POCSO ACT-II: केरल हाई कोर्ट ने नाबालिग बच्चियों के खिलाफ होने वाले यौन अपराधों को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण कानूनी रुख साफ किया है।
अदालत ने आरोपी की सजा को रखा बरकरार
हाईकोर्ट के जस्टिस ए. बदरुद्दीन की सिंगल बेंच ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष (Prosecution) ने पीड़िता की उम्र और उसके साथ हुए अपराध को अकाट्य वैज्ञानिक व दस्तावेजी साक्ष्यों के जरिए ‘संदेह से परे’ साबित किया है। कोर्ट ने मलप्पुरम के एक व्यक्ति की याचिका को खारिज करते हुए उसकी सजा को बरकरार रखा है। हाई कोर्ट ने साफ तौर पर कहा कि यदि पीड़ित लड़की नाबालिग (18 वर्ष से कम उम्र) है, तो यौन संबंधों में उसकी ‘सहमति’ (Consent) की दलील का कानून की नजर में कोई मूल्य या महत्व नहीं रह जाता।
क्या था पूरा मामला? (गर्भावस्था और कोर्ट में ‘सहमति’ का दावा)
यह मामला जून 2023 का है, जब केरल की एक विशेष पॉक्सो (POCSO) अदालत ने आरोपी को नाबालिग से दुष्कर्म, उसे गर्भवती करने और बच्चे को जन्म देने के लिए मजबूर करने का दोषी पाते हुए कठोर कारावास और जुर्माने की सजा सुनाई थी। इसी फैसले के खिलाफ दोषी ने हाई कोर्ट में अपील दायर की थी।
दोषी की अदालत में दलीलें: आरोपी के वकील ने दावा किया कि पीड़िता और उसके बीच जो भी संबंध थे, वे आपसी सहमति (Consensual Relationship) से बने थे।
उसने यह भी आरोप लगाया कि अभियोजन पक्ष कोर्ट में यह साबित करने में नाकाम रहा कि घटना के समय लड़की की उम्र 18 साल से कम थी।
स्कूल सर्टिफिकेट उम्र का पक्का सबूत: हाई कोर्ट
खारिज: केरल हाई कोर्ट ने उम्र को लेकर उठाए गए आरोपी के दावों को पूरी तरह खारिज कर दिया। अदालत ने पाया कि पीड़िता की उम्र साबित करने के लिए कई पुख्ता दस्तावेज मौजूद थे।
SSLC रिकॉर्ड पर भरोसा: कोर्ट ने पीड़िता के स्कूल एडमिशन रिकॉर्ड और SSLC (Secondary School Leaving Certificate – 10वीं का बोर्ड सर्टिफिकेट) को प्राथमिक और विश्वसनीय सबूत माना।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला: जस्टिस बदरुद्दीन ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय और केरल हाई कोर्ट के पिछले फैसलों के अनुसार, किसी भी मामले में उम्र के निर्धारण के लिए मैट्रिकुलेशन या स्कूल रिकॉर्ड पूरी तरह से मान्य और विश्वसनीय साक्ष्य हैं।
‘सहमति’ की दलील पर हाई कोर्ट का सख्त रुख
नाबालिग की सहमति के तर्क को सिरे से खारिज करते हुए अदालत ने अपने फैसले में लिखा, अभियोजन पक्ष ने यह पूरी तरह साबित कर दिया है कि अपीलकर्ता/आरोपी ने एक नाबालिग पीड़िता (18 वर्ष से कम आयु) के साथ जबरन यौन उत्पीड़न (Penetrative Sexual Assault) किया, जिसके परिणामस्वरूप वह गर्भवती हुई और उसने एक बच्चे को जन्म दिया। चूंकि पीड़िता कानूनन एक नाबालिग बच्ची है, इसलिए इस मामले में आपसी सहमति (Consent) के सवाल पर विचार ही नहीं किया जा सकता। पॉक्सो एक्ट के तहत, बच्चों के संरक्षण को इस तरह की दलीलों से कमजोर नहीं किया जा सकता। हाई कोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट ने पीड़िता के बयान, गवाहों की गवाही, मेडिकल रिपोर्ट और फॉरेंसिक (डीएनए/वैज्ञानिक) साक्ष्यों का बिल्कुल सही मूल्यांकन किया था, इसलिए सजा में किसी भी तरह के बदलाव या राहत की कोई गुंजाइश नहीं है।
विश्लेषण: पॉक्सो मामलों में ‘सहमति और सजा’ की कानूनी स्थिति
| कानूनी बिंदु | केरल हाई कोर्ट का रुख और स्थापित कानून |
| नाबालिग की सहमति = शून्य | भारत के कानून (POCSO Act) के तहत 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को सहमति देने के लिए मानसिक और कानूनी रूप से परिपक्व नहीं माना जाता। इसलिए उनकी ‘हां’ को भी कानूनन ‘ना’ ही माना जाता है। |
| वैज्ञानिक साक्ष्यों की अहमियत | इस मामले में डीएनए (DNA) और मेडिकल रिपोर्ट जैसे वैज्ञानिक साक्ष्यों ने आरोपी के खिलाफ अपराध को अकाट्य बना दिया, जिससे उसका बचना नामुमकिन हो गया। |
| सख्त सजा की बहाली | हाई कोर्ट ने माना कि अपराध की गंभीरता को देखते हुए विशेष अदालत द्वारा दी गई सश्रम कारावास (Rigorous Imprisonment) की सजा पूरी तरह से न्यायसंगत और आनुपातिक (Proportionate) है। |
बॉटमलाइन (The Bottom Line)
केरल हाई कोर्ट का यह फैसला उन लोगों के लिए एक सख्त चेतावनी है जो नाबालिगों के साथ शारीरिक संबंध बनाने के बाद अदालत में ‘रोमांटिक लव अफेयर’ या ‘आपसी सहमति’ का मुखौटा ओढ़ने की कोशिश करते हैं। देश की न्यायप्रणाली बच्चों को सुरक्षित माहौल देने के लिए प्रतिबद्ध है, और उम्र के जाल या तकनीकी कमियों का फायदा उठाकर किसी भी शिकारी (Predator) को समाज में खुला घूमने की इजाजत नहीं दी जा सकती। आरोपी की अपील खारिज होने के बाद अब उसे जेल की सलाखों के पीछे अपनी पूरी सजा काटनी होगी।

