सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी प्रमुख निर्देश और शर्तें
- वित्तीय पारदर्शिता और सरप्लस फंड का हिसाब:
- सभी निजी विश्वविद्यालयों को अपनी आय, व्यय, एकत्रित फीस और सरप्लस फंड (Surplus Funds) के निवेश या उपयोग का पूरा ब्योरा देना होगा।
- सरकार या केंद्र से मिली जमीन की छूट, टैक्स राहत या अन्य लाभों की विस्तृत जानकारी देनी होगी।
- विश्वविद्यालय के कामकाज से सीधे तौर पर न जुड़े लोगों या ट्रस्टियों को किए गए भुगतानों की जांच होगी।
- शिक्षकों के वेतन और सेवा शर्तें:
- शिक्षण एवं गैर-शिक्षण कर्मचारियों (Faculty & Staff) की भर्ती करने वाले बोर्ड, उनके वेतन, भत्तों और सेवा शर्तों की पूरी जानकारी प्रस्तुत करनी होगी।
- पिछले एक साल में शिक्षकों को आवंटित कुल टीचिंग आवर्स (Teaching Hours) और वास्तव में ली गई कक्षाओं का ब्योरा देना होगा।
- नियामक निकायों (Regulatory Bodies) को निर्देश:
- UGC, नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC), बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI), फार्मेसी काउंसिल, डेंटल कमीशन आदि को निर्देश दिया गया है कि वे अपने निरीक्षण रिपोर्ट, फैकल्टी डेटाबेस और पाई गई कमियों/सुधारों की रिपोर्ट प्रस्तुत करें।
- पीड़ित छात्रा को सुरक्षा और सोशल मीडिया कंटेंट हटाने के निर्देश:
- याचिकाकर्ता छात्रा की ओर से वकील चारू माथुर ने बताया कि उसे ऑनलाइन सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए प्रताड़ित किया जा रहा है। कोर्ट ने केंद्र सरकार को तुरंत ऐसे आपत्तिजनक और अपमानजनक लिंक्स हटाने (Takedown) का आदेश दिया।
- पूर्व आईपीएस अधिकारी अशोक प्रसाद की अध्यक्षता वाली जांच समिति को मामले की अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत करने और एमिटी यूनिवर्सिटी को जांच में पूरा सहयोग करने का निर्देश दिया गया।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने देश भर में संचालित निजी विश्वविद्यालयों (Private Universities) के अनियंत्रित व्यावसायीकरण, अंधाधुंध मुनाफाखोरी (Profiteering), छात्रों से वसूले जाने वाले अनुचित शुल्कों और विनियामक oversight के अभाव पर एक युगांतरकारी व बेहद कड़ा फैसला सुनाया है।
न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया की पीठ ने एमिटी यूनिवर्सिटी (Amity University) से जुड़े एक छात्र प्रताड़ना विवाद की सुनवाई के दौरान यह व्यापक विनियामक आदेश पारित किए। शीर्ष अदालत ने दो टूक व्यवस्था दी है कि शिक्षा का संपूर्ण तंत्र जनता और राष्ट्र के व्यापक हित के लिए कार्य करता है, इसलिए किसी भी निजी विश्वविद्यालय को केवल मुनाफा कमाने वाली ‘इंडस्ट्री’ (Profit-making institution) की तरह काम करने की अनुमति कतई नहीं दी जा सकती। अदालत ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों (UTs) को निर्देश दिया है कि वे छह सप्ताह के भीतर निजी विश्वविद्यालयों के ऑडिटेड वित्तीय खातों, सरप्लस फंड के उपयोग, शुल्क संग्रह, शिक्षक भर्तियों और शैक्षणिक गुणवत्ता का संपूर्ण ब्योरा अदालत के समक्ष पेश करें।
शीर्ष अदालत के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं टिप्पणियां
1. ‘मुनाफाखोरी के लिए विश्वविद्यालय नहीं चलाए जा सकते’ न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया की पीठ ने व्यवस्था दी: “यह पूरी प्रणाली व्यापक रूप से जनता के लिए काम करती है, विशेष रूप से जब बात शिक्षा से जुड़े मामलों की हो। हम यह बिल्कुल स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि किसी भी निजी विश्वविद्यालय को मुनाफा कमाने वाली संस्था (Profit-making institution) के रूप में संचालित नहीं किया जाएगा। इसे शिक्षा के व्यापक सार्वजनिक उद्देश्य (Larger public purpose of education) की पूर्ति करनी होगी। इन शिक्षण संस्थानों को केवल मुनाफाखोरी के लिए एक उद्योग (Industry for profiteering) की तरह काम करने की छूट नहीं दी जा सकती।”
2. सरप्लस फंड और तीसरे पक्षों को भुगतान की गहन जांच
- अदालत ने निर्देश दिया कि राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को यह सुनिश्चित करना होगा कि सभी निजी विश्वविद्यालय अपने फंड के सृजन और उपयोग की ऑडिट रिपोर्ट पेश करें।
- विश्वविद्यालयों को विशेष रूप से यह खुलासा करना होगा कि उनके अधिशेष धन (Surplus Funds) का किस प्रकार प्रबंधन या निवेश किया गया है और क्या ऐसे व्यक्तियों या संस्थाओं को कोई भुगतान किया गया है जो विश्वविद्यालय के दैनिक कामकाज से सीधे जुड़े नहीं हैं।
- सरकारों द्वारा रियायती दरों पर आवंटित भूमि, कर रियायतों और अन्य विधिक विशेषाधिकारों का भी पूरा लेखा-जोखा मांगा गया है।
3. शैक्षणिक निरीक्षण, प्रश्नपत्र निर्माण और उत्तर पुस्तिकाओं का मूल्यांकन
- अदालत ने विश्वविद्यालयों में दाखिला प्रक्रियाओं, प्रश्नपत्र तैयार करने, उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन और इनमें मैनेजमेंट के हस्तक्षेप के बारे में विस्तृत जानकारी मांगी है।
- शिक्षकों के पिछले एक साल के कार्य-घंटों (Teaching Hours) और उनके द्वारा ली गई वास्तविक कक्षाओं का विवरण तलब किया गया है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि शिक्षकों की अनुपस्थिति में छात्रों की पढ़ाई का नुकसान न हुआ हो।
विभिन्न विनियामक निकायों (Regulators) को कड़े निर्देश
सर्वोच्च न्यायालय ने देश के सभी प्रमुख पेशेवर विनियामक निकायों को अपने-अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाले निजी कॉलेजों/विश्वविद्यालयों के निरीक्षण रिकॉर्ड पेश करने का आदेश दिया है:
- शामिल निकाय: राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC), राष्ट्रीय दंत चिकित्सा आयोग (NDC), भारतीय नर्सिंग परिषद (INC), बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI), फार्मेसी काउंसिल ऑफ इंडिया (PCI), भारतीय पशु चिकित्सा परिषद (VCI), राष्ट्रीय भारतीय चिकित्सा पद्धति आयोग (NCISM) और एलाइड हेल्थकेयर काउंसिल।
- अनिवार्य जानकारी: इन निकायों को संबद्धता (Affiliation) से जुड़े निरीक्षणों की रिपोर्ट, चिन्हित की गई कमियां, क्या उन कमियों को समय पर सुधारा गया या नहीं, तथा शिक्षकों और गैर-शैक्षणिक कर्मचारियों का पूरा डेटाबेस प्रस्तुत करना होगा।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि (एमिटी यूनिवर्सिटी छात्र विवाद)
- विवाद की शुरुआत: यह मामला एमिटी यूनिवर्सिटी में कॉलेज रिकॉर्ड में नाम बदलने (Change of Name) की मांग करने पर एक छात्र को प्रशासनिक स्तर पर मानसिक रूप से प्रताड़ित किए जाने से उत्पन्न हुआ था।
- नवंबर 2025 का पूर्व आदेश: अदालत ने नवंबर 2025 में ही सभी राज्यों को नोटिस जारी कर पूछा था कि निजी विश्वविद्यालयों की स्थापना किन शर्तों पर हुई, उन्हें क्या सरकारी सुविधाएं मिलीं और वे ‘नो प्रॉफिट नो लॉस’ (No Profit No Loss) के अधिदेश का पालन कैसे कर रहे हैं।
- एमिकस क्यूरी और जांच समिति:
- पूर्व भारतीय विधिक सेवा अधिकारी आर.एम. शर्मा ने कोर्ट में एमिकस क्यूरी (Amicus Curiae) के रूप में राज्यों से प्राप्त आंकड़ों का संकलन प्रस्तुत किया और गंभीर खामियों को रेखांकित किया।
- पूर्व आईपीएस अधिकारी और जम्मू-कश्मीर के पूर्व डीजीपी अशोक प्रसाद की अध्यक्षता वाली जांच समिति ने अदालत को बताया कि विश्वविद्यालय से जुड़े कई गवाह समन के बावजूद बयान दर्ज कराने नहीं आ रहे हैं। इस पर कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए विश्वविद्यालय प्रबंधन को जांच में पूर्ण सहयोग करने का ‘ब्लैंकेट ऑर्डर’ जारी किया।
- सोशल मीडिया ट्रोलिंग पर केंद्र को निर्देश: याचिकाकर्ता छात्र की ओर से पेश अधिवक्ता चारू माथुर ने अदालत को बताया कि छात्र के खिलाफ सोशल मीडिया पर अपमानजनक और मानहानिकारक पोस्ट डालकर ऑनलाइन प्रताड़ित किया जा रहा है। पीठ ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि विचाराधीन मामले को देखते हुए सोशल मीडिया से ऐसे सभी आपत्तिजनक लिंक तुरंत हटाए जाएं (Takedown)।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: याचिकाकर्ता छात्र बनाम एमिटी यूनिवर्सिटी एवं अन्य [विशेष अनुमति याचिका / विविध आवेदन – सर्वोच्च न्यायालय]
- प्रासंगिक कानून: भारत का संविधान – अनुच्छेद 21 (शिक्षा और गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार), अनुच्छेद 142 (पूर्ण न्याय करने की अंतर्निहित शक्ति) एवं अनुच्छेद 19(1)(g) पर युक्तियुक्त निर्बंधन; विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) अधिनियम, 1956; राज्य निजी विश्वविद्यालय अधिनियम
- संबद्ध ऐतिहासिक संविधान पीठ नजीरें:
- टी.एम.ए. पाई फाउंडेशन बनाम कर्नाटक राज्य (2002, 11-जजों की संविधान पीठ) — ‘शिक्षा का पेशा एक नोबल पेशा (Noble Profession) है; कैपिटेशन फीस और मुनाफाखोरी की अनुमति किसी भी संस्थान को नहीं दी जा सकती।’
- इस्लामिक एकेडमी ऑफ एजुकेशन बनाम कर्नाटक राज्य (2003, सुप्रीम कोर्ट) — ‘शैक्षणिक संस्थानों को अपनी वृद्धि के लिए उचित अधिशेष (Reasonable Surplus) रखने की अनुमति है, लेकिन व्यावसायीकरण और मुनाफाखोरी पूर्णतः निषिद्ध है।’
- पी.ए. इनामदार बनाम महाराष्ट्र राज्य (2005, 7-जजों की संविधान पीठ) — ‘शिक्षा में व्यावसायिक दोहन को रोकने के लिए सरकार व अदालतों के पास नियमन का पूर्ण अधिकार है।’
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ता छात्र की ओर से: अधिवक्ता चारू माथुर
- एमिकस क्यूरी: आर.एम. शर्मा (पूर्व ILS अधिकारी)
- पीठ: न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया (सर्वोच्च न्यायालय)
- अगली सुनवाई: 19 नवंबर 2026
Education Not An Industry: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठासीन पीठ | जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस एन.वी. अंजारिया |
| मूल मामला | एमिटी यूनिवर्सिटी (Amity University) की एक छात्रा से जुड़ा उत्पीड़न और नाम संशोधन का मामला |
| मुख्य निर्देश | राज्यों/UTs को 6 सप्ताह में ऑडिटेड अकाउंट्स, सरप्लस फंड के इस्तेमाल और स्टाफ डेटा सौंपने के निर्देश |
| अगली सुनवाई | 19 नवंबर |

