डेलीगेट्स (Delegates/पारसी जूरी) की अनूठी भूमिका
पारसी विवाह अधिनियम (PMDA) के तहत अदालती कार्यवाही में पारसी समुदाय के 5 प्रतिनिधियों (Delegates) का एक पैनल जूरी/सहायक की भूमिका निभाता है।
- वीडियो साक्ष्य की समीक्षा: अदालत की सहमति से नवंबर 2010 के मुंबई कार्यक्रम की वीडियो रिकॉर्डिंग पारसी डेलीगेट्स के 5 सदस्यीय पैनल को दिखाई गई।
- डेलीगेट्स का सर्वसम्मति से निर्णय: डेलीगेट्स ने सर्वसम्मति से फैसला सुनाया कि वीडियो में दिख रही रस्म ‘तंदुरुस्ती’ (Tandoorasti) प्रार्थना थी, न कि ‘आशीर्वाद’ (Ashirvad) समारोह। उन्होंने पाया कि इसमें पारसी विवाह का अनिवार्य अंग—पक्षकारों और गवाहों द्वारा मैरिज सर्टिफिकेट पर हस्ताक्षर—पूरी तरह गायब था।
हाईकोर्ट के मुख्य कानूनी निष्कर्ष
- पारसी रीति-रिवाज पर जूरी का फैसला सर्वोपरि: न्यायमूर्ति सुंदरेसन ने कहा कि पारसी समुदाय की धार्मिक रस्मों पर डेलीगेट्स द्वारा दिया गया सर्वसम्मत जवाब अंतिम है। जब तक इसमें कोई प्रत्यक्ष गड़बड़ी न हो, अदालत को इस पर सवाल नहीं उठाना चाहिए। ‘तंदुरुस्ती’ विवाह नहीं है, इसलिए मुंबई में विवाह संपन्न होने का कानूनी आधार (Jurisdictional Fact) समाप्त हो जाता है।
- धारा 19 और धारा 46 का सामंजस्यपूर्ण अर्थ (Harmonious Construction): कोर्ट के समक्ष एक जटिल कानूनी प्रश्न यह था कि क्या किसी अंतरिम आवेदन (Interlocutory Application) के स्तर पर डेलीगेट्स (जूरी) की मदद ली जा सकती है? हाईकोर्ट ने PMDA की धारा 19 (जो अंतरिम मामलों में जूरी की मदद की अनिवार्यता को सीमित करती है) और धारा 46 (जो तथ्यों के निर्णय का अधिकार डेलीगेट्स को देती है) का सामंजस्य बिठाते हुए माना कि धारा 19 जूरी की मदद लेने से रोकती नहीं है, बल्कि केवल कोर्ट की बाध्यता को शिथिल करती है। इसलिए तथ्य के प्रश्न पर जूरी की राय पूरी तरह वैध है।
- क्षेत्राधिकार के अभाव में मुकदमा खारिज: जब विवाह की रस्म ही मुंबई में नहीं हुई, तो बॉम्बे हाईकोर्ट के पास इस मुकदमे को सुनने का कोई अधिकार नहीं बचता। अदालत ने CPC के आदेश VII नियम 11(d) का पालन करते हुए याचिका खारिज कर दी।
मुंबई: पारसी विवाह एवं तलाक अधिनियम, 1936 (PMDA) के तहत धार्मिक संस्कारों, पारसी जूरी/डेलिगेट्स (Delegates) की विधिक भूमिका और क्षेत्रीय क्षेत्राधिकार (Territorial Jurisdiction) के जटिल सवाल पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने पहली बार विचार करते हुए (Matter of First Impression) एक अत्यंत ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।
अदालत ने पाया कि चूंकि दोनों पक्ष पर्थ (ऑस्ट्रेलिया) के निवासी हैं और मुंबई में नवंबर 2010 में आयोजित कार्यक्रम केवल एक ‘तंदुरुस्ती’ प्रार्थना सभा थी न कि विवाह का धार्मिक अनुष्ठान, इसलिए मुंबई में विवाह संपन्न होने का एकमात्र क्षेत्राधिकार संबंधी तथ्य (Jurisdictional Fact) गायब है। इसके परिणामस्वरूप न्यायमूर्ति सोमशेखर सुंदरेशन की एकल पीठ ने सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के ऑर्डर VII रूल 11(d) के तहत पत्नी द्वारा दायर पारसी वैवाहिक वाद को कानूनन वर्जित (Barred by Law) और क्षेत्राधिकार-विहीन मानते हुए खारिज कर दिया। उच्च न्यायालय ने स्पष्ट व्यवस्था दी है कि पारसी समुदाय में की जाने वाली “तंदुरुस्ती” (Tandoorasti) प्रार्थना केवल एक आशीर्वाद है, यह अधिनियम की धारा 3 के अंतर्गत वैध पारसी विवाह के गठन के लिए अनिवार्य धार्मिक संस्कार “आशीर्वाद” (Ashirvad Ceremony) का स्थान नहीं ले सकती।
उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं अवलोकन
1. ‘तंदुरुस्ती एक प्रार्थना है, विवाह का आशीर्वाद अनुष्ठान नहीं’ न्यायमूर्ति सोमशेखर सुंदरेशन ने 5 पारसी प्रतिनिधियों (Delegates) द्वारा वीडियो साक्ष्य की समीक्षा के सर्वसम्मत निष्कर्ष को स्वीकार करते हुए अपने आदेश में कहा: “पत्नी द्वारा प्रस्तुत किए गए स्वयं के साक्ष्यों पर प्रतिनिधियों (Delegates) का सर्वसम्मत उत्तर यह है कि नवंबर 2010 का कार्यक्रम एक ‘तंदुरुस्ती’ (Tandoorasti) था, न कि ‘आशीर्वाद’ (Ashirvad) संस्कार। यह समुदाय के धार्मिक अनुष्ठानों पर आधारित निर्णय है, और जब तक इसमें प्रथम दृष्टया कोई विकृति (Perversity) न हो, इस न्यायालय को इस पर पुनर्विचार या अपीलीय दृष्टिकोण नहीं अपनाना चाहिए… पीएमडीए की धारा 3 सहपठित धारा 29 इस न्यायालय को क्षेत्राधिकार से वंचित करती है। दोनों पक्ष पर्थ में रहते हैं और क्षेत्रीय क्षेत्राधिकार का एकमात्र जोड़ने वाला कारक मुंबई में आयोजित कहा जाने वाला विवाह संस्कार था। यदि नवंबर 2010 का कार्यक्रम विवाह संस्कार नहीं है, तो वह क्षेत्राधिकार-निर्धारक तथ्य ही समाप्त हो जाता है। अतः यह वाद सीपीसी के आदेश VII नियम 11(d) के अर्थ के भीतर वर्जित है।”
2. निमंत्रण पत्र का नामकरण अप्रासंगिक: वैधानिक विवाह प्रमाणपत्र का अभाव
- अदालत ने रेखांकित किया कि शादी के निमंत्रण पत्र (Wedding Card) पर क्या शब्दावली लिखी गई थी, इसका कोई कानूनी महत्व नहीं है:“यदि आयोजित संस्कार ‘आशीर्वाद’ अनुष्ठान नहीं था, तो पारसी विवाह की एक मौलिक वैधानिक आवश्यकता पूरी नहीं हुई। प्रतिनिधियों ने वीडियो रिकॉर्डिंग की जांच में यह भी पाया कि पारसी विवाह के अनिवार्य अंग के रूप में दोनों पक्षों और गवाहों द्वारा विवाह दस्तावेज (Marriage Certificate/Document) पर कोई पारंपरिक हस्ताक्षर नहीं किए गए थे।”
3. पहला विधिक प्रश्न: क्या अंतरिम चरण (Interlocutory Stage) पर डेलिगेट्स की मदद ली जा सकती है? न्यायालय के समक्ष यह पहला मामला था कि क्या धारा 19 के तहत अंतरिम आवेदनों में प्रतिनिधियों (Delegates) की सहायता वर्जित है:
- धारा 19 बनाम धारा 46 का सामंजस्यपूर्ण अर्थान्वयन (Harmonious Construction):
- पीएमडीए की धारा 46 तथ्यों के प्रश्नों (Questions of Fact) का निर्णय करने का अनन्य अधिकार प्रतिनिधियों को देती है, जबकि धारा 19 अंतरिम आवेदनों में उनके अनिवार्य उपयोग को सीमित करती है।
- अदालत ने माना कि दोनों धाराओं को इस प्रकार पढ़ा जाना चाहिए कि कोई भी धारा निष्प्रभावी (Otiose) न हो। धारा 19 अदालत के लिए जूरी की सहायता लेने की “बाध्यता” को सीमित करती है, लेकिन जब क्षेत्राधिकार तय करने के लिए किसी महत्वपूर्ण तथ्य का निर्णय अंतरिम स्तर पर जरूरी हो, तो यह अदालत को प्रतिनिधियों की सहायता लेने से “प्रतिबंधित” (Forbid) नहीं करती।
- दोनों पक्षों ने आपसी सहमति से वीडियो रिकॉर्डिंग प्रतिनिधियों के समक्ष रखने की प्रक्रिया स्वीकार की थी, अतः बाद में कोई भी पक्ष इसे अनधिकृत “मिनी-ट्रायल” कहकर नकार नहीं सकता।
4. ऑस्ट्रेलियाई तलाक डिक्री और प्रांग्न्याय (Res Judicata) का प्रश्न
- पति ने तर्क दिया था कि ऑस्ट्रेलिया की अदालत द्वारा तलाक, संपत्ति बंटवारे और बच्चों की कस्टडी पर दिए गए अंतिम आदेश के कारण सीपीसी की धारा 13 (विदेशी निर्णय) के तहत यह वाद बाधित (Res Judicata) है।
- हाईकोर्ट ने पति की इस दलील को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि ऑस्ट्रेलियाई अदालत ने भारतीय संपत्तियों और भारतीय कानूनी कार्यवाहियों को अपने फैसले से स्पष्ट रूप से बाहर रखा था, इसलिए धारा 13 के तहत वाद वर्जित नहीं था; वाद केवल क्षेत्राधिकार के अभाव (Lack of Territorial Jurisdiction) के कारण खारिज हुआ।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं वैवाहिक विवाद
- ऑस्ट्रेलिया में सिविल मैरिज (अगस्त 2010): दंपती (दोनों पारसी) पर्थ, पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया में रहते थे। उन्होंने अगस्त 2010 में ऑस्ट्रेलिया में सिविल विवाह (Civil Marriage) किया था।
- मुंबई का कार्यक्रम (20 नवंबर 2010): दंपती नवंबर 2010 में भारत आए और मुंबई में एक पारिवारिक कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिसे पत्नी ने पारसी रीति-रिवाज से हुआ विवाह बताया।
- ऑस्ट्रेलिया में विवाद व तलाक: बाद में दोनों के संबंधों में खटास आ गई और ऑस्ट्रेलिया की पारिवारिक अदालत में मुकदमा चला, जहां तलाक और संपत्तियों के बंटवारे पर अंतिम आदेश पारित हो चुके थे।
- मुंबई में 2018 का वाद और ₹5 करोड़ का गुजारा भत्ता:
- पत्नी ने 2018 में बॉम्बे हाईकोर्ट में पारसी वैवाहिक वाद (Parsi Matrimonial Suit) दायर कर नवंबर 2010 के मुंबई विवाह को विघटित करने और ₹5 करोड़ के स्थायी गुजारा भत्ते (Permanent Alimony) तथा अंतरिम भरण-पोषण की मांग की।
- पति ने अंतरिम आवेदन (Interim Application) दायर कर वाद को सीपीसी के आदेश VII नियम 11(d) के तहत खारिज करने की मांग की, यह कहते हुए कि मुंबई में केवल एक प्रार्थना/आशीर्वाद समारोह हुआ था, कोई विवाह नहीं हुआ था।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: पारसी वैवाहिक वाद एवं अंतरिम आवेदन – बॉम्बे उच्च न्यायालय
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- आवेदक / प्रतिवादी (पति) की ओर से: अधिवक्ता पारुल के. वेदक
- वादी (पत्नी) की ओर से: अधिवक्ता तौबन एफ. ईरानी
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक धाराएं:
- पारसी विवाह एवं तलाक अधिनियम, 1936 (PMDA):
- धारा 3 (वैध पारसी विवाह की आवश्यकताएं – ‘आशीर्वाद’ संस्कार और दो पारसी गवाहों की उपस्थिति में पुरोहित द्वारा संपन्न होना)
- धारा 19 (विशेष अदालतों का गठन और अंतरिम कार्यवाहियों में प्रतिनिधियों की सहायता से जुड़ी शर्तें)
- धारा 29 (मुकदमा दायर करने का क्षेत्रीय क्षेत्राधिकार – जहां विवाह संपन्न हुआ हो या जहां प्रतिवादी रहता हो)
- धारा 46 (तथ्य के प्रश्नों पर निर्णय प्रतिनिधियों/जूरी द्वारा बहुमत से लिया जाना)
- सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC):
- आदेश VII नियम 11(d) (कानून द्वारा वर्जित होने पर वादपत्र का खारिज किया जाना)
- धारा 13 (विदेशी न्यायालयों के निर्णयों की बाध्यकारिता)
- पारसी विवाह एवं तलाक अधिनियम, 1936 (PMDA):
- पीठ: न्यायमूर्ति सोमशेखर सुंदरेशन (बॉम्बे उच्च न्यायालय)
- अंतिम निर्णय: पति का अंतरिम आवेदन स्वीकार; मुंबई में धार्मिक विवाह का अस्तित्व न होने के कारण क्षेत्राधिकार के अभाव में 2018 का पारसी वैवाहिक वाद और ₹5 करोड़ के भरण-पोषण का दावा पूरी तरह खारिज।
Parsi Marriage:मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | बॉम्बे उच्च न्यायालय (Bombay High Court) |
| न्यायाधीश | न्यायमूर्ति सोमशेखर सुंदरेसन (Justice Somasekhar Sundaresan) |
| पक्षकार | पत्नी (वादी) बनाम पति (प्रतिवादी) [दोनों ऑस्ट्रेलिया के पर्थ में निवासी] |
| मुख्य कानूनी मुद्दा | क्या ‘तंदुरुस्ती’ प्रार्थना को पारसी विवाह अधिनियम (PMDA) के तहत वैध ‘आशीर्वाद’ विवाह माना जा सकता है? |
| अदालत का फैसला | नहीं। ‘तंदुरुस्ती’ केवल स्वास्थ्य/सुख के लिए आशीर्वाद है। क्षेत्राधिकार न होने के कारण मुकदमा खारिज। |

