Tuesday, October 27, 2026
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Maintenance Case: मजदूर की दिहाड़ी भी बढ़ी है तो एक महिला महज 1000 रुपए में कैसे गुजारा करेगी…महंगाई के बीच जीवनयापन से जुड़ा है केस

Maintenance Case: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने देश में बढ़ती महंगाई और जीवन यापन की बढ़ती लागत को देखते हुए गुजारा भत्ता (Maintenance) को लेकर एक बेहद व्यावहारिक और महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।

गुजारा भत्ता बढ़ाने के फैसले को चुनौती

हाईकोर्ट के जस्टिस अचल सचदेव ने पति द्वारा दायर उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उसने फैमिली कोर्ट (पारिवारिक न्यायालय) द्वारा गुजारा भत्ता बढ़ाने के फैसले को चुनौती दी थी। कोर्ट ने एक महिला के मासिक गुजारा भत्ते को 1,000 रुपये से बढ़ाकर 5,000 रुपये करने के आदेश को बरकरार रखते हुए कहा कि आज की भीषण महंगाई के दौर में किसी महिला के लिए महज एक हजार रुपये में गुजारा करना पूरी तरह असंभव है।

अदालत की मुख्य टिप्पणी: मजदूर की दिहाड़ी भी बढ़ी है

हाई कोर्ट ने 11 मई को दिए अपने आदेश में समाज की आर्थिक हकीकत और महंगाई को रेखांकित करते हुए कहा, निस्संदेह, पिछले 11 वर्षों के दौरान महंगाई में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। यहां तक कि एक मजदूर की मजदूरी (दिहाड़ी) में भी काफी इजाफा हुआ है। महंगाई के ऐसे दौर में किसी महिला को महज एक हजार रुपये देकर उसका भरण-पोषण करने की उम्मीद करना असंभव है। अदालत ने आगे कहा कि चूंकि वह महिला याचिकाकर्ता की पहली पत्नी है, इसलिए उसका भरण-पोषण करना पति की प्राथमिक और कानूनी जिम्मेदारी है; खासकर तब जब पुराना गुजारा भत्ता महंगाई के सामने बेअसर हो चुका हो।

क्या था पूरा मामला? (The Background)

पति की दलीलें: इस मामले के रिकॉर्ड के अनुसार, दोनों पक्षों का विवाह वर्ष 1995 में हुआ था। पति (जो पेशे से मजदूर है) ने अदालत में तर्क दिया कि उसकी पत्नी पिछले 17 वर्षों से बिना किसी उचित कारण के उससे अलग रह रही है। उसने दावा किया कि पत्नी एक व्यवसाय के माध्यम से प्रति माह लगभग 30,000 रुपये कमाती है। इसके अलावा, पति ने कहा कि उसे दहेज उत्पीड़न के मामले से बरी कर दिया गया है और वह वित्तीय तंगी से जूझ रहा है। वर्ष 2003 के एक आदेश के तहत वह पत्नी और दो बच्चों के लिए कुल 1,600 रुपये प्रति माह दे रहा था, जिसे अब अचानक बढ़ा दिया गया।

पत्नी का पक्ष: पत्नी ने इन आरोपों का विरोध करते हुए कहा कि उसके पति ने उसे धोखा दिया और उसे बेसहारा छोड़कर दूसरी शादी कर ली। उसने दलील दी कि बढ़ती महंगाई और जीवन यापन के खर्चों में भारी उछाल के कारण उसने लगभग 11 साल बाद गुजारा भत्ता बढ़ाने (Enhancement Application) की अर्जी दी थी, और परिस्थितियों में बदलाव के आधार पर संशोधन याचिका दायर करने की कोई समय सीमा (Limitation Period) तय नहीं होती।

हाई कोर्ट ने क्यों जायज ठहराया फैसला?

आदेश: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश की समीक्षा करते हुए दो मुख्य कानूनी पहलुओं को स्पष्ट किया।

बच्चे अब वयस्क (Major) हैं: कोर्ट ने नोट किया कि दोनों बच्चे अब बालिग (Adulthood) हो चुके हैं, इसलिए वे कानूनन गुजारा भत्ता पाने के हकदार नहीं रह गए हैं। इस पर किसी भी पक्ष को कोई आपत्ति नहीं थी। अब पूरी राशि केवल पत्नी के भरण-पोषण के लिए है।

मजदूर होने के बावजूद सक्षम: कोर्ट ने रिकॉर्ड पर मौजूद दस्तावेजों और पति के आय प्रमाण पत्र (Income Certificate) का अवलोकन करते हुए कहा कि भले ही पति एक मजदूर के रूप में काम करता है, लेकिन आज के समय में बढ़ी हुई मजदूरी की दरों के अनुसार वह अपनी पत्नी को 5,000 रुपये प्रति माह का बढ़ा हुआ गुजारा भत्ता देने में पूरी तरह सक्षम है।

फैसले का सारांश: एक नज़र में (Core Matrix)

पैरामीटरपुरानी स्थिति / पति का तर्कहाई कोर्ट का अंतिम निर्णय
मासिक गुजारा भत्तापहले पत्नी के हिस्से में लगभग 1,000 रुपये आ रहे थे।बढ़ाकर 5,000 रुपये प्रति माह करने का फैसला बरकरार।
महंगाई का आधारपति का तर्क था कि 11 साल बाद अचानक राशि बढ़ा दी गई।कोर्ट ने कहा कि 11 साल में महंगाई और मजदूरी दोनों बढ़ी हैं, इसलिए वृद्धि पूरी तरह तार्किक है।
पति की जिम्मेदारीपति ने स्वयं को गरीब मजदूर बताया।कोर्ट ने कहा कि पहली पत्नी का भरण-पोषण पति का प्राथमिक दायित्व है और वह 5,000 रुपये देने में सक्षम है।

निष्कर्ष (Takeaway)

इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह आदेश इस कानूनी सिद्धांत को मजबूत करता है कि गुजारा भत्ते की राशि कोई तय या स्थायी (Static) संख्या नहीं होती। समय के साथ बढ़ती मुद्रास्फीति (Inflation) और जीवन यापन के खर्चों के आधार पर पीड़ित पक्ष किसी भी समय इसमें संशोधन की मांग कर सकता है। कोर्ट ने यह साफ कर दिया कि कानूनन भरण-पोषण की राशि इतनी व्यावहारिक होनी चाहिए कि एक व्यक्ति सम्मानजनक जीवन जी सके, महज औपचारिकता मात्र नहीं।

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