Saturday, August 15, 2026
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Adult Life: 21 साल की उम्र में लगा हत्या का आरोप, 64 में हुए बरी…43 साल पुराने मामले में युवक को क्यों किया दोषमुक्त?

Adult Life: 43 साल लंबी कानूनी लड़ाई एक इंसान की जिंदगी के साथ क्या करती है? दिल्ली हाईकोर्ट ने हत्या के मामले में मुकेश कुमार को बरी कर दिया।

अभियोजन पक्ष संदेह से परे अपना मामला साबित करने में विफल

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए मुकेश कुमार को हत्या के मामले में पूरी तरह बरी (Acquit) कर दिया। कोर्ट ने 2004 में निचली अदालत (Trial Court) द्वारा उन्हें सुनाई गई उम्रकैद की सजा को पलट दिया है। जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंदर डुडेजा की खंडपीठ ने 18 जून, 2026 को दिए अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष (Prosecution) संदेह से परे अपना मामला साबित करने में पूरी तरह विफल रहा।

1983 में हुई हत्या के आरोप में काट रहा था युवक सजा

64 वर्षीय मुकेश कुमार के लिए इसका मतलब था अपनी पूरी वयस्क जिंदगी (Adult Life) एक हत्या के आरोप के साये में गुजार देना। जब 1983 में यह घटना हुई, तब वह महज 21 साल के एक युवक थे। इस कानूनी खींचतान के बीच ही 1986 में उनकी शादी हुई, आज उनका 36 साल का बेटा है और 39 साल की बेटी है।

Adult Life: क्या था 1983 का वह बस हत्याकांड?

बस में बदसलूकी: यह मामला 1 दिसंबर, 1983 की शाम का है। शिकायतकर्ता उषा (जो तब एक युवा नर्स थीं) अपनी सहेलियों और एक पुरुष मित्र के साथ लाजपत नगर से शॉपिंग और डिनर करके दिल्ली परिवहन निगम (DTC) की रूट नंबर 431 की बस से लौट रही थीं।

चाकूबाजी और हत्या: आरोप के मुताबिक, बस में युवाओं का एक गुट सवार हुआ, जिसमें मुकेश भी शामिल था। इन लड़कों ने महिलाओं के साथ बदसलूकी शुरू कर दी। जब उनके पुरुष मित्र ने बीच-बचाव किया, तो एक आरोपी ने उसे चाकू मार दिया, जिससे बाद में उसकी मौत हो गई।

मुकेश पर क्या था आरोप?: मुकेश पर मुख्य रूप से चाकू चलाने का आरोप नहीं था। लेकिन कानून के ‘साझा दायित्व’ (Vicarious Liability) के सिद्धांत के तहत पुलिस ने दलील दी कि मुकेश बस के पिछले गेट पर खड़ा था और ‘मारो साले को’ चिल्लाकर हमलावरों को उकसा रहा था और घूंसे बरसा रहा था।

21 साल बाद पहली सजा: दिल्ली पुलिस ने आईपीसी की धारा 302 (हत्या) के तहत चार्जशीट दाखिल की। निचली अदालत को फैसला सुनाने में 21 साल लग गए और अगस्त 2004 में मुकेश को उम्रकैद हुई (इस दौरान एक आरोपी की मौत भी हो चुकी थी)। मुकेश ने 2004 में इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी, जिसके बाद मई 2005 में उनकी सजा निलंबित हुई। वह कुल मिलाकर करीब 10 महीने जेल में रहे।

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हाई कोर्ट में क्यों ताश के पत्तों की तरह ढह गया पुलिस का केस?

जब हाई कोर्ट ने 2004 की इस पुनरीक्षण याचिका (Revision Petition) के रिकॉर्ड्स को दोबारा खंगाला, तो पुलिस की थ्योरी में कई बड़े झोल और विरोधाभास सामने आए।

गवाहों के बयानों में भारी विरोधाभास: पुलिस ने कोर्ट में बस कंडक्टर सहित 28 गवाह पेश किए थे। लेकिन डीटीसी बस के कंडक्टर सिरीपाल सिंह ने गवाही दी कि उसने मुकेश को न तो बस में चढ़ते देखा और न ही पिछले गेट से कोई भड़काऊ नारा सुना। रक्षा विधिक वकील हिमांशु आनंद गुप्ता ने कोर्ट में साबित किया कि बस में बैठने की व्यवस्था और आरोपियों के आने के क्रम को लेकर चश्मदीदों के बयानों में गंभीर विसंगतियां थीं।

पहचान परेड (TIP) के साथ खिलवाड़: अदालत ने पाया कि टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड (TIP) की प्रक्रिया पूरी तरह संदिग्ध थी। चश्मदीद गवाह नगिंदर कुमार ने माना कि आरोपियों की गिरफ्तारी की खबर सुनकर मृतक के परिजन थाने गए थे और आरोपियों को अदालत में बिना चेहरा ढके (Unmuffled Faces) पेश किया गया था। कोर्ट के रिकॉर्ड से पता चला कि जनवरी 1984 में मजिस्ट्रेट के सामने भी आरोपियों को ‘खुले चेहरे’ से लाया गया था। ऐसे में गवाहों द्वारा उन्हें पहचानना कोई विधिक साक्ष्य नहीं रह जाता।

उकसाने के आरोपों में दम नहीं: मुख्य गवाह उषा और अलका के बयानों का विश्लेषण करते हुए बेंच ने कहा कि उषा बस में आगे थीं, इसलिए वह मुकेश को देख नहीं सकती थीं। वहीं अलका ने खुद स्वीकार किया कि उसने पिछले गेट से चिल्लाने वाले व्यक्ति को देखा ही नहीं था।

‘मारो’ शब्द का मतलब सिर्फ हत्या नहीं: हाई कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण कानूनी टिप्पणी करते हुए कहा कि अगर मान भी लिया जाए कि भीड़ में किसी ने ‘मारो साले को’ जैसा शब्द इस्तेमाल किया है, तो कानूनन इसका मतलब सीधे ‘ठंडे दिमाग से हत्या’ करने का इरादा (Intent to Murder) नहीं माना जा सकता। यह केवल मारपीट या चोट पहुंचाने (Intent to Hurt) का इरादा भी हो सकता है।

आगे क्या?: क्या मुकेश कुमार सचमुच आजाद हैं?

अपर लोक अभियोजक (APP) अमन उस्मान ने संकेत दिया है कि अभियोजन पक्ष इस बरी किए जाने के फैसले से संतुष्ट नहीं है और वे इसके खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) में अपील करने की योजना बना रहे हैं। उनका तर्क है कि हाई कोर्ट ने गवाहों के बयानों की सही ढंग से सराहना नहीं की।

Adult Life: केस मैट्रिक्स और विधिक विश्लेषण (Case Summary)

विधिक और प्रशासनिक श्रेणियांदिल्ली उच्च न्यायालय का ऐतिहासिक फैसला (जून २०२६)
संबंधित अदालतदिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court)
माननीय खंडपीठजस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंदर डुडेजा
पीड़ित/आरोपीमुकेश कुमार (घटना के वक्त 21 साल, बरी होते वक्त 64 साल)
मुकदमे की अवधि43 वर्ष (1983 से 2026)
केस गिरने का मुख्य कारणसंदिग्ध पहचान परेड (TIP), गवाहों के विरोधाभासी बयान और पुख्ता सबूतों का अभाव।
विधिक स्थितिहाई कोर्ट से मुकेश पूरी तरह बरी हैं, लेकिन यदि राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट में स्पेशल लीव पेटिशन (SLP) दायर करती है, तो मामला दोबारा खुल सकता है।
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