Tuesday, August 25, 2026
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Custody Of The Dog: जब ‘हेनरी’ और ‘टिक्की’ के चक्कर में जजों को बनना पड़ा ‘पेट काउंसलर’!, पांच अलग-अलग केसों में पालतु कुत्ते की कहानी

Custody Of The Dog: टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा और उनके पूर्व पार्टनर एडवोकेट जय अनंत देहाद्राई के बीच उनके रॉटवीलर डॉग ‘हेनरी’ की कस्टडी को लेकर चल रही कानूनी जंग इन दिनों दिल्ली हाई कोर्ट में है।

बेजुबान कुत्तों को लेकर दायर किए गए कई केस

अदालत में जब पति-पत्नी या पार्टनर्स के बीच ब्रेकअप होता है, तो अक्सर बात कार, फ्लैट या बैंक बैलेंस के बंटवारे पर आकर रुकती है। लेकिन क्या हो जब दोनों एक बेज़ुबान कुत्ते के लिए आपस में भिड़ जाएं? कानून की किताबों में भले ही पेट्स (Pets) को ‘सामान या प्रॉपर्टी’ माना गया हो, लेकिन भारत की अदालतें अब मानती हैं कि जानवरों का भी अपना एक इमोशनल राइट होता है। निचली अदालत ने यह कहकर महुआ को कस्टडी देने से मना कर दिया था कि भारतीय कानून में ‘पेट पेरेंट’ (Pet Parent) जैसा कोई लीगल कॉन्सेप्ट नहीं है और हेनरी एक ‘चल संपत्ति’ (Movable Property) है। लेकिन हाई कोर्ट में महुआ का तर्क है कि “कुत्ता कोई सोफा या आलमारी नहीं है, उसे पालने वाले के प्यार से दूर नहीं किया जा सकता।

केस 1: हेनरी (दिल्ली हाई कोर्ट, 2026 अपडेट) ‘मैं पेट पेरेंट हूं, कोई फर्नीचर की मालकिन नहीं!’

क्या था पंगा?: महुआ मोइत्रा बनाम जय अनंत देहाद्राई। मामला रॉटवीलर हेनरी के मालिकाना हक का था।

जज का डिजिटल ट्विस्ट: कोर्ट ने दोनों पक्षों की ज़िद को देखते हुए बीच का रास्ता निकालने की कोशिश की। जस्टिस जसमीत सिंह ने सुझाव दिया, “दिक्कत क्या है? महुआ को हेनरी से पार्क में एक घंटे मिलने दिया जाए। कोर्ट एक लोकल कमिश्नर नियुक्त कर देगा जो डॉग को लाएगा और वापस छोड़ देगा।” हालांकि, आपसी सहमति न बनने पर कोर्ट अब इस ‘विजिटेशन राइट’ पर एक बाइंडिंग फैसला सुनाने जा रहा है।

विवाद की जड़: निचली अदालत ने हेनरी की कस्टडी महुआ को देने से यह कहते हुए मना कर दिया कि कानून में ‘पेट पेरेंट’ जैसा कोई शब्द नहीं है और जय अनंत ने इसके पैसे चुकाए थे।

हाई कोर्ट में नया ट्विस्ट: महुआ ने दिल्ली हाई कोर्ट में दलील दी कि डॉग कोई मेज-कुर्सी (Movable Property) नहीं है जिसे खरीद के आधार पर बांट दिया जाए। उन्होंने बचपन से हेनरी को पाला है और कोर्ट को उसके इमोशन्स का ध्यान रखना चाहिए। फिलहाल हाई कोर्ट ने जय अनंत को नोटिस भेजकर जवाब मांगा है।

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केस 2: मिष्टी, कोको और कॉटन (दिल्ली हाई कोर्ट, 2025) ‘बेजुबानों का इमोशनल ट्रॉमा’

क्या था पंगा?: एक शख्स के घर से पुलिस ने तीन टॉय पॉमेरियन डॉग्स को खराब हालत में रेस्क्यू कर एक एनजीओ को दिया, जहाँ से उन्हें नए पेरेंट्स ने गोद ले लिया। बाद में पुराना मालिक उन्हें वापस मांगने आ गया।

फाइट किसके बीच?: डॉग्स का पुराना मालिक बनाम उन्हें गोद लेने वाले (Adoptive Parents)।

विवाद की जड़: एक शख्स के घर से पुलिस ने बेहद खराब हालत में इन 3 पॉमेरिनियंस को रेस्क्यू कर एक एनजीओ को दिया था, जहां से इन्हें नए पैरेंट्स ने गोद ले लिया। बाद में पुराने मालिक ने मालिकाना हक का केस जीत लिया और डॉग्स वापस मांगे।

जज का डिजिटल ट्विस्ट: जस्टिस गिरीश कठपालिया ने पुराने मालिक की अर्जी खारिज करते हुए एक ऐतिहासिक बात कही: “हम इन बेज़ुबान जानवरों को किसी बेजान वस्तु (Inanimate Object) की तरह नहीं देख सकते। हमें उस मानसिक आघात (Emotional Trauma) को भी समझना होगा, जिससे ये बेज़ुबान जीव अपने नए अडॉप्टिव पेरेंट्स से अलग होने पर गुज़रेंगे।”

अदालत का फैसला (2025): दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस गिरीश कठपालिया ने कहा कि किसी बेजुबान को उसकी नई फैमिली से अलग करना उसे ‘इमोशनल ट्रॉमा’ (मानसिक आघात) देना है। कोर्ट ने डॉग्स को उनकी गोद लेने वाली नई फैमिली के पास ही रखने का आदेश दिया।

केस 3: टिक्की (बॉम्बे हाई कोर्ट) 14 दिन मम्मी के पास, 16 दिन पापा के पास’

क्या था पंगा?: पति-पत्नी के तलाक के बाद पालतू कुत्ता ‘टिक्की’ पति के पास था। पत्नी ने मांग की कि उसे हफ्ते में 3 दिन टिक्की की कस्टडी मिले। फैमिली कोर्ट ने कहा—”कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है।”

फाइट किसके बीच?: एक शादीशुदा जोड़ा (पति बनाम पत्नी)।

विवाद की जड़: पत्नी ने फैमिली कोर्ट से मांग की थी कि उसे हफ्ते में 3 दिन टिक्की (डॉग) की कस्टडी मिले, लेकिन कोर्ट ने कहा कि कानून में ऐसी कोई धारा नहीं है।

जज का डिजिटल ट्विस्ट: जस्टिस माधव जे. जामदार ने इस मामले को सुलझाने के लिए एक मीडिएटर (मध्यस्थ) नियुक्त कर दिया। नतीजा? दोनों के बीच एक बकायदा ‘को-पेरेंटिंग एग्रीमेंट’ साइन हुआ। तय हुआ कि हर महीने के शुरुआती 14 दिन टिक्की पत्नी के पास रहेगी। एग्रीमेंट में टिक्की के खाने, ग्रूमिंग, मेडिकल खर्च और वेकेशन तक की गाइडलाइंस लिखी गईं!

अदालत का फैसला: मामला बॉम्बे हाई कोर्ट पहुंचा। जस्टिस माधव जे. जामदार ने दोनों के बीच एक मिडिएटर (मध्यस्थ) नियुक्त कर दिया। नतीजा? पति-पत्नी ने आपसी समझौते से एक शानदार कस्टडी प्लान बनाया। तय हुआ कि हर महीने के शुरुआती 14 दिन टिक्की पत्नी के पास रहेगा और बाकी दिन पति के पास। ग्रूमिंग, खाने और डॉक्टर का खर्चा भी आधा-आधा तय हुआ।

केस 4: ब्रूनो (कोलकाता हाई कोर्ट, 2022) जब डॉगी ने खुद पहचान लिया अपनी फैमिली को’

क्या था पंगा?: एक फ्रेंच मैस्टिफ डॉग ‘ब्रूनो’ अपने घर से लापता हो गया। पुलिस ने उसे ढूंढकर एक एनजीओ को सौंप दिया। जब मालकिन उसे लेने पहुंची, तो एनजीओ ने डॉग वापस करने से इनकार कर दिया।

फाइट किसके बीच?: एक महिला (असली मालकिन) बनाम एक एनजीओ।

विवाद की जड़: साल 2021 में ब्रूनो अचानक घर से लापता हो गया। पुलिस ने उसे ढूंढकर एक एनजीओ को सौंप दिया। जब महिला ब्रूनो को लेने गई, तो एनजीओ ने उसे लौटाने से इनकार कर दिया।

जज का डिजिटल ट्विस्ट: कोर्ट ने केवल कागजात नहीं देखे, बल्कि ‘ग्राउंड रियलिटी चेक’ कराया। पड़ोसियों ने गवाही दी कि ब्रूनो हमेशा उस महिला के साथ रहता था। सबसे बड़ा सबूत खुद ब्रूनो ने दिया—जब उसने कोर्ट रूम के पास महिला और उसके बेटे को देखते ही तुरंत पहचान लिया और दुम हिलाने लगा। कोर्ट ने तुरंत ब्रूनो को उसकी फैमिली के पास भेज दिया।

अदालत का फैसला (2022): कोलकाता हाई कोर्ट ने आस-पड़ोस के लोगों के बयान लिए जिन्होंने गवाही दी कि ब्रूनो हमेशा से उसी महिला के साथ रहता था। सबसे बड़ा सबूत यह था कि जब कोर्ट में ब्रूनो को लाया गया, तो उसने महिला और उसके बेटे को तुरंत पहचान लिया। कोर्ट ने आदेश दिया—’ब्रूनो को तुरंत घर वापस भेजो।’

केस 5: गोल्डन रिट्रीवर पपीज़ (दिल्ली) एनजीओ की दादागिरी पर कोर्ट का ब्रेक’

क्या था पंगा?: एक एनजीओ कार्यकर्ता ने एक पेट ओनर पर क्रूरता का आरोप लगाते हुए पुलिस की मदद से उसके दो गोल्डन रिट्रीवर पपीज़ ज़बरदस्ती छीन लिए। निचली अदालत ने भी एनजीओ का साथ दिया।

फाइट किसके बीच?: पपीज का मालिक बनाम एनजीओ कार्यकर्ता।

विवाद की जड़: दिल्ली के एक शख्स ने मुंबई से दो प्यारे गोल्डन रीट्रिवर पपीज खरीदे। कुछ दिनों बाद एक एनजीओ कार्यकर्ता पुलिस लेकर उसके घर में घुस गया और क्रूरता (Cruelty) का आरोप लगाकर पपीज को छीन ले गया।

जज का डिजिटल ट्विस्ट: अपील में जब यह मामला ऊपर गया, तो कोर्ट को पता चला कि एनजीओ की कस्टडी में एक पिल्ले की मौत हो चुकी है। कोर्ट ने नाराजगी जताते हुए पपी की वेलफेयर रिपोर्ट मंगवाई और संतुष्ट होने के बाद जीवित पपी को तुरंत उसके असली मालिक को सौंप दिया।

अदालत का फैसला: निचली अदालत ने भी पपीज मालिक को नहीं दिए। दुखद बात यह रही कि एनजीओ की कस्टडी में एक पपी की मौत हो गई। इसके बाद ऊपरी अदालत ने सख्त रुख अपनाते हुए दूसरे पपी की सुरक्षा और वेलफेयर की पूरी जांच की और उसे सही-सलामत उसके असली मालिक को सौंप दिया।

क्विक समरी: पेट कस्टडी स्कोरकार्ड

पेट का नामविवाद की वजहकोर्ट का ‘कूल’ अप्रोच
हेनरीपार्टनरशिप ब्रेकअपकोर्ट रूम में ‘विजिटेशन राइट्स’ (मिलने का अधिकार) पर कानूनी बहस जारी।
मिष्टी, कोको, कॉटनपुराना मालिक बनाम अडॉप्टिव पेरेंट्सबेज़ुबान जानवरों के इमोशनल ट्रॉमा को सर्वोपरि माना।
टिक्कीतलाकशुदा कपलप्रॉपर लीगल एग्रीमेंट बनवाकर 14-14 दिन की शेयरिंग कस्टडी तय की।
ब्रूनोएनजीओ की ज़िदडॉग के ‘बॉडी लैंग्वेज’ और पहचान के आधार पर मालकिन को वापस दिलाया।
गोल्डन पपीज़एनजीओ का ओवर-एक्शनएनजीओ की लापरवाही पकड़कर पपी को ओनर के घर सुरक्षित भिजवाया।
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