Thursday, August 20, 2026
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Power Project: अडाणी ग्रुप को पीरपैंती थर्मल पावर प्रोजेक्ट के आवंटन का कानूनी रास्ता साफ…PIL पर टिप्पणी- यह अस्पष्ट और काल्पनिक आरोप

Power Project: पटना हाईकोर्ट ने बिहार के भागलपुर में बनने वाले एक विशाल बिजली प्रोजेक्ट के आवंटन को दी गई चुनौती को खारिज करते हुए महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।

पीरपैंती थर्मल पावर प्रोजेक्ट सौंपे जाने के खिलाफ जनहित याचिका दायर

हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस मीनाक्षी मदन राय और जस्टिस सोनी श्रीवास्तव की खंडपीठ ने अडाणी ग्रुप (Adani Group) को 28,000 करोड़ रुपये का पीरपैंती थर्मल पावर प्रोजेक्ट सौंपे जाने के खिलाफ दायर एक जनहित याचिका (PIL) को ‘अस्पष्ट और काल्पनिक’ (Vague and Nebulous) बताते हुए पूरी तरह खारिज कर दिया। कहा, अदालतें बिना किसी ठोस और स्पष्ट आधार के सरकार के नीतिगत फैसलों (Policy Decisions) में हस्तक्षेप नहीं कर सकतीं। केवल कुछ अन्य राज्यों की तुलना करके यह मान लेना कि भविष्य में बिजली की दरें अधिक होंगी, अदालत के विधिक दखल का आधार नहीं बन सकता। जब निविदा (Bidding) प्रक्रिया में हारने वाली किसी भी अन्य कंपनी ने कोई शिकायत नहीं की, तो एक वकील द्वारा दायर यह याचिका जनहित से प्रेरित न होकर निजी हितों (Private Interest) से प्रभावित प्रतीत होती है।

मामला क्या है?: भागलपुर में 28,000 करोड़ का मेगा पावर प्रोजेक्ट

यह कानूनी विवाद बिहार के ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े एक बेहद महत्वाकांक्षी और बड़े निवेश प्रोजेक्ट से संबंधित है।

कैबिनेट की मंजूरी और बीडिंग: बिहार राज्य कैबिनेट ने मार्च 2025 में भागलपुर जिले के पीरपैंती में 2400 मेगावाट (3×800 MW) क्षमता वाले ‘अल्ट्रा-सुपरक्रिटिकल’ कोयला आधारित थर्मल पावर प्रोजेक्ट की स्थापना को मंजूरी दी थी। इस प्रोजेक्ट के लिए टैरिफ-आधारित प्रतिस्पर्धी बोली (Tariff-Based Competitive Bidding) आयोजित की गई थी, जिसमें अडाणी ग्रुप (प्रतिवादी संख्या 6) ने सबसे कम बोली (Lowest Bidder) लगाकर ठेका हासिल किया।

बड़ा निवेश और समयसीमा: इस मेगा प्रोजेक्ट के तहत सफल बोलीदाता को 28,000 करोड़ रुपये से अधिक का निवेश करना है। अनुबंध के मुताबिक, प्रोजेक्ट की पहली इकाई को 48 महीनों के भीतर और पूरे प्रोजेक्ट को 60 महीनों (5 साल) के भीतर चालू किया जाना तय हुआ है।

याचिकाकर्ता की दलील: पेशे से वकील एक याचिकाकर्ता ने कोर्ट में जनहित याचिका दायर कर आरोप लगाया कि महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में चल रहे इसी तरह के प्रोजेक्ट्स की तुलना में बिहार में स्वीकृत की गई बिजली दरें (Tariff) काफी अधिक हैं। उन्होंने इस आवंटन को मनमाना, भेदभावपूर्ण और वैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन बताया।

हाई कोर्ट का रुख: यह वास्तविक जनहित याचिका नहीं, बल्कि समय से पहले की गई आशंका है

राज्य सरकार के महाधिवक्ता (Advocate General) ने याचिका का कड़ा विरोध करते हुए दलील दी कि यह चुनौती पूरी तरह से समय से पहले (Premature) है, क्योंकि यह इस काल्पनिक धारणा पर आधारित है कि वर्ष 2030 में भुगतान किए जाने वाले टैरिफ अत्यधिक होंगे। कोर्ट ने सरकार की दलीलों को स्वीकार करते हुए निम्नलिखित मुख्य विधिक निष्कर्ष निकाले:

याचिकाकर्ता की विश्वसनीयता और जनहित का अभाव

हाई कोर्ट ने जनहित याचिका की स्वीकार्यता (Maintainability) की जांच करते हुए नोट किया कि यद्यपि याचिकाकर्ता ने किसी व्यक्तिगत हित से इनकार किया है, लेकिन याचिका में ऐसा कोई विवरण नहीं है जो यह साबित करे कि वह पहले भी जनहित के कार्यों में सक्रिय रहे हैं। कोर्ट ने साफ किया कि किसी भी पीआईएल को स्वीकार करने से पहले अदालत को शिकायतकर्ता के चरित्र, उसकी निष्ठा और आरोपों की गंभीरता से पूरी तरह संतुष्ट होना चाहिए।

व्यावसायिक प्रतिद्वंद्विता या निजी हित का संदेह

खंडपीठ ने अपने आदेश में तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा, याचिका में लगाए गए आरोप पूरी तरह से अस्पष्ट और काल्पनिक हैं। यह याचिका जनहित के बजाय किसी के निजी हित या व्यावसायिक प्रतिद्वंद्विता से प्रेरित लगती है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि इस बीडिंग प्रक्रिया में जो कंपनियां अडाणी ग्रुप से हार गईं, उनमें से किसी ने भी किसी अथॉरिटी या इस अदालत का रुख नहीं किया और न ही टेंडर प्रक्रिया में किसी गड़बड़ी की शिकायत की।

नीतिगत फैसलों में न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) की सीमा

अदालत ने राज्य सरकार के इस तर्क को सही माना कि पावर प्रोजेक्ट की स्थापना और उसकी निविदा शर्तें पूरी तरह से सरकार के नीतिगत और आर्थिक फैसलों के दायरे में आती हैं। जब तक किसी नीति में स्पष्ट रूप से किसी कानून का उल्लंघन या भारी दुर्भावना न दिखे, तब तक अदालतें तकनीकी और वित्तीय मामलों में हस्तक्षेप नहीं कर सकतीं। इसके अलावा, टैरिफ से जुड़ी किसी भी वास्तविक शिकायत के निवारण के लिए सही विधिक मंच बिहार विद्युत विनियामक आयोग (BERC) है, न कि सीधे हाई कोर्ट।

अदालत का अंतिम आदेश

पटना उच्च न्यायालय ने यह निष्कर्ष निकाला कि यह याचिका जनहित याचिका के स्थापित विधिक पैमानों और कानूनी मापदंडों पर खरी नहीं उतरती है। तदनुसार, खंडपीठ ने अडाणी ग्रुप को मिले इस प्रोजेक्ट के खिलाफ दायर पीआईएल को पूरी तरह से खारिज (Dismiss) कर दिया, जिससे बिहार के इस बड़े बुनियादी ढांचा प्रोजेक्ट (Infrastructure Project) के आगे बढ़ने का रास्ता पूरी तरह साफ हो गया है।

केस मैट्रिक्स: पटना हाई कोर्ट का आदेश (जुलाई 2026)

विधिक और प्रशासनिक श्रेणियांपटना उच्च न्यायालय की विधिक स्थिति
संबंधित अदालतपटना उच्च न्यायालय (Patna High Court), बिहार
माननीय न्यायाधीशमुख्य न्यायाधीश मीनाक्षी मदन राय और जस्टिस सोनी श्रीवास्तव (खंडपीठ)
प्रोजेक्ट का नामपीरपैंती थर्मल पावर प्रोजेक्ट (2400 MW), जिला- भागलपुर
आवंटित व्यावसायिक समूहअडाणी ग्रुप (Adani Group – Respondent No. 6)
अनुमानित लागत व निवेश₹28,000 करोड़ से अधिक
बिहार सरकार के विधिक प्रतिनिधिमहाधिवक्ता (Advocate General, Bihar)
अदालत का अंतिम निर्णययाचिका खारिज; आरोपों को अस्पष्ट और नीतिगत मामलों में हस्तक्षेप न करने योग्य माना।
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