Saturday, August 8, 2026
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Medical Emergencies: 4 वर्षीय बलात्कार पीड़ित बच्ची के इलाज में लापरवाही…जानिए सुप्रीम फटकार के बाद 2 निजी अस्पताल देंगे मुआवजा

केस एवं प्रक्रियात्मक सारांश (Case Matrix Overview)

विधिक/प्रशासनिक बिंदुविवरण (अगस्त 2026)
माननीय पीठCJI सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना
घटनास्थलगाजियाबाद, उत्तर प्रदेश
अस्पतालों पर निर्देशसेंट जोसेफ अस्पताल द्वारा ₹10 लाख और दूसरे अस्पताल द्वारा ₹2 लाख का मुआवजा (4 सप्ताह में)
मुद्दाआपातकालीन स्थिति में अस्पतालों द्वारा इलाज से इनकार और पुलिस की लापरवाही
शीर्ष अदालत का संकल्पआपातकालीन चिकित्सा और यौन उत्पीड़न पीड़ितों के इलाज के लिए देशव्यापी दिशानिर्देश तय किए जाएंगे।

Medical Emergencies: सुप्रीम कोर्ट के कड़े रुख और सुझाव के बाद गाजियाबाद के दो निजी अस्पताल एक चार वर्षीय बच्ची के परिवार को मुआवजा देने पर सहमत हो गए हैं। बर्बर बलात्कार का शिकार हुई इस बच्ची की समय पर इलाज न मिलने और अस्पतालों द्वारा भर्ती करने से इनकार किए जाने के कारण मौत हो गई थी।

मामले की गंभीरता को देखते हुए मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने स्पष्ट संकेत दिया कि शीर्ष अदालत यौन उत्पीड़न (Sexual Assault) की पीड़ितों और अन्य आपातकालीन चिकित्सा स्थितियों (Medical Emergencies) में त्वरित इलाज सुनिश्चित करने के लिए देशव्यापी दिशानिर्देश (Guidelines) तैयार करेगी।

अस्पतालों द्वारा मुआवजे का भुगतान

अदालत द्वारा निर्देश दिए जाने के प्रस्ताव पर अस्पतालों ने स्वेच्छा से पीड़ित परिवार को मुआवजे का भुगतान करने की सहमति दी। कोर्ट ने अपने आदेश में दर्ज किया।

  1. सेंट जोसेफ मरियम अस्पताल (St. Joseph Mariam Hospital, गाजियाबाद): पीड़ित परिवार को ₹10 लाख का भुगतान करेगा।
  2. दूसरा अस्पताल (नर्सिंग होम): पीड़ित परिवार को ₹2 लाख का भुगतान करेगा।
  • भुगतान की समय सीमा: यह राशि 4 सप्ताह के भीतर डिमांड ड्राफ्ट (Demand Draft) के माध्यम से दी जाएगी।

(अस्पतालों के वकीलों ने अनुरोध किया कि इस राशि को ‘मुआवजे’ के बजाय ‘स्वैच्छिक योगदान’ माना जाए ताकि भविष्य में किसी आपराधिक मुकदमे में इसका प्रतिकूल असर न पड़े।)

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की तीखी टिप्पणियां

  1. अस्पतालों की संवेदनहीनता पर न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की टिप्पणी:“यह एक चार साल की बच्ची थी जो इतने दर्दनाक हमले का शिकार हुई थी। कम से कम जो शुरुआती मदद दी जा सकती थी, वह था उसे थोड़ा खून चढ़ाना। स्थिति इतनी नाजुक थी और फिर भी आपने उसे दूसरे अस्पताल भेज दिया। SIT रिपोर्ट कहती है कि आपातकालीन स्थितियों में डॉक्टरों को बुलाया जा सकता था, लेकिन आपने कोशिश तक नहीं की। बच्ची 5 घंटे तक तड़पती रही।”
  2. CJI सूर्यकांत का रुख: पीठ ने कहा कि वह चिकित्सा संस्थानों की लापरवाही को रोकने और कानून के क्रियान्वयन में मौजूद कमियों को दूर करने के लिए पूरे देश के लिए सकारात्मक दिशानिर्देश (Positive Directions) जारी करेगी।

SIT रिपोर्ट और याचिकाकर्ता के वकील की दलीलें

पीड़ित माता-पिता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता एन. हरिहरन ने विशेष जांच दल (SIT) की रिपोर्ट का हवाला देते हुए अस्पतालों और पुलिस दोनों के आचरण पर गंभीर सवाल उठाए:

  • अस्पतालों की लापरवाही: पहला अस्पताल डॉक्टरों को कॉल पर बुला सकता था, लेकिन उसने कोई प्रयास नहीं किया और मरीज को टाल दिया। दूसरा अस्पताल मल्टी-स्पेशियलिटी था, फिर भी बच्ची को भर्ती नहीं किया गया। यदि समय पर इलाज मिलता तो बच्ची जीवित होती।
  • पुलिस की लापरवाही: पुलिस ने शिकायतकर्ता के बयान को सही तरीके से दर्ज नहीं किया। 30 घंटे की देरी से दर्ज की गई FIR में केवल हत्या (Murder) की धारा लगाई गई और बलात्कार (Rape) का उल्लेख तक नहीं किया गया।
  • देशव्यापी दिशानिर्देश की मांग: वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि ऐसे मामलों में संवेदनहीनता के कारण पीड़ित दोबारा प्रताड़ित होते हैं। अस्पतालों के लिए तत्काल रिपोर्टिंग और बिना इलाज के किसी भी गंभीर मरीज को न लौटाने के कड़े नियम होने चाहिए।

मामले की पृष्ठभूमि (Background)

  • स्वतः संज्ञान (Suo Motu): सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस हिरासत/अस्पतालों की लापरवाही और बच्ची के साथ हुए बर्बर अपराध पर स्वतः संज्ञान लेते हुए बलात्कार और हत्या की जांच के लिए SIT का गठन किया था।
  • उत्तर प्रदेश प्रशासन की भूमिका: शीर्ष अदालत ने इस मामले में उत्तर प्रदेश सरकार और स्थानीय पुलिस के रवैये के साथ-साथ निजी अस्पतालों द्वारा बच्ची को भर्ती करने से इनकार करने पर गहरी चिंता व्यक्त की थी।

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