Hindu Marriage Act: मद्रास हाईकोर्ट ने पारिवारिक विवाद और वैवाहिक अधिकारों को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।
पुरानी शादी को समाप्त करते हुए उनके तलाक की डिक्री को बरकरार रखा
हाईकोर्ट के जस्टिस पी. वडमलाई ने मामले की सुनवाई करते हुए व्यवस्था दी कि पत्नी द्वारा अपने पति के सैन्य वरिष्ठ अधिकारियों (Military Superiors) से विवाहेतर संबंधों (Extramarital Affairs) की बार-बार झूठी शिकायतें करना, ‘थाली’ (मंगलसूत्र) को गले से उतारना, और लगभग तीन दशकों (30 साल) तक अलग रहना हिंदू विवाह अधिनियम (Hindu Marriage Act) के तहत ‘मानसिक क्रूरता’ (Mental Cruelty) के दायरे में आता है। कोर्ट ने एक सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी (Retired Army Officer) की 49 साल पुरानी शादी को समाप्त करते हुए उनके तलाक की डिक्री को बरकरार रखा है।
मामले की पृष्ठभूमि: 1977 से शुरू हुआ सफर
पति का आरोप: इस मामले के दोनों पक्षों का विवाह 30 अगस्त 1977 को हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार हुआ था और उनके दो बच्चे हैं। पति (पूर्व आर्मी ऑफिसर) के अनुसार, शादी के शुरुआती दिनों से ही वैवाहिक कलह शुरू हो गई थी क्योंकि उनकी पत्नी उन पर अन्य महिलाओं के साथ अवैध संबंध रखने के झूठे आरोप लगाती थी। पत्नी ने सेना में उनके सीनियर अधिकारियों को शिकायतें भेजकर उन्हें सार्वजनिक रूप से अपमानित किया और बाद में ईसाई धर्म अपना लिया। पति ने आखिरकार 2014 में क्रूरता, परित्याग और धर्म परिवर्तन के आधार पर अदालत से तलाक मांगा था।
पत्नी की दलील: पत्नी ने इन आरोपों को सही ठहराते हुए दावा किया कि उनके पति का चरित्र ठीक नहीं था और उनके खिलाफ की गई शिकायतें जायज थीं। निचली अदालतों द्वारा पति के पक्ष में दिए गए तलाक के फैसले को चुनौती देते हुए पत्नी ने हाई कोर्ट में अपील दायर की थी।
हाई कोर्ट की मुख्य टिप्पणियां और कानूनी आधार
‘थाली’ (मंगलसूत्र) हटाने का सांस्कृतिक और भावनात्मक महत्व: जस्टिस पी. वडमलाई ने निचली अदालत के फैसले को सही ठहराते हुए पत्नी की अपील को खारिज कर दिया और निम्नलिखित तीन मुख्य आधारों को ‘मानसिक क्रूरता’ माना। मामले में सबसे चौंकाने वाला पहलू पत्नी का यह स्वीकार करना था कि उसने अपनी ‘थाली’ उतार दी थी और वह अब सोने के आभूषण नहीं पहनती थी। कोर्ट ने मद्रास हाई कोर्ट के ही पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा, यह एक सर्वविदित तथ्य है कि कोई भी विवाहित हिंदू महिला अपने पति के जीवनकाल में किसी भी समय ‘थाली’ नहीं हटाती है। पत्नी के गले में ‘थाली’ एक पवित्र चीज है जो वैवाहिक जीवन की निरंतरता का प्रतीक है और इसे पति की मृत्यु के बाद ही हटाया जाता है। इसलिए, पत्नी द्वारा ‘थाली’ को हटाना मानसिक क्रूरता की उच्चतम श्रेणी (Mental Cruelty of Highest Order) का कृत्य कहा जा सकता है, क्योंकि इससे पति की भावनाओं को गहरी ठेस और मानसिक वेदना पहुंची होगी।”
सैन्य अधिकारियों से शिकायत करना मानहानि और क्रूरता है: पत्नी ने खुद गवाही में माना था कि उसने अपने पति के वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों को पत्र लिखकर शिकायतें की थीं। कोर्ट ने सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के प्रसिद्ध फैसले ‘जॉयदीप मजूमदार बनाम भारती जायसवाल मजूमदार’ का संदर्भ दिया, जिसमें कहा गया था कि यदि कोई जीवनसाथी दूसरे के नियोक्ता (Employer) से ऐसी मानहानिकारक शिकायतें करता है जिससे उसकी नौकरी या प्रतिष्ठा पर असर पड़े, तो वह मानसिक क्रूरता है। कोर्ट ने कहा कि सहकर्मियों और वरिष्ठों के सामने किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाने वाले कृत्यों को हल्के में नहीं लिया जा सकता।
30 साल का अलगाव: केवल कागज पर बची थी शादी
अदालत ने पाया कि दोनों पक्ष 1996 से ही (लगभग 30 वर्षों से) अलग रह रहे थे। इस दौरान पत्नी ने कभी भी वैवाहिक अधिकारों की बहाली (Restitution of Conjugal Rights) या पुनर्मिलन के लिए कोई कानूनी कदम नहीं उठाया। अदालत ने माना कि हालांकि ‘शादी का पूरी तरह से टूट जाना’ (Irretrievable Breakdown of Marriage) हाई कोर्ट के लिए तलाक का कोई स्वतंत्र वैधानिक आधार नहीं है, लेकिन इतने लंबे समय का कड़वाहट भरा अलगाव और अंतहीन मुकदमेबाजी खुद क्रूरता का एक बड़ा स्रोत बन जाती है।
मामले का सारांश: एक नज़र में (Core Matrix)
| मुख्य बिंदु | अदालत की व्याख्या और निर्णय (1 जून 2026) |
| विवाह की अवधि | 49 वर्ष (विवाह वर्ष 1977; तलाक की अर्जी 2014 में दायर)। |
| ‘थाली’ हटाना | कोर्ट ने इसे हिंदू संस्कृति और भावनाओं के तहत “उच्चतम स्तर की मानसिक क्रूरता” माना। |
| सीनियरों को शिकायत | सुप्रीम कोर्ट की नजीर के तहत इसे पति के करियर और सम्मान पर हमला मानते हुए क्रूरता की श्रेणी में रखा। |
| अंतिम फैसला | हाई कोर्ट ने पत्नी की अपील को खारिज करते हुए निचली अदालत द्वारा दिए गए तलाक के आदेश की पुष्टि की। |
निष्कर्ष (Takeaway)
मद्रास हाई कोर्ट का यह फैसला यह स्पष्ट करता है कि वैवाहिक संबंधों में केवल शारीरिक हिंसा ही क्रूरता नहीं होती, बल्कि सामाजिक प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाना, जीवनसाथी की धार्मिक और सांस्कृतिक भावनाओं को जानबूझकर आहत करना और दशकों तक बिना किसी प्रयास के अलग रहना भी गंभीर मानसिक क्रूरता है। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि जो शादी दशकों पहले व्यावहारिक रूप से खत्म हो चुकी थी, उसे केवल कागजों पर खींचने का कोई औचित्य नहीं है।

