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Prison Reforms: क्या है ‘ओपन जेल’ (Open Prison) की अवधारणा…ताजा हाईकोर्ट के आदेश को विस्तार से यहां पढ़ें

Prison Reforms: दिल्ली हाई कोर्ट ने जेल सुधारों की दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए दिल्ली सरकार को ‘ओपन जेल’ (Open Prisons) विकसित करने के लिए कहा है।

हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डी.के. उपाध्याय और जस्टिस तेजस कारिया की बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के 26 फरवरी के आदेश का स्वतः संज्ञान (Suo Motu PIL) लेते हुए यह निर्देश जारी किया। कोर्ट ने वरिष्ठ वकील अरविंद निगम को इस मामले में ‘एमीकस क्यूरी’ (Amicus Curiae – अदालत का मित्र) नियुक्त किया है। कोर्ट ने इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को लागू करने का आदेश दिया है। अदालत ने अधिकारियों से उन कैदियों की पहचान करने को कहा है जिन्हें इन ‘खुली जेलों’ में स्थानांतरित किया जा सकता है।

क्या है ‘ओपन जेल’ (Open Prison) की अवधारणा?

  • खुली जेलें या ‘ओपन करेक्शनल इंस्टीट्यूशंस’ (OCIs) पारंपरिक बंद जेलों से अलग होती हैं।
  • आजादी और जिम्मेदारी: यहाँ कैदियों को दिन के समय परिसर से बाहर जाकर काम करने और अपनी आजीविका कमाने की अनुमति होती है। शाम को उन्हें वापस जेल परिसर में आना होता है।
  • उद्देश्य: इसका मुख्य लक्ष्य कैदियों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ना, उनके मनोवैज्ञानिक दबाव को कम करना और उन्हें एक सामान्य नागरिक के रूप में पुनर्वासित करना है।
  • संवैधानिक आवश्यकता: सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, जेलों में आत्म-सम्मान और सामाजिक एकीकरण केवल आदर्श नहीं, बल्कि संवैधानिक आवश्यकताएं हैं।

हाई कोर्ट के मुख्य निर्देश (The Court’s Directives)

  • अदालत ने दिल्ली सरकार और संबंधित अधिकारियों को निम्नलिखित कदम उठाने का आदेश दिया है।
  • निगरानी समिति का गठन: गृह सचिव को एक समिति बनाने का निर्देश दिया गया है, जिसकी अध्यक्षता ‘राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरण’ (SLSA) के कार्यकारी अध्यक्ष करेंगे।
  • रणनीति और पहचान: यह समिति बैठक कर एक समयबद्ध प्रोटोकॉल तैयार करेगी और उन कैदियों की पहचान करेगी जो ‘ओपन जेल’ में जाने के पात्र हैं।
  • दो महीने की डेडलाइन: कोर्ट ने सरकार को इस संबंध में उठाए गए कदमों पर हलफनामा दाखिल करने के लिए दो महीने का समय दिया है।
  • विस्तार: मौजूदा जेलों के भीतर ‘सेमी-ओपन’ या ‘ओपन बैरक’ बनाने की संभावनाओं पर भी विचार किया जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट के 26 फरवरी के आदेश की पृष्ठभूमि

सुप्रीम कोर्ट ने देशभर में जेलों की भीड़ कम करने और सुधारवादी न्याय (Reformative Justice) को बढ़ावा देने के लिए सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को यह निर्देश दिया था। शीर्ष अदालत ने सभी हाई कोर्ट्स को निर्देश दिया था कि वे अपने क्षेत्राधिकार में इस आदेश के पालन की निगरानी के लिए एक स्वतः संज्ञान याचिका (Suo Motu Writ Petition) दर्ज करें।

सुधार प्रक्रिया के मुख्य बिंदु (Key Highlights)

बिंदुविवरण
समिति के अध्यक्षदिल्ली स्टेट लीगल सर्विसेज अथॉरिटी (DSLSA) के कार्यकारी अध्यक्ष।
समिति का कार्यखुली जेलों के कामकाज, विस्तार और पात्र कैदियों के चयन की निगरानी।
अगली सुनवाईजुलाई 2026 (स्टेटस रिपोर्ट के साथ)।
हितधारककेंद्र, दिल्ली सरकार, जेल अधिकारी और हाई कोर्ट प्रशासन।

जेलों को सुधार गृह बनाने की ओर

दिल्ली हाई कोर्ट का यह रुख जेलों को केवल ‘दंड देने वाली कोठरियों’ से बदलकर ‘सुधार केंद्रों’ में तब्दील करने की वैश्विक सोच के अनुरूप है। खुली जेलें न केवल कैदियों को मानसिक अवसाद से बचाती हैं, बल्कि उन्हें यह अहसास भी कराती हैं कि सजा काटने के बाद समाज में उनके लिए एक सम्मानजनक जगह मौजूद है।

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