Monday, September 28, 2026
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Conjugal Rights: पारिवारिक न्यायालय सिविल कोर्ट है, उसके आदेशों के खिलाफ वैधानिक अपील का मार्ग उपलब्ध है; हाईकोर्ट ने खारिज की पति की विविध याचिका

हाईकोर्ट के मुख्य निष्कर्ष और कानूनी सिद्धांत

  1. फैमिली कोर्ट एक सिविल कोर्ट है: हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि ‘फैमिली कोर्ट्स एक्ट, 1984’ की धारा 10 के अनुसार वैवाहिक मामलों की सुनवाई करने वाली पारिवारिक अदालत एक सिविल कोर्ट की तरह काम करती है। इसलिए, धारा 9 HMA की कार्यवाही पूरी तरह से एक सिविल कार्यवाही (Civil Proceeding) है, और इसके अंतिम आदेश/डिक्री के खिलाफ अपील का वैधानिक अधिकार उपलब्ध होता है।
  2. सिविल मुकदमों में रिट/अधीक्षण शक्ति की सीमा (Jacky v. Tiny Alias Antony): सुप्रीम कोर्ट के लैंडमार्क फैसले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने दोहराया कि निजी या सिविल विवादों में निचली अदालत की चल रही कार्यवाही को रद्द करने के लिए अनुच्छेद 226 या 227 की शक्तियों का सीधे तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
  3. साक्ष्य और तथ्यों की जांच फैमिली कोर्ट का काम: न्यायमूर्ति अमित सेठ ने माना कि पत्नी का मुकदमा उत्पीड़न के उद्देश्य से है या नहीं, यह तथ्य फैमिली कोर्ट में सबूत/साक्ष्य (Evidence) पेश करके ही साबित किया जा सकता है। हाईकोर्ट अनुच्छेद 227 के तहत मामलों के गुण-दोष (Merits) या तथ्यों की सत्यता की सीधी जांच नहीं कर सकता।

ग्वालियर: पारिवारिक विवादों में उच्च न्यायालय के अधीक्षण क्षेत्राधिकार (Supervisory Jurisdiction under Article 227) के दायरे, वैधानिक उपचारों की उपलब्धता और हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 9 के तहत चल रही कार्यवाहियों को रद्द करने की सीमाओं पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक स्पष्ट और महत्वपूर्ण विधिक व्यवस्था दी है।

न्यायमूर्ति अमित सेठ की एकल पीठ ने ग्वालियर फैमिली कोर्ट में पत्नी द्वारा धारा 9 के तहत शुरू की गई कार्यवाही को कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग बताकर रद्द कराने पहुंचे पति की विविध याचिका (Miscellaneous Petition) को विचारणीयता के आधार पर पूरी तरह खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि सिविल या फैमिली कोर्ट के समक्ष लंबित किसी निजी विवाद में साक्ष्य दर्ज किए बिना रिट अथवा अधीक्षण शक्तियों का प्रयोग कर प्रारंभिक स्तर पर कार्यवाही को खत्म नहीं किया जा सकता। उच्च न्यायालय ने दो-टूक निर्णय दिया है कि फैमिली कोर्ट के समक्ष पत्नी द्वारा दायर दांपत्य अधिकारों के प्रत्यास्थापन (Restitution of Conjugal Rights) के मूल वाद को रद्द (Quash) कराने के लिए भारत के संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत दायर याचिका पोषणीय (Maintainable) नहीं है।

उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं अवलोकन

1. ‘अनुच्छेद 227 के तहत धारा 9 HMA की कार्यवाही रद्द कराने की याचिका पोषणीय नहीं’ न्यायमूर्ति अमित सेठ ने प्रारंभिक विचारणीय बिंदु पर निर्णय देते हुए अपने आदेश में स्पष्ट रूप से कहा: “यह न्यायालय इस सुविचारित राय पर पहुंचा है कि याचिकाकर्ता/पति द्वारा भारत के संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत फैमिली कोर्ट, ग्वालियर के समक्ष प्रतिवादी/पत्नी द्वारा हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 9 के अंतर्गत संस्थित कार्यवाहियों को रद्द कराने के लिए दायर वर्तमान विविध याचिका पोषणीय (Not Maintainable) नहीं है। अतः तय किए गए विधिक प्रश्न का उत्तर याचिकाकर्ता के विरुद्ध दिया जाता है।”

2. फैमिली कोर्ट एक सिविल अदालत है: वैधानिक अपीलीय उपचार की उपस्थिति

  • उच्च न्यायालय ने पारिवारिक न्यायालय अधिनियम, 1984 (Family Courts Act, 1984) के सांविधिक ढांचे को रेखांकित किया:
    • अधिनियम की धारा 10 के अनुसार, वैवाहिक कार्यवाहियों के संचालन के लिए फैमिली कोर्ट को एक सिविल न्यायालय (Civil Court) का दर्जा प्राप्त है।
    • हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 9 के तहत चलने वाली कार्यवाही विशुद्ध रूप से एक दीवानी प्रक्रिया (Civil Proceeding) है।
    • पारिवारिक न्यायालय द्वारा पारित आदेशों और डिक्रियों के खिलाफ अधिनियम की धारा 19 के तहत तथ्यों और कानून दोनों आधारों पर उच्च न्यायालय में नियमित अपील (Appeal) का सीधा वैधानिक प्रावधान मौजूद है।
  • अदालत ने माना कि जब संसद ने एक पूर्ण वैधानिक अपीलीय व्यवस्था प्रदान की है, तो अनुच्छेद 227 के तहत मिलने वाली असाधारण अधीक्षण शक्तियों का उपयोग अधीनस्थ अदालत के मूल क्षेत्राधिकार को दरकिनार (Bypass) करने के लिए नहीं किया जा सकता।

3. ‘मुकदमा केवल परेशान करने के लिए किया गया’ — यह साक्ष्य का विषय है

  • पति ने तर्क दिया था कि पत्नी का धारा 9 का दावा फर्जी है और केवल उत्पीड़न के लिए लाया गया है, क्योंकि पूर्व में जब उसने धारा 9 दायर की थी तब पत्नी ने साथ रहने से साफ मना कर दिया था।
  • हाईकोर्ट ने व्यवस्था दी कि पत्नी द्वारा यह वाद उत्पीड़न के उद्देश्य से दायर किया गया है या वास्तव में दांपत्य अधिकार बहाली के लिए, इसका निर्धारण केवल फैमिली कोर्ट के समक्ष साक्ष्य (Evidence) दर्ज कराकर और गवाहों की जिरह के माध्यम से ही किया जा सकता है। उच्च न्यायालय अनुच्छेद 227 की याचिका में गुण-दोष के आधार पर मिनी-ट्रायल चलाकर इन तथ्यात्मक पहलुओं का फैसला नहीं कर सकता।

4. सिविल न्यायालय के न्यायिक आदेशों और मुकदमों पर रिट की सीमा अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णय जैकी बनाम टिनी उर्फ एंटनी (2014) का संदर्भ लेते हुए दोहराया कि सिविल अदालतों के न्यायिक आदेशों या निजी पक्षकारों के बीच के दीवानी विवादों को समाप्त करने के लिए अनुच्छेद 226 या 227 के असाधारण क्षेत्राधिकार का यांत्रिक या नियमित उपयोग नहीं किया जा सकता।

मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं वैवाहिक विवाद

  • विवाद की पृष्ठभूमि: याचिकाकर्ता (पति) और प्रतिवादी (पत्नी) के बीच वैवाहिक मतभेद चल रहे थे।
  • पति का पूर्व प्रयास: पति के अनुसार, उसने पूर्व में हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 9 के तहत साथ रहने के लिए याचिका लगाई थी, परंतु पत्नी ने तब उसके साथ वैवाहिक सहवास में लौटने से स्पष्ट इनकार कर दिया था।
  • पत्नी द्वारा धारा 9 की अर्जी (फैमिली कोर्ट, ग्वालियर):
    • बाद में पत्नी ने स्वयं फैमिली कोर्ट, ग्वालियर के समक्ष हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 9 के तहत दांपत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना के लिए एक नया मुकदमा संस्थित किया।
  • पति द्वारा हाईकोर्ट का रुख:
    • पति ने ट्रायल कोर्ट में केस लड़ने के बजाय सीधे मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की ग्वालियर पीठ में संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत विविध याचिका दाखिल की।
    • पति का तर्क था कि जब पत्नी पहले साथ रहने से मना कर चुकी थी, तो अब उसका धारा 9 का मुकदमा दाखिल करना अदालत की प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग (Gross Abuse of the Process of Law) है, अतः इसे तुरंत रद्द किया जाना चाहिए।
  • पत्नी का तकनीकी आक्षेप: पत्नी के वकील ने याचिका की ग्राह्यता (Maintainability) पर कड़ा विधिक आक्षेप उठाया कि अनुच्छेद 227 के तहत स्थापित प्रक्रिया को लांघकर फैमिली कोर्ट के मूल वाद को रद्द नहीं कराया जा सकता।

Also Read; Black-complexioned: पति को काला या मोटा कहना तलाक की डिक्री देने का पर्याप्त विधिक आधार नहीं; गर्भपात के बाद पत्नी को मायके भेजने पर परित्याग का दावा खारिज

उच्च न्यायालय का अंतिम आदेश एवं विधिक स्वतंत्रता

अदालत ने याचिका को पोषणीय न मानते हुए खारिज कर दिया, लेकिन पति के वैधानिक अधिकारों को सुरक्षित रखा: “सक्षम क्षेत्राधिकार वाले न्यायालय (इस न्यायालय की समन्वय पीठ) द्वारा पक्षकारों के बीच दिया गया निष्कर्ष अंतिम रूप प्राप्त कर चुका है और पक्षकारों पर बाध्यकारी है। उपरोक्त चर्चा और विचारों के आलोक में, यह विविध याचिका पोषणीयता (Maintainability) के आधार पर खारिज की जाती है। हालांकि, याचिकाकर्ता को कानून के अनुसार उपलब्ध अन्य विधिक उपचारों (Remedies) का उपयोग करने की स्वतंत्रता (Liberty) प्रदान की जाती है।”

विधिक विवरण

  • केस संदर्भ: याचिकाकर्ता (पति) बनाम प्रतिवादी (पत्नी) [विविध याचिका (MP) – मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय, ग्वालियर पीठ]
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक धाराएं:
    • भारत का संविधान – अनुच्छेद 227 (सभी अधीनस्थ न्यायालयों और अधिकरणों पर उच्च न्यायालय के अधीक्षण की शक्ति – Supervisory Jurisdiction)
    • हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 9 (दांपत्य अधिकारों का प्रत्यास्थापन / Restitution of Conjugal Rights)
    • पारिवारिक न्यायालय अधिनियम, 1984 (Family Courts Act, 1984):
      • धारा 10 (पारिवारिक न्यायालयों के लिए सिविल प्रक्रिया संहिता की प्रयोज्यता)
      • धारा 19 (पारिवारिक न्यायालय के आदेशों व डिक्रियों के विरुद्ध उच्च न्यायालय में नियमित अपील)
    • सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) का आदेश VII नियम 11 (प्रारंभिक स्तर पर वाद खारिज करने की सिविल अदालत की शक्ति)
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत व सर्वोच्च न्यायालय की नजीरें:
    • जैकी बनाम टिनी उर्फ एंटनी (2014, सुप्रीम कोर्ट) — ‘अनुच्छेद 227 का उपयोग किसी सक्षम सिविल अदालत के क्षेत्राधिकार को हड़पने या नियमित दीवानी मुकदमे को शॉर्ट-कट तरीके से रद्द करने के लिए नहीं किया जा सकता; यह शक्ति केवल अधिकार क्षेत्र के गंभीर उल्लंघन या न्याय के हनन को रोकने तक सीमित है।’
    • राधे श्याम बनाम छबी नाथ (2015, सुप्रीम कोर्ट संविधान पीठ) — ‘सिविल न्यायालय के न्यायिक आदेशों या कार्यवाहियों के विरुद्ध संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट जारी नहीं की जा सकती; अधीक्षण शक्ति (अनुच्छेद 227) का प्रयोग भी केवल असाधारण परिस्थितियों में ही संभव है।’
    • शालिनी श्याम शेट्टी बनाम राजेंद्र शंकर पाटिल (2010, सुप्रीम कोर्ट) — ‘निजी विवादों में नियमित दीवानी प्रक्रिया और उपलब्ध वैधानिक उपायों को दरकिनार कर सीधे उच्च न्यायालय में याचिका दाखिल करने की प्रवृत्ति को हतोत्साहित किया जाना चाहिए।’
  • पीठ: न्यायमूर्ति अमित सेठ (मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय, ग्वालियर पीठ)
  • अंतिम निर्णय: विविध याचिका पोषणीयता के अभाव में खारिज; पति को फैमिली कोर्ट के समक्ष अपने सभी तथ्य व साक्ष्य रखने और कानून सम्मत विधिक उपचार अपनाने की छूट।

Conjugal Rights: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतमध्य प्रदेश उच्च न्यायालय (Madhya Pradesh High Court, Gwalior Bench)
पीठन्यायमूर्ति अमित सेठ (Justice Amit Seth)
याचिका का आधारसंविधान का अनुच्छेद 227 (उच्च न्यायालय की अधीक्षण शक्ति)
मुख्य विवादक्या अनुच्छेद 227 के तहत फैमिली कोर्ट में चल रहे धारा 9 (Restitution of Conjugal Rights) के सिविल केस को रद्द किया जा सकता है?
हाईकोर्ट का फैसलायाचिका विचारणीय नहीं (Dismissed as Not Maintainable); पति फैमिली कोर्ट में ही अपने साक्ष्य रखे।
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