Tuesday, October 27, 2026
HomeSupreme CourtNALSAR Vs BCI: लॉ छात्रों के आचरण को नियंत्रित करने का BCI...

NALSAR Vs BCI: लॉ छात्रों के आचरण को नियंत्रित करने का BCI के पास कोई वैधानिक अधिकार नहीं; यह अधिकार सिर्फ विश्वविद्यालयों का, विस्तार से पढ़ें

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य निष्कर्ष और टिप्पणियां

  1. अधिकार क्षेत्र की सीमा (Jurisdiction of BCI): CJI सूर्य कांत ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया:“BCI का क्षेत्राधिकार तब शुरू होता है जब कोई व्यक्ति लॉ ग्रेजुएट बनकर वकील के रूप में पंजीकृत हो जाता है… BCI एक पंजीकृत वकील के आचरण को विनियमित कर सकती है, लेकिन कानून के छात्रों के आचरण को नहीं।”
  2. एडवोकेट्स एक्ट, 1961 का दायरा: पीठ ने अपने आदेश में दर्ज किया कि Advocates Act, 1961 BCI या किसी भी राज्य बार काउंसिल को विधि छात्रों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने की कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष शक्ति प्रदान नहीं करता है।
  3. संस्थानों की स्वायत्तता: अदालत ने कहा कि विश्वविद्यालयों में विचार-प्रकट करने और बोलने की स्वतंत्रता होती है। छात्रों के आचरण की निगरानी करने या कार्रवाई करने का सर्वाधिकार उनके अपने मूल संस्थान (Parent Institution/University) के नियमों के अधीन होता है।
  4. BCI के नोटिफिकेशन अवैध घोषित: भले ही BCI ने अपने आदेश वापस ले लिए थे, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने भविष्य के लिए मिसाल कायम करते हुए 13 अगस्त की BCI की सभी अधिसूचनाओं को “कानूनी अधिकार के बिना” (Without any authority of law) घोषित कर पूरी तरह निरस्त कर दिया।

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के विधिक क्षेत्राधिकार की सीमाएं तय करते हुए एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाया है।

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ ने हैदराबाद स्थित नालसार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ (NALSAR University of Law) के छात्रों के संदर्भ में BCI द्वारा 13 अगस्त को जारी किए गए सभी पत्रों व निर्देशों को पूरी तरह से अधिकारहीन (Without Authority of Law) घोषित करते हुए रद्द कर दिया। शीर्ष अदालत ने फैसला दिया है कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया या किसी भी राज्य बार काउंसिल (State Bar Council) के पास कानून के छात्रों (Law Students) के आचरण को विनियमित करने या उनके खिलाफ कोई दंडात्मक/अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का कोई वैधानिक अधिकार (Statutory Authority) नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट की प्रमुख विधिक टिप्पणियां

1. छात्रों पर BCI का नहीं, केवल मूल शिक्षण संस्थान का अधिकार अधिवक्ता अधिनियम, 1961 के तहत शक्तियों का विश्लेषण करते हुए पीठ ने स्पष्ट किया: “अधिवक्ता अधिनियम, 1961—जिसके तहत बीसीआई का गठन हुआ है—बीसीआई या किसी भी राज्य बार काउंसिल को कानून के छात्रों के खिलाफ कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई करने की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष (Express or Implied) शक्ति प्रदान नहीं करता। ऐसी शक्ति का प्रयोग केवल तभी शुरू होता है जब कोई लॉ ग्रेजुएट अधिनियम के तहत ‘अधिवक्ता’ के रूप में पंजीकृत हो जाता है। जहां तक छात्रों का संबंध है, उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने के लिए केवल उनका मूल संस्थान (Parent Institution) या विश्वविद्यालय के नियमों/उपनियमों के तहत प्राधिकृत संस्था ही सक्षम है।”

2. वकील के रूप में इनरोलमेंट के बाद ही लागू होता है BCI का अधिकार क्षेत्र सीजेआई सूर्यकांत ने मौखिक रूप से कहा: “लॉ की पढ़ाई पूरी करने और एक बार लॉ ग्रेजुएट के रूप में अधिवक्ता पंजीकृत हो जाने के बाद, आचरण को विनियमित करने के लिए BCI एक वैधानिक संस्था है। लेकिन छात्रों के मामले में BCI का कोई क्षेत्राधिकार नहीं है।”

Also Read; NALSAR Student Vs BCI-VII: NLSIU छात्रों पर CJI को दोबारा सार्वजनिक आमंत्रण भेजने का दबाव किसने डाला?; NALSAR स्टूडेंट बार काउंसिल ने उठाए सवाल

नालसार विवाद की पृष्ठभूमि

  • दीक्षांत समारोह को लेकर विरोध: नालसार (NALSAR) विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के प्रस्तावित दौरे और भागीदारी को लेकर कुछ छात्रों ने आपत्ति जताई थी।
  • BCI की एकतरफा कार्रवाई (13-14 अगस्त): बार काउंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा ने एक निर्देश जारी कर सभी राज्य बार काउंसिलों को आदेश दिया था कि वे अगले आदेश तक नालसार के 2026 बैच के स्नातकों का वकालत पंजीकरण (Enrolment) रोक दें।
  • विरोध के बाद वापस लिया पत्र: चौतरफा आलोचना के बाद BCI ने कुछ ही घंटों के भीतर अपना निर्देश वापस ले लिया था।
  • पूर्व छात्रों की याचिका: आदेश वापस लिए जाने के बावजूद नालसार के पूर्व छात्रों (मिहिरा सूद और अभिषेक तिवारी) ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर ऐसे मनमाने आदेशों की संवैधानिकता को चुनौती दी।

Also Read; NALSAR Student Vs BCI-VI: BCI अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा का लॉ छात्रों से माफीनामा; NALSAR दीक्षांत समारोह पर निकाले थे निर्देश, पत्र पढ़ें

अदालत में वकीलों की दलीलें

  • छात्रों की ओर से (वरिष्ठ अधिवक्ता के. परमेश्वर):
    • आदेश वापस लेने मात्र से यह सवाल खत्म नहीं हो जाता कि एक वैधानिक संस्था ने बिना किसी अधिकार क्षेत्र के ऐसा आदेश कैसे पारित कर दिया।
    • यह मामला विश्वविद्यालय परिसर के भीतर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (Freedom of Speech and Expression) से जुड़ा है, और ऐसे मनमाने आदेशों से छात्रों में भय का माहौल बनता है।
  • BCI की ओर से (वरिष्ठ अधिवक्ता व चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा):
    • BCI ने आदेश जारी होने के एक घंटे के भीतर ही इसे पूरी तरह वापस ले लिया था।
    • बार काउंसिल की बैठक में मामला पहले ही समाप्त हो चुका है और अब इस पर आगे किसी विवाद की आवश्यकता नहीं है।

अंतिम आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने मामले का निस्तारण करते हुए स्पष्ट घोषणा की:

  1. नोटिफिकेशन पूरी तरह रद्द: BCI द्वारा 13 अगस्त को जारी सभी निर्देश और बाद के संशोधित आदेश पूरी तरह से गैर-कानूनी और अधिकार क्षेत्र से बाहर थे।
  2. अंतरिम रोक को पूर्ण आदेश बनाया: पूर्व में छात्रों के इनरोलमेंट रोकने पर लगाई गई अंतरिम रोक को सुप्रीम कोर्ट ने अंतिम रूप से पुष्टि कर दिया।
  3. स्वायत्तता की पुष्टि: विश्वविद्यालय परिसर के भीतर छात्रों के आचरण की निगरानी पूरी तरह से यूनिवर्सिटी की आंतरिक अनुशासनात्मक समिति का अधिकार क्षेत्र है, जिसमें BCI दखल नहीं दे सकती।

NALSAR Vs BCI: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतउच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India)
पीठासीन पीठCJI सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना
मूल विवादNALSAR यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ (हैदराबाद) के छात्रों के खिलाफ BCI का निलंबन आदेश
याचिकाकर्ताNALSAR के पूर्व छात्र – मिहिरा सूद और अभिषेक तिवारी
मुख्य फैसलाAdvocates Act, 1961 के तहत BCI का अधिकार क्षेत्र केवल ‘वकीलों’ (Advocates) तक सीमित है, ‘छात्रों’ तक नहीं।
RELATED ARTICLES

Most Popular

Patna
overcast clouds
26.5 ° C
26.5 °
26.5 °
49 %
2.6kmh
100 %
Tue
27 °
Wed
30 °
Thu
22 °
Fri
23 °
Sat
30 °

Recent Comments