Medical Termination of Pregnancy: दिल्ली हाईकोर्ट ने किसी भी महिला की शारीरिक स्वायत्तता (Bodily Autonomy) और आत्मनिर्णय के अधिकार को उसके मौलिक अधिकारों का अभिन्न हिस्सा मानते हुए एक अत्यंत संवेदनशील और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।
15 वर्षीय नाबालिग रेप पीड़िता का केस
हाईकोर्ट के जस्टिस मिनी पुष्करणा की एकल पीठ ने 24 जून, 2026 को आदेश पारित करते हुए स्पष्ट किया कि भले ही मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) एक्ट, 1971 के तहत 24 सप्ताह के बाद गर्भपात की सामान्य मनाही है, लेकिन बलात्कार (Rape) जैसे असाधारण मामलों में पीड़िता को गंभीर मानसिक आघात और असीम मानसिक पीड़ा (Mental Trauma) से बचाने के लिए संवैधानिक अदालतें अपनी असाधारण शक्तियों का उपयोग कर सकती हैं। अदालत ने एक 15 वर्षीय नाबालिग रेप पीड़िता को 24 सप्ताह (6 महीने) की कानूनी समय-सीमा बीत जाने के बाद भी गर्भपात (Medical Termination of Pregnancy) कराने की विशेष अनुमति दे दी है।
मामला क्या है?: 26-28 हफ्ते का गर्भ और नाबालिग की मानसिक पीड़ा
यह दर्दनाक मामला एक 15 साल की नाबालिग बच्ची से जुड़ा है, जिसकी पैरवी उसके पिता के माध्यम से अधिवक्ता अन्वेष मधुकर और प्रांजल एस. ने की।
कानूनी सीमा पार: जब पीड़िता और उसके पिता को गर्भावस्था का पता चला, तब तक गर्भ का समय लगभग 26 से 28 सप्ताह हो चुका था, जो कि एमटीपी कानून के तहत तय 24 सप्ताह की अधिकतम सीमा से काफी आगे था।
गंभीर मानसिक आघात का तर्क: वकीलों ने दलील दी कि यदि इस मासूम बलात्कार पीड़िता को इस अनचाहे गर्भ को ढोने के लिए मजबूर किया गया, तो यह उसके मानसिक स्वास्थ्य को पूरी तरह तबाह कर देगा। यह संविधान के अनुच्छेद 21 (Article 21) के तहत उसे मिले सम्मान के साथ जीने और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का सीधा हनन होगा।
एम्स (AIIMS) के मेडिकल बोर्ड की राय और कोर्ट का फैसला
अदालत ने इस संवेदनशील मामले में त्वरित कार्रवाई करते हुए एम्स, नई दिल्ली के विशेषज्ञ डॉक्टरों के मेडिकल बोर्ड से राय मांगी थी।
इजाजत मंजूर: एम्स के मेडिकल बोर्ड की सकारात्मक रिपोर्ट और खुद नाबालिग बच्ची व उसके पिता की पुरजोर इच्छा को देखते हुए हाई कोर्ट ने गर्भपात की प्रार्थना को स्वीकार कर लिया।
एम्स को निर्देश: कोर्ट ने पीड़िता को तुरंत एम्स में भर्ती करने और सक्षम डॉक्टरों की टीम द्वारा एमटीपी एक्ट के कड़े नियमों व गाइडलाइंस के तहत इस प्रक्रिया को पूरा करने का आदेश दिया है।
Medical Termination of Pregnancy: हाई कोर्ट के 5 कड़े और संवेदनशील दिशानिर्देश (Court Guidelines)
नाबालिग की सुरक्षा और भविष्य को ध्यान में रखते हुए अदालत ने निम्नलिखित महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं।
पूरा खर्च उठाएगी दिल्ली सरकार: गर्भपात की पूरी प्रक्रिया, अस्पताल में रहने का खर्च और ऑपरेशन के बाद (Post-operative period) देखभाल का सारा खर्च दिल्ली सरकार (GNCTD) द्वारा वहन किया जाएगा।
डीएनए (DNA) टेस्ट के लिए भ्रूण का संरक्षण: चूंकि यह मामला एक जघन्य आपराधिक कृत्य (बलात्कार) से जुड़ा है, इसलिए कोर्ट ने एम्स को आदेश दिया है कि वे कानूनी साक्ष्य के रूप में भ्रूण के ऊतकों (Foetus Tissue) को सुरक्षित रखें ताकि आरोपी का डीएनए टेस्ट कराया जा सके।
यदि बच्चा जीवित पैदा हो: यदि गर्भपात की प्रक्रिया के दौरान बच्चा जीवित पैदा होता है, तो एम्स के मेडिकल सुपरिटेंडेंट और राज्य अधिकारी यह सुनिश्चित करेंगे कि उसे पूर्ण जीवन रक्षक चिकित्सा सहायता दी जाए और उसे इनक्यूबेटर (Incubator) में रखा जाए।
बाल कल्याण समिति (CWC) को सूचना: जीवित बच्चे की स्थिति में तुरंत स्थानीय बाल कल्याण समिति को सूचित किया जाएगा और आगे की देखरेख के लिए उनकी विधिक दिशा-निर्देशों का पालन होगा।
गोद देने की प्रक्रिया (Adoption): नाबालिग लड़की और उसके पिता की इच्छा के अनुसार, यदि बच्चा जीवित रहता है, तो उसे विधिक और निर्धारित प्रक्रिया के तहत गोद (Adoption) दे दिया जाएगा।
Medical Termination of Pregnancy: केस मैट्रिक्स और विधिक सारांश (Case Overview)
| कानूनी और संवैधानिक श्रेणियां | दिल्ली उच्च न्यायालय की विधिक व्यवस्था (जून २०२६) |
| संबंधित उच्च न्यायालय | दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस मिनी पुष्करणा (एकल पीठ) |
| याचिकाकर्ता | 15 वर्षीय नाबालिग बलात्कार पीड़िता (पिता के माध्यम से) |
| गर्भ की अवधि | लगभग 26-28 सप्ताह (कानूनी सीमा 24 सप्ताह से अधिक) |
| अस्पताल और मेडिकल बोर्ड | अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS), नई दिल्ली |
| संवैधानिक सिद्धांत | अनुच्छेद 21 के तहत शारीरिक स्वायत्तता और मानसिक स्वास्थ्य का अधिकार कानून की तकनीकी समय-सीमा से ऊपर है। |

