हाईकोर्ट के मुख्य अवलोकन और निर्देश
- दिशानिर्देशों के उल्लंघन पर चिंता: जिला अदालतों का दौरा करने के बाद पीठ ने टिप्पणी की:“दौरे के दौरान हमने पाया कि अधिकांश पॉक्सो अदालतें POCSO अधिनियम के तहत निर्दिष्ट दिशानिर्देशों के अनुरूप नहीं हैं। वहां सुविधाएं पूरी तरह अपर्याप्त हैं।”
- अतिरिक्त पॉक्सो अदालतों और स्थान की जानकारी मांगी: अदालत ने रजिस्ट्रार (जिला न्यायपालिका) को एक हलफनामा दायर करने का निर्देश दिया है, जिसमें:
- केरल में पॉक्सो मामलों के निपटारे के लिए आवश्यक अतिरिक्त अदालतों की संख्या स्पष्ट की जाए।
- ऐसी अदालतों को चिह्नित किया जाए जो वर्तमान में POCSO मानकों का पालन नहीं कर रही हैं।
- यदि स्थानों की कमी है, तो राज्य सरकार को तत्काल सभी आवश्यक बुनियादी ढांचे के साथ उपयुक्त कमरे प्रदान करने के लिए कदम उठाने को कहा गया है।
- विशेष पॉक्सो सरकारी अभियोजक (Exclusive Public Prosecutors): याचिकाकर्ताओं के वरिष्ठ अधिवक्ता रंजीत थंपन ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले (In Re: Alarming Rise in the Number of Reported Child Rape Incidents) का हवाला देते हुए कहा कि राज्य सरकार केवल पॉक्सो मामलों के लिए समर्पित विशेष लोक अभियोजकों की नियुक्ति करने में विफल रही है।
- पॉक्सो वकीलों/अभियोजकों का विशेष प्रशिक्षण: हाईकोर्ट ने महानिदेशक अभियोजन (DGP) टी. असफ अली को निर्देश दिया कि वे सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार पॉक्सो अभियोजकों को बाल मनोविज्ञान (Child Psychology), बाल व्यवहार, स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों और विशेष कानूनों में प्रशिक्षित करने पर अपनी रिपोर्ट अगली सुनवाई तक सौंपें।
कोच्चि: केरल हाईकोर्ट ने राज्य में लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण (POCSO) अधिनियम के तहत गठित विशेष अदालतों के बुनियादी ढांचे, बाल-सुलभ सुविधाओं (Child-friendly Infrastructure) के अभाव और तय वैधानिक मानकों के खुले उल्लंघन पर गंभीर चिंता जताई है।
केरल उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सौमेन सेन और न्यायमूर्ति स्याम कुमार वी.एम. की खंडपीठ ने ‘डिस्ट्रिक्ट बार एसोसिएशन’ द्वारा दायर जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए 23 सितंबर 2026 को केरल सरकार को सख्त निर्देश दिए कि वह तत्काल कदम उठाकर इन विशेष अदालतों को पॉक्सो मानकों के अनुरूप तैयार करे। उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों द्वारा जिला अदालतों के औचक भौतिक निरीक्षण (Physical Inspection) में पाया गया कि अधिकांश पॉक्सो अदालतें अधिनियम के तहत निर्धारित अनिवार्य दिशानिर्देशों और मानकों का पालन नहीं कर रही हैं और वहां बच्चों व गवाहों के लिए सुविधाएं बेहद दयनीय हैं।
उच्च न्यायालय के प्रमुख अवलोकन एवं बाध्यकारी निर्देश
1. ‘अदालतें पॉक्सो दिशानिर्देशों का पालन नहीं कर रहीं’: खंडपीठ का जमीनी परीक्षण न्यायमूर्ति सौमेन सेन और न्यायमूर्ति स्याम कुमार वी.एम. ने अपने व्यक्तिगत निरीक्षण का हवाला देते हुए आदेश में दर्ज किया: “जिला अदालतों के दौरे के दौरान हमने पाया कि अधिकांश पॉक्सो अदालतें पॉक्सो अधिनियम के तहत निर्दिष्ट दिशानिर्देशों के अनुरूप नहीं हैं। वहां उपलब्ध सुविधाएं भी पूरी तरह अपर्याप्त हैं। राज्य सरकार को निर्देश दिया जाता है कि वह इन अदालतों को पॉक्सो दिशानिर्देशों के अनुरूप बनाने के लिए तत्काल प्रभावी कदम उठाए।”
2. आवश्यक अतिरिक्त अदालतों और स्थान की कमी पर विस्तृत हलफनामा तलब
- खंडपीठ ने रजिस्ट्रार (जिला न्यायपालिका) को निर्देश दिया कि वह एक औपचारिक हलफनामा दाखिल कर यह स्पष्ट करें कि केरल में पॉक्सो मामलों के त्वरित निपटारे के लिए कुल कितनी अतिरिक्त विशेष अदालतों (Additional POCSO Courts) की आवश्यकता है।
- अदालत ने आदेश दिया:“हलफनामे में उन सभी अदालतों को चिन्हित किया जाए जो पॉक्सो मामलों की सुनवाई कर रही हैं लेकिन पॉक्सो दिशानिर्देशों का अनुपालन नहीं कर रही हैं। यह सुनिश्चित करने के लिए तत्काल कदम उठाए जाने चाहिए कि वे अदालतें अनिवार्य मानकों पर खरी उतरें। यदि कहीं भी जगह की कमी है, तो राज्य सरकार दिशानिर्देशों के अनुरूप पॉक्सो अदालतों के सुचारू संचालन के लिए सभी बुनियादी ढांचे से युक्त उपयुक्त कमरे व सुविधाएं उपलब्ध कराने की दिशा में तुरंत कार्रवाई करे।”
3. विशेष लोक अभियोजकों की नियुक्ति और सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अनदेखी
- याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता रंजीत थम्पन ने उजागर किया कि राज्य सरकार ने पॉक्सो अदालतों के लिए स्वतंत्र और विशेष लोक अभियोजक (Exclusive Public Prosecutors) नियुक्त करने में विफलता दिखाई है, जबकि सामान्य अदालतों के सरकारी वकीलों पर ही इसका अतिरिक्त बोझ डाल दिया गया है।
- उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक स्वप्रेरणा संज्ञान फैसले Alarming Rise in the Number of Reported Child Rape Incidents, In Re का हवाला दिया, जिसमें राज्यों को प्रत्येक पॉक्सो अदालत के लिए समर्पित और विशेष रूप से प्रशिक्षित अभियोजक नियुक्त करने का स्पष्ट आदेश दिया गया था।
- उच्च न्यायालय ने अभियोजन महानिदेशक (Director General of Prosecution – DGP) टी. आसफ अली को निर्देश दिया कि वे सुप्रीम कोर्ट के उक्त फैसले के पैरा 10 में दिए गए निर्देशों पर गंभीरता से विचार करें—जिसमें अभियोजकों को बाल मनोविज्ञान (Child Psychology), बाल व्यवहार (Child Behaviour), चिकित्सीय/स्वास्थ्य समस्याओं और संवेदनशीलता में विशेष प्रशिक्षण देना अनिवार्य किया गया है—और अगली सुनवाई पर इस संबंध में अपना औपचारिक रुख प्रस्तुत करें।
पॉक्सो अदालतों के लिए अनिवार्य वैधानिक मानक (POCSO Framework)
पॉक्सो अधिनियम, 2012 और सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस के तहत विशेष अदालतों में निम्नलिखित सुविधाएं होना अनिवार्य है:
- बाल-सुलभ वातावरण (Child-Friendly Environment): अदालत कक्ष नियमित आपराधिक अदालतों जैसा भयभीत करने वाला नहीं होना चाहिए; वहां खिलौने, अनुकूल बैठक व्यवस्था और प्रतीक्षालय होना अनिवार्य है।
- आरोपी से सीधा सामना न होना: गवाही के दौरान बच्चे का आरोपी से सीधा आमना-सामना रोकने के लिए वन-वे मिरर (One-way Mirror), स्क्रीन या वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग लिंक की पुख्ता व्यवस्था।
- पृथक प्रवेश द्वार: बच्चों और उनके परिवारों के लिए अदालत में आने-जाने हेतु अलग और सुरक्षित प्रवेश/निकास मार्ग ताकि उन्हें अन्य अपराधियों या भीड़ का सामना न करना पड़े।
- समयबद्ध विचारण: मामले का संज्ञान लेने की तारीख से 1 वर्ष के भीतर मुकदमे का अनिवार्य निस्तारण।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: डिस्ट्रिक्ट बार एसोसिएशन व अन्य बनाम केरल राज्य व अन्य [W.P.(C) (जनहित याचिका) – केरल उच्च न्यायालय]
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ताओं की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता रंजीत थम्पन
- राज्य सरकार / अभियोजन की ओर से: अभियोजन महानिदेशक (DGP) टी. आसफ अली
- प्रासंगिक कानून एवं सांविधिक प्रावधान:
- लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (POCSO Act) की धारा 28 (विशेष न्यायालयों की स्थापना), धारा 32 (विशेष लोक अभियोजकों की नियुक्ति) एवं धारा 33, 35 (विशेष न्यायालयों की प्रक्रिया व बाल-सुलभ कार्यप्रणाली)
- पॉक्सो नियम, 2020
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 21 (त्वरित व निष्पक्ष न्याय का अधिकार) एवं अनुच्छेद 226
- संबद्ध ऐतिहासिक न्यायिक नजीरें:
- Alarming Rise in the Number of Reported Child Rape Incidents, In Re (2019, सुप्रीम कोर्ट) — ‘शीर्ष अदालत ने 100 से अधिक पॉक्सो केस वाले प्रत्येक जिले में समर्पित विशेष अदालतें स्थापित करने और विशेष रूप से प्रशिक्षित एक्सक्लूसिव पब्लिक प्रॉसिक्यूटर्स की नियुक्ति अनिवार्य की थी।’
- ई.एम. बनाम केरल राज्य (केरल उच्च न्यायालय) — ‘पॉक्सो पीड़ित बच्चे को दोबारा मानसिक आघात (Secondary Victimization) से बचाना न्यायिक व्यवस्था का सर्वोच्च कर्तव्य है।’
- पीठ: मुख्य न्यायाधीश सौमेन सेन और न्यायमूर्ति स्याम कुमार वी.एम. (केरल उच्च न्यायालय)
- अगली सुनवाई: 14 अक्टूबर 2026 (डीजीपी और रजिस्ट्रार को अनुपालन हलफनामा प्रस्तुत करने का निर्देश)।
POCSO Courts’ Facility: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | केरल उच्च न्यायालय (Kerala High Court) |
| पीठ के न्यायाधीश | मुख्य न्यायाधीश सौमेन सेन और न्यायमूर्ति श्याम कुमार वी.एम. |
| याचिकाकर्ता | डिस्ट्रिक्ट बार एसोसिएशन व अन्य |
| मुख्य मुद्दा | पॉक्सो अदालतों में बुनियादी ढांचे, बाल-अनुकूल माहौल (Child-Friendly Setup) और विशेष अभियोजकों की कमी |
| अगली सुनवाई | 14 अक्टूबर 2026 |

