Sunday, October 4, 2026
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POCSO Act: वैवाहिक विवादों में POCSO एक्ट के दुरुपयोग पर जताई चिंता; सौतेली बेटी से दुष्कर्म के आरोपी को किया बरी, व्यक्तिगत हिसाब यहां बराबर न करें

मामला सारांश (At a Glance)

पहलूविवरण
माननीय न्यायाधीशन्यायमूर्ति ए. बदरुद्दीन (Kerala High Court)
संबंधित कानूनPOCSO Act, 2012 & Indian Penal Code (IPC)
मुख्य बिंदुवैवाहिक कलह के दौरान बदला लेने के लिए POCSO का दुरुपयोग चिंताजनक; झूठी शिकायत के संदेह पर आरोपी बरी।

POCSO Act: केरल उच्च न्यायालय (Kerala High Court) ने एक फैसले में चेतावनी दी है कि वैवाहिक विवादों और आपसी रंजिश के मामलों में बदला लेने के लिए पोक्सो अधिनियम (POCSO Act) के कड़े प्रावधानों का दुरुपयोग किया जा रहा है।

न्यायमूर्ति ए. बदरुद्दीन (Justice A Badharudeen) की एकल पीठ ने अपनी सौतेली बेटी के साथ यौन उत्पीड़न के आरोपी व्यक्ति को सभी आरोपों से बरी (Acquitted) करते हुए यह टिप्पणी की। निचली अदालत ने आरोपी को दोषी ठहराया था और वह लगभग 3 साल से जेल में था।

POCSO Act: अदालत के मुख्य कानूनी सिद्धांत और टिप्पणियां

  • वैवाहिक विवादों में पोक्सो का दुरुपयोग:“पोक्सो अधिनियम के प्रावधानों का दुरुपयोग लोगों के एक वर्ग द्वारा बदला लेने, व्यक्तिगत हिसाब चुकता करने और अवैध लाभ प्राप्त करने के लिए किया जा रहा है। इसका सबसे मुख्य क्षेत्र तब देखने को मिलता है जब पति-पत्नी के बीच वैवाहिक कलह होती है।”
  • बच्चों की कस्टडी और दबाव बनाने की रणनीति:
    • कोर्ट ने नोट किया कि जब पत्नी अपने पति के साथ विवाद में होती है, तो वह न केवल फैमिली कोर्ट या मजिस्ट्रेट कोर्ट में केस दर्ज कराती है, बल्कि पति पर दबाव बनाने, डर पैदा करने और बच्चे की कस्टडी रोकने के लिए पिता द्वारा अपने ही बच्चे या सौतेले पिता द्वारा दूसरी पत्नी के बच्चों के साथ यौन शोषण के झूठे आरोप लगाने की प्रवृत्ति देखी जा रही है।
  • अदालतों के लिए सतर्कता का निर्देश:
    • उच्च न्यायालय ने कहा कि ट्रायल कोर्ट्स (निचली अदालतों) का यह कर्तव्य है कि वे ऐसे मामलों में साक्ष्यों की गहरी अंतर्दृष्टि (Insight) के साथ जांच करें ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि कहीं किसी निर्दोष को झूठे मुकदमे में तो नहीं फंसाया जा रहा है।

POCSO Act: मामले की पृष्ठभूमि (Case Background)

  • आरोप: आरोपी पर आरोप था कि उसने 2014 से 2018 के बीच अपनी सौतेली बेटी का कई बार यौन उत्पीड़न किया।
  • देरी और विसंगतियां: कथित घटनाएं 2014-2018 के बीच की बताई गईं, लेकिन एफआईआर (FIR) 2020 में तब दर्ज कराई गई जब मां और पति के बीच वैवाहिक विवाद शुरू हुआ।
  • साक्ष्यों की कमी:
    • कोर्ट ने पाया कि पीड़िता ने 2019 में अपनी मां के साथ कुवैत यात्रा के दौरान या मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज बयान में इस घटना का कोई जिक्र नहीं किया था।
    • चिकित्सीय साक्ष्य (Medical Evidence) में यौन संबंध की पुष्टि होना अकेले आरोपी को दोषी ठहराने का आधार नहीं बन सकता, क्योंकि पीड़िता का किसी अन्य लड़के के साथ संबंध था, जिसकी जानकारी आरोपी ने ही उसकी मां को दी थी।

POCSO Act: उच्च न्यायालय का अंतिम निर्णय

हाई कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष (Prosecution) के साक्ष्यों में गंभीर संदेह हैं। कानून के स्थापित सिद्धांत के अनुसार, जब साक्ष्यों में संदेह पैदा होता है, तो उसका लाभ अभियुक्त (Benefit of Doubt) को मिलना चाहिए। कोर्ट ने आरोपी की सजा को रद्द करते हुए उसे तुरंत रिहा करने का आदेश दिया।

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