Thursday, October 1, 2026
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Preventive detention: पैसे उधार देने वाले को फिर से हिरासत में लेने का आदेश रद्द…हिरासत पर गंभीर टिप्पणी, पढ़ें

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि एहतियाती हिरासत (Preventive Detention) राज्य के पास एक असाधारण शक्ति है, जिसका इस्तेमाल बहुत ही सीमित और सावधानी से किया जाना चाहिए।

जमानत रद्द करवाने की प्रक्रिया अपनानी चाहिए थी

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस मनमोहन की बेंच ने कहा कि हिरासत का आदेश इसलिए दिया गया क्योंकि आरोपी ने जमानत की शर्तों का उल्लंघन किया था। जबकि ऐसा होने पर राज्य सरकार को संबंधित अदालत में जाकर उसकी जमानत रद्द करवाने की प्रक्रिया अपनानी चाहिए थी। शीर्ष कोर्ट ने केरल के पलक्कड़ जिले के जिलाधिकारी द्वारा एक प्राइवेट मनी लेंडर को हिरासत में लेने का आदेश रद्द कर दिया। यह व्यक्ति चार मामलों में जमानत मिलने के बाद कथित रूप से फिर से गैरकानूनी गतिविधियों में शामिल था।

4 सितंबर 2024 को केरल हाईकोर्ट ने किया फैसला

कोर्ट ने कहा, 20 जून 2024 को जारी हिरासत आदेश और 4 सितंबर 2024 को केरल हाईकोर्ट द्वारा दिया गया फैसला रद्द किया जाता है। इस मामले की परिस्थितियों को देखते हुए अपील स्वीकार की जाती है। कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 22(3)(b) के तहत एहतियाती हिरासत की व्यवस्था है, लेकिन यह एक असाधारण शक्ति है, जो किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता को भविष्य में अपराध की आशंका के आधार पर सीमित करती है। इसलिए इसका सामान्य परिस्थितियों में इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।

राजेश नाम के व्यक्ति ने लगाया था आरोप

राजेश नाम के व्यक्ति पर आरोप था कि वह ऋतिका फाइनेंस नाम की एक निजी फाइनेंस कंपनी चलाता था और जमानत की शर्तों का उल्लंघन कर रहा था। लेकिन कोर्ट ने कहा कि चारों मामलों में राज्य सरकार ने न तो किसी अदालत में जमानत रद्द करने की अर्जी दी और न ही सुनवाई के दौरान यह स्पष्ट किया कि किन शर्तों का उल्लंघन हुआ।

कानून की धारा 2(j) के तहत “गुंडा” की व्याख्या की

कोर्ट ने कहा कि अगर राज्य सरकार को लगता है कि आरोपी ने जमानत की शर्तों का उल्लंघन किया है, तो उसे अदालत में जाकर जमानत रद्द करवानी चाहिए थी, न कि सीधे एहतियाती हिरासत का सहारा लेना चाहिए था। राज्य सरकार ने आरोपी को केरल के असामाजिक गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम, 2007 के तहत “गुंडा” घोषित कर हिरासत में लिया था। इस कानून की धारा 2(j) के तहत “गुंडा” ऐसे व्यक्ति को कहा गया है जो सीधे या परोक्ष रूप से सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा बनता है। इसमें शराब तस्कर, नकली सामान बनाने वाले, ड्रग्स से जुड़े अपराधी और मनी लेंडर शामिल हैं।

राजेश की पत्नी ने की थी चुनौती

पुलिस ने आरोपी को “कुख्यात गुंडा” बताया था और कहा था कि वह समाज के लिए खतरा है। लेकिन कोर्ट ने कहा कि इस मामले में कानून की धारा 3 के तहत हिरासत का आदेश देना उचित नहीं था। राजेश की पत्नी ने 20 जून 2024 को जारी हिरासत आदेश को केरल हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, लेकिन हाईकोर्ट ने 4 सितंबर को आदेश को सही ठहराया। इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। सुप्रीम कोर्ट ने 10 दिसंबर 2024 को आदेश दिया कि आरोपी को रिहा किया जाए क्योंकि हिरासत की अधिकतम अवधि पूरी हो चुकी है।

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