिरासत में लेकर अदालत के समक्ष पेश करने के लिए गैर-जमानती वारंट जारी करने का आदेश दिया।

अदालत का अगला कदम

हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को “पूरी तरह से त्रुटिपूर्ण” करार देते हुए आरोपी को दोषी ठहराया है। चूूँकि आरोपी फैसले के समय अदालत में उपस्थित नहीं था, इसलिए उसकी पेशी के लिए गैर-जमानती वारंट (Non-Bailable Warrants) जारी किए गए हैं। सजा के प्रश्न (Quantum of Sentence) पर अगली सुनवाई 10 सितंबर 2026 को होगी।

Legal Term: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतदिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court)
पीठन्यायमूर्ति नवीन चावला एवं न्यायमूर्ति रवींद्र डुडेजा
ट्रायल कोर्ट का 2010 का आदेशआरोपी को दुष्कर्म (धारा 376) से बरी कर केवल हमले (धारा 354) के तहत दोषी ठहराया था।
हाईकोर्ट का अंतिम निर्णयबरी का आदेश रद्द; आरोपी IPC धारा 376(2)(f) के तहत दुष्कर्म का दोषी करार।
मुख्य कानूनी सिद्धांतबाल गवाह से कानूनी/तकनीकी शब्दावली (‘Penetration’) के इस्तेमाल की उम्मीद नहीं की जा सकती।
सजा पर सुनवाई10 सितंबर 2026 (गैर-जमानती वारंट जारी)
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