Saturday, June 6, 2026
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POCSO Act-I: मशीन मत बनिए, वो मासूम हैं! मामलों में संवेदनशीलता जरूरी, मशीनी तरीके से चल रहे मुकदमों पर अदालत की सख्ती, पढ़िए केस

POCSO Act-I: मद्रास हाई कोर्ट ने बच्चों के खिलाफ होने वाले यौन अपराधों से जुड़े पॉक्सो एक्ट (POCSO Act) के मामलों की सुनवाई को लेकर देश के पूरे क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम को झकझोरने वाली और बेहद संवेदनशील टिप्पणी की है।

चार अलग-अलग याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई

हाईकोर्ट के जस्टिस एल. विक्टोरिया गौरी की सिंगल बेंच ने 1 जून को तमिलनाडु के अलग-अलग जिलों से आईं चार अलग-अलग याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई करते हुए यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया। इन याचिकाओं में पॉक्सो के तहत दर्ज आपराधिक मुकदमों को रद्द (Quash) करने की मांग की गई थी। कोर्ट ने इस मौके का इस्तेमाल यह गहराई से समझने के लिए किया कि आखिरकार हमारा पूरा सिस्टम न्याय की इस प्रक्रिया में बच्चों के साथ कैसा बर्ताव कर रहा है। कोर्ट ने आगाह किया है कि अगर बच्चों से जुड़े सुरक्षा कानूनों को मशीनी (Mechanical) या असंवेदनशील तरीके से लागू किया गया, तो “कानूनी प्रक्रियाओं की सबसे बड़ी और आखिरी शिकार (Casualty) हमेशा वह पीड़ित बच्ची या बच्चा ही होगा।”

कानूनी फाइलें बच्चों का मानसिक दर्द नहीं दर्ज कर पातीं: हाई कोर्ट

हाई कोर्ट ने जांच और अदालती कार्यवाही के दौरान बच्चों को होने वाली मानसिक और भावनात्मक प्रताड़ना (Secondary Victimisation) पर अपनी गहरी चिंता व्यक्त की। कहा, पुलिस अधिकारियों, सलाहकारों (Counsellors), डॉक्टरों, सरकारी वकीलों या अदालतों के सामने एक ही दर्दनाक कहानी को बार-बार दोहराने के लिए मजबूर बच्चा जिस भावनात्मक और मानसिक दौर से गुजरता है, उसे अदालती रिकॉर्ड या कानूनी फाइलें कभी दर्ज नहीं कर पातीं। रिकॉर्ड पर लिखी हर एक गवाही, कराया गया हर एक मेडिकल टेस्ट, हर एक आमना-सामना और कोर्ट में बच्चे की हर एक पेशी, उसके विकासशील कोमल मन पर एक ऐसा गहरा और अमिट मनोवैज्ञानिक घाव (Psychological Impression) छोड़ जाती है जिसे मिटाना नामुमकिन होता है।

चार अलग मामले, पर एक जैसी कड़वी हकीकत

जस्टिस गौरी ने नोट किया कि ये चारों मामले भले ही अलग-अलग पृष्ठभूमि और अलग जिलों से आए थे, लेकिन इन सबमें एक बेहद परेशान करने वाली समान बात थी। कोर्ट में आते ही कानून की सुरक्षा छतरी के नीचे रहने के बजाय ये बच्चे भावनात्मक भ्रम और भारी मानसिक तनाव का शिकार हो रहे थे। व्यवस्था की असंवेदनशीलता के कारण एक ही घिनौनी घटना को बार-बार सुनाने के लिए मजबूर थे। समाज के ताने (Social Stigma) और पारिवारिक कलह के बीच पिस रहे थे। अदालत ने साफ किया कि उन्होंने इन चारों मामलों को एक साथ जोड़कर केवल इसलिए सुनाया है ताकि संस्थागत आत्मनिरीक्षण (Institutional Introspection), पुलिस-न्यायिक सुधार और अकादमिक रिसर्च की शुरुआत की जा सके।

‘पॉक्सो का मकसद सिर्फ एफआईआर दर्ज करना या सजा दिलाना नहीं है’

अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि पॉक्सो एक्ट निसंदेह भारत के सबसे प्रगतिशील बाल-संरक्षण कानूनों में से एक है, लेकिन जब तक इसे लागू करने वाली एजेंसियां संवेदनशील नहीं होंगी, इसके संवैधानिक उद्देश्य अधूरे रहेंगे। “बाल संरक्षण न्यायशास्त्र (Child Protection Jurisprudence) की असली आत्मा केवल एफआईआर दर्ज करने, चार्जशीट दाखिल करने या आरोपी को सजा (Conviction) दिलाने तक सीमित नहीं है। इसकी असली आत्मा तो बच्चे के बचपन की गरिमा को बचाने, उसकी भावनात्मक सुरक्षा सुनिश्चित करने, उसकी पढ़ाई जारी रखने, उसे मानसिक तौर पर ठीक करने, समाज में दोबारा सम्मानजनक तरीके से शामिल करने और संवैधानिक करुणा (Constitutional Compassion) दिखाने में बसती है।

सिस्टम की वो बड़ी कमियां, जिन्हें हाई कोर्ट ने उजागर किया

अदालत ने क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम की उन प्रमुख कमियों (Systemic Gaps) को रेखांकित किया जो बच्चों को न्याय दिलाने के बजाय उन्हें और अधिक प्रताड़ित करती हैं।

पहचानी गई कमियां (Systemic Gaps)सुधार की आवश्यकता और हाई कोर्ट का रुख
1. मशीनी जांच प्रणालीजांच के दौरान ‘ट्रॉमा-इन्फॉर्म्ड’ (पीड़ित के मानसिक सदमे को ध्यान में रखकर) दृष्टिकोण की भारी कमी है।
2. बार-बार पूछताछबच्चे को बार-बार एक ही कहानी दोहराने के लिए मजबूर कर भावनात्मक रूप से थका दिया जाता है।
3. बाल मनोविज्ञान की समझ न होनापुलिस और कोर्ट स्टाफ में चाइल्ड साइकोलॉजी (बाल मनोविज्ञान) की ट्रेनिंग न के बराबर है।
4. कमजोर काउंसलिंग सिस्टमपीड़ित बच्चों को संभालने के लिए पर्याप्त और पेशेवर काउंसलिंग सपोर्ट मैकेनिज्म उपलब्ध नहीं है।
5. पुनर्वास में कमियांअदालतों का पूरा ध्यान सिर्फ केस निपटाने पर रहता है, बच्चे के सुरक्षित पुनर्वास (Rehabilitation) पर नहीं।

असली मामलों की गंभीरता कम न हो, लेकिन संवेदनशीलता जरूरी

इसके साथ ही, जस्टिस विक्टोरिया गौरी ने यह भी बिल्कुल साफ कर दिया कि उनकी इन टिप्पणियों का मतलब यह कतई नहीं निकाला जाना चाहिए कि वे बच्चों के यौन शोषण से जुड़े वास्तविक और गंभीर मामलों की गंभीरता को कम (Dilute) कर रही हैं। अदालत ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि “बच्चे से जुड़े हर एक आरोप को अत्यंत सावधानी, देखभाल, विशेषज्ञता, संवेदनशीलता, जिम्मेदारी और संस्थागत ईमानदारी के साथ ही संभाला जाना चाहिए।”

बॉटमलाइन (The Bottom Line)

मद्रास हाई कोर्ट का यह फैसला देश की पुलिस और अदालतों को अपनी आंखें खोलने का इशारा करता है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि पॉक्सो एक्ट की कामयाबी को सिर्फ इस बात से नहीं मापा जा सकता कि कितने लोगों को सजा मिली, बल्कि इस बात से मापा जाना चाहिए कि अदालत से बाहर निकलने के बाद वह बच्चा खुद को कितना सुरक्षित, आश्वस्त और मानसिक रूप से मजबूत महसूस करता है। इस आदेश को पुलिस और न्यायिक अधिकारियों की ट्रेनिंग के लिए एक जरूरी रिसोर्स के रूप में इस्तेमाल किया जाना चाहिए ताकि कागजी औपचारिकताओं के चक्कर में किसी मासूम का बचपन पूरी तरह से न उजड़े।

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