Wednesday, August 5, 2026
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Public Funds: को-ऑपरेटिव सोसायटी एक्ट की धारा 69 के बावजूद, उपभोक्ता फोरम क्या सुन सकते हैं फिक्स्ड डिपॉजिट के विवाद…केस पढ़ें

Public Funds: केरल हाईकोर्ट ने सहकारी बैंकों और उनमें अपनी गाढ़ी कमाई जमा करने वाले फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) धारकों के विधिक अधिकारों को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण और जनहितैषी विधिक निर्णय सुनाया है।

पीड़ित जमाकर्ता को ब्याज और हर्जाने सहित पूरी राशि का भुगतान करे

जस्टिस डॉ. ए.के. जयशंकरण नांबियार और जस्टिस प्रीता ए.के. की खंडपीठ ने अपने फैसले में ‘पुथुर सर्विस को-ऑपरेटिव बैंक लिमिटेड’ द्वारा दायर रिट अपील को पूरी तरह खारिज कर दिया। अदालत ने सहकारी बैंक को निर्देश दिया कि वह पीड़ित जमाकर्ता को ब्याज और हर्जाने सहित पूरी राशि का भुगतान करे। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई सहकारी बैंक किसी जमाकर्ता का मैच्योरिटी अमाउंट (परिपक्वता राशि) लौटाने में विफल रहता है, तो उपभोक्ता अदालतों को उस विवाद की सुनवाई करने का पूरा विधिक अधिकार है। बैंक यह दलील देकर उपभोक्ता फोरम के क्षेत्राधिकार (Jurisdiction) को चुनौती नहीं दे सकते कि मामला ‘केरल सहकारी सोसायटी अधिनियम, 1969’ के दायरे में आता है।

विवाद की पृष्ठभूमि: 11 साल पुराना फिक्स्ड डिपॉजिट का मामला

मैच्योरिटी के बाद भी नहीं लौटाया पैसा: यह विधिक विवाद त्रिशूर के एक जमाकर्ता और सहकारी बैंक के बीच वित्तीय चूक से शुरू हुआ था। पहले प्रतिवादी (सेथुमाधवन) ने त्रिशूर स्थित ‘पुथुर सर्विस को-ऑपरेटिव बैंक’ में कुल ₹5,00,000 की फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) कराई थी। यह राशि 2 जून 2015 को मैच्योर (परिपक्व) हो गई थी, लेकिन बैंक ने उनका पैसा वापस करने से इनकार कर दिया।

उपभोक्ता फोरम का विधिक आदेश: पीड़ित जमाकर्ता ने जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग, त्रिशूर का रुख किया। जिला आयोग ने 31 दिसंबर 2021 को बैंक को आदेश दिया कि वह जमाकर्ता को ₹5,00,000 की मूल राशि 12% वार्षिक ब्याज के साथ लौटाए, और साथ ही मानसिक प्रताड़ना व अदालती खर्च के रूप में ₹10,000 का मुआवजा भी दे।

अपील में 825 दिनों की भारी देरी: बैंक ने इस आदेश के खिलाफ समय पर अपील नहीं की। उसने 825 दिनों की भारी देरी के बाद अक्टूबर 2024 में राज्य उपभोक्ता आयोग के समक्ष अपील दायर की। राज्य आयोग और बाद में हाई कोर्ट के एकल न्यायाधीश (Single Judge) दोनों ने देरी का कोई ठोस कारण न पाकर बैंक की याचिका खारिज कर दी, जिसे बैंक ने इस खंडपीठ के समक्ष चुनौती दी थी।

हाई कोर्ट का विधिक विश्लेषण: क्या ‘को-ऑपरेटिव एक्ट’ उपभोक्ता कानून को रोकता है?

खंडपीठ के समक्ष सहकारी बैंक ने एक नया विधिक दांव खेलते हुए तर्क दिया कि चूंकि जमाकर्ता बैंक का एक ‘सदस्य’ (Member) था, इसलिए ‘केरल सहकारी सोसायटी अधिनियम, 1969’ की धारा 69 के तहत उसका एकमात्र विधिक उपाय सहकारी विभाग के समक्ष जाना था। बैंक के अनुसार, उपभोक्ता फोरम को इस मामले को सुनने का विधिक अधिकार ही नहीं था।

जस्टिस प्रीता ए.के. द्वारा लिखे गए फैसले में हाई कोर्ट ने बैंक के इस क्षेत्राधिकार संबंधी तर्क को दो टूक खारिज करते हुए विधिक सिद्धांत प्रतिपादित किए।

दोनों विधिक उपाय एक साथ सह-अस्तित्व में हैं (Remedies Coexist)

अदालत ने उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 (और नए 2019 अधिनियम की धारा 100) के वैधानिक पाठ का हवाला दिया। कानून में स्पष्ट लिखा है कि उपभोक्ता अधिनियम के प्रावधान किसी भी अन्य कानून के अतिरिक्त (In addition to) हैं, न कि उसके प्रभाव को कम करने वाले (Not in derogation of)। इसलिए, भले ही सहकारी अधिनियम में विवाद निपटारे का एक तंत्र मौजूद हो, वह किसी नागरिक को उपभोक्ता अदालत जाने के विधिक अधिकार से वंचित नहीं कर सकता।

बाद में बना केंद्रीय कानून राज्य के कानून पर हावी

अदालत ने स्पष्ट किया कि उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम संसद द्वारा उपभोक्ताओं के विशेष संरक्षण के लिए बनाया गया एक ‘विशेष कानून’ है, जो राज्य के सहकारी अधिनियम के प्रावधानों पर हावी (Override) रहेगा। विधिक सिद्धांत के अनुसार, यदि दो कानूनों में कोई विसंगति होती है, तो बाद में बना कानून ही प्रभावी माना जाता है।

तकनीकी आड़ में जनता का पैसा मारना निंदनीय

सहकारी बैंक के आचरण पर बेहद सख्त रुख अपनाते हुए खंडपीठ ने टिप्पणी की, एक बैंकिंग संस्थान होने के नाते, जो सार्वजनिक धन (Public Funds) से लेन-देन करता है, बैंक का यह विधिक और नैतिक कर्तव्य है कि वह अपने जमाकर्ताओं को तुरंत भुगतान करे। फिक्स्ड डिपॉजिट की राशि लौटाने की देनदारी से बैंक ने कभी इनकार नहीं किया है। ऐसे में अपनी देनदारी से बचने और दावों को विफल करने के लिए तकनीकी कमियों (Technicalities) का सहारा लेना, एक ऐसा आचरण है जिसकी कड़ी निंदा की जानी चाहिए।”

अदालत का अंतिम विधिक आदेश

केरल उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने एकल पीठ के फैसले पर अपनी पूर्ण सहमति जताते हुए बैंक की अपील को खारिज कर दिया। हालांकि, बैंक के वकील द्वारा भुगतान के लिए समय मांगे जाने पर, अदालत ने मानवीय आधार पर 6 महीने का समय दिया है। बैंक को इस अवधि के भीतर जिला उपभोक्ता फोरम के आदेशानुसार ₹5,00,000 की मूल राशि, 12% ब्याज और ₹10,000 के हर्जाने के साथ जमाकर्ता को अनिवार्य रूप से सौंपनी होगी।

विधिक एवं केस सारांश (Case Matrix)

विधिक/मुख्य बिंदुकेरल उच्च न्यायालय का महत्वपूर्ण विधिक निर्णय (जून 2026)
केस नंबर / तारीखरिट अपील नंबर 1152/2026; निर्णय तिथि: 2 जून 2026
माननीय न्यायाधीशडॉ. जस्टिस ए.के. जयशंकरण नांबियार और जस्टिस प्रीता ए.के.
अपीलकर्ता पक्षपुथुर सर्विस को-ऑपरेटिव बैंक लिमिटेड, त्रिशूर।
टकराव वाली विधिक धाराएंकेरल को-ऑपरेटिव सोसायटी एक्ट की धारा 69 बनाम उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम (2019) की धारा 100।
स्थापित विधिक सिद्धांतसहकारी बैंकों के जमाकर्ता ‘उपभोक्ता’ की श्रेणी में आते हैं; उनके पास को-ऑपरेटिव आर्बिट्रेशन के अलावा उपभोक्ता फोरम जाने का स्वतंत्र विधिक विकल्प है।
अदालत का अंतिम निर्देशबैंक की तकनीकी याचिका खारिज; जमाकर्ता को 12% ब्याज के साथ भुगतान करने के लिए 6 महीने की अंतिम मोहलत।
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