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मामले की पृष्ठभूमि और कानूनी तर्क
- 2009 का RTI आवेदन और PIO का जवाब:पूर्व न्यायिक अधिकारी पी.डी. गुप्ता ने 2009 में RTI दाखिल कर दिल्ली हाईकोर्ट के तत्कालीन न्यायाधीश जस्टिस ए.के. सीकरी द्वारा दो महीने से अधिक समय तक सुरक्षित रखे गए फैसलों का ब्योरा मांगा था। PIO ने यह कहते हुए आवेदन खारिज कर दिया था कि हाईकोर्ट न्यायाधीश-वार (Judge-wise) ऐसा कोई डेटा या संकलन बनाकर नहीं रखता है।
- CIC का निर्देश और धारणा:सीआईसी (CIC) ने मई 2011 में PIO के जवाब को खारिज करते हुए निर्देश दिया था कि कोर्ट मास्टर्स द्वारा मुख्य न्यायाधीश को भेजी जाने वाली मासिक रिपोर्ट को निकाल कर पिछले दो वर्षों की जानकारी याचिकाकर्ता को दी जाए। CIC ने माना था कि यह जानकारी मुख्य न्यायाधीश को भेजी जाने वाली व्यवस्था के कारण “उपलब्ध होनी चाहिए”।
- हाईकोर्ट का निष्कर्ष (मासिक सीलबंद रिपोर्ट का तंत्र):न्यायमूर्ति अमित महाजन ने पाया कि सुरक्षित फैसलों से जुड़ी मासिक सूचियां मुख्य न्यायाधीश को केवल प्रशासनिक निगरानी के लिए सीलबंद लिफाफे में भेजी जाती हैं। इन सूचियों को साल-दर-साल न्यायाधीश-वार संकलित या संरक्षित (Preserve) करके रखने का कोई वैधानिक नियम नहीं है।
मुख्य विधिक निष्कर्ष (Key Legal Principles)
1. RTI के तहत जानकारी बनाना अनिवार्य नहीं:
हाईकोर्ट ने दोहराया कि RTI अधिनियम केवल वही जानकारी प्रदान करने के लिए बाध्य करता है जो किसी सार्वजनिक प्राधिकरण द्वारा अपने सामान्य कामकाज के तहत धारण (Hold) की जाती है। किसी विशेष जज के सभी केस रिकॉर्ड खंगालकर एक नया संकलन (Fresh Compilation) तैयार करना कानून के दायरे से बाहर है।
2. अनुमान पर आधारित आदेश अवैध:
अदालत ने कहा कि CIC का यह मानना कि सूचियां मुख्य न्यायाधीश को दी जाती हैं इसलिए वे “उपलब्ध होनी ही चाहिए”, महज एक धारणा है। ऐसी धारणा के आधार पर RTI के तहत कानूनी निर्देश जारी नहीं किए जा सकते।
नई दिल्ली: सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (RTI Act, 2005) की धारा 2(f) (‘सूचना’ की वैधानिक परिभाषा) एवं धारा 2(j) (‘सूचना का अधिकार’—केवल धारित या नियंत्रणाधीन सूचना तक सीमित), सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय सीबीएसई बनाम आदित्य बंदोपाध्याय [(2011) 8 SCC 497] (लोक प्राधिकारी द्वारा नई सूचना सृजित या संकलित करने की बाध्यता पर रोक), तथा मुख्य न्यायाधीश को प्रशासनिक नियंत्रण हेतु भेजी जाने वाली गोपनीय आरक्षित निर्णयों की मासिक सूचियों के विधिक संरक्षण पर दिल्ली उच्च न्यायालय ने 15 वर्ष पुरानी रिट याचिका को स्वीकार करते हुए एक अत्यंत महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।
दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति अमित महाजन (Justice Amit Mahajan) की एकल पीठ ने केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) के 26 मई 2011 के उस आदेश को पूरी तरह निरस्त (Set Aside / Quashed) कर दिया, जिसमें दिल्ली उच्च न्यायालय के जन सूचना अधिकारी (PIO) को निर्देश दिया गया था कि वह फाइलों को ढूंढकर यह जानकारी प्रदान करे कि किसी विशिष्ट न्यायाधीश द्वारा बहस पूरी होने के दो माह बाद कौन-से निर्णय सुनाए गए।
उच्च न्यायालय ने स्पष्ट विधिक व्यवस्था दी कि यद्यपि समय पर निर्णय सुनाया जाना सार्वजनिक चिंता का विषय है, किंतु जनहित का प्रश्न केवल तभी उठता है जब मांगी गई जानकारी पहले से भौतिक रूप में मौजूद हो। आरटीआई कानून के तहत किसी भी लोक प्राधिकारी को ऐसी जानकारी तैयार करने, संकलित करने या नया डेटाबेस सृजित करने के लिए विवश नहीं किया जा सकता जिसे वह अपने सामान्य प्रशासनिक कार्य के तहत संधारित (Maintained) नहीं करता।
उच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं विधिक टिप्पणियां
1. ‘गैर-मौजूद सूचना सृजित करने या संकलित करने के लिए बाध्य नहीं कर सकते’:
न्यायमूर्ति अमित महाजन ने आरटीआई अधिनियम की सीमाओं का विश्लेषण करते हुए अपने निर्णय में स्पष्ट रूप से दर्ज किया: “यद्यपि समयबद्ध रूप से निर्णय सुनाया जाना सार्वजनिक चिंता का एक महत्वपूर्ण विषय है, किंतु जनहित (Public Interest) पर विचार करने का प्रश्न केवल तभी उत्पन्न होता है जब वह सूचना वास्तव में अस्तित्व में हो। जनहित का उपयोग किसी लोक प्राधिकारी (Public Authority) को ऐसी जानकारी सृजित (Create Information) करने के लिए बाध्य करने हेतु नहीं किया जा सकता, जो उसके द्वारा धारित या संधारित नहीं की जाती है। वर्तमान मामले में, उच्च न्यायालय द्वारा ऐसा कोई विशिष्ट डेटाबेस या संकलन नहीं रखा जाता है। मांगी गई जानकारी उपलब्ध कराने के लिए लोक प्राधिकारी को किसी विशिष्ट न्यायाधीश द्वारा सुने गए सभी मुकदमों के रिकॉर्ड्स की व्यक्तिगत जांच करनी होगी और एक नया संकलन (Fresh Compilation) तैयार करना होगा, जिसकी आरटीआई अधिनियम के तहत कोई विधिक बाध्यता नहीं है।”
2. ‘सीआईसी ने कोरी धारणा पर निर्देश जारी किया; व्यवस्था होना संरक्षण की गारंटी नहीं’:
- अदालत ने केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) के दृष्टिकोण में गंभीर विधिक खामी पाई:“सीआईसी ने आक्षेपित आदेश में केवल इस पूर्व-धारणा (Premise) के आधार पर आदेश पारित किया कि माननीय मुख्य न्यायाधीश को ऐसी सूचियां प्रस्तुत करने की परिपाटी के कारण यह जानकारी ‘उपलब्ध होनी ही चाहिए’ (Information should be available)।आरटीआई अधिनियम के तहत कोई भी निर्देश ऐसी मात्र धारणा या अनुमान के आधार पर जारी नहीं किया जा सकता। मुख्य न्यायाधीश को प्रशासनिक उद्देश्य से मासिक सूची भेजने की प्रथा का अपने आप में यह अर्थ नहीं है कि उन गोपनीय सूचियों को साल-दर-साल स्थायी रूप से सहेजकर संरक्षित (Preserved) रखा जाता है।”
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (2009–2026)
| संदर्भ / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे |
| फोरम / न्यायालय | दिल्ली उच्च न्यायालय, नई दिल्ली (संवैधानिक रिट क्षेत्राधिकार) |
| पीठासीन न्यायाधीश | न्यायमूर्ति अमित महाजन (एकल पीठ) |
| याचिकाकर्ता पक्ष | जन सूचना अधिकारी (PIO), दिल्ली उच्च न्यायालय। |
| प्रतिवादी पक्ष | पी.डी. गुप्ता (PD Gupta) — पूर्व न्यायिक अधिकारी (RTI आवेदक)। |
| याचिकाकर्ता के अधिवक्ता | अधिवक्ता प्रियम मेहता (Advocate Priyam Mehta)। |
| विवाद का मूल उद्भव (RTI वर्ष 2009) | पूर्व न्यायिक अधिकारी पी.डी. गुप्ता ने वर्ष 2009 में एक आरटीआई आवेदन दाखिल कर तत्कालीन दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जस्टिस ए.के. सीकरी (Justice AK Sikri) (एकल पीठ या खंडपीठ के हिस्से के रूप में) द्वारा सुने गए उन सभी मामलों का विवरण मांगा, जिनमें अंतिम बहस पूरी होने के दो महीने से अधिक समय बाद निर्णय सुनाया गया था (आरटीआई दाखिल करने से पूर्व के दो वर्षों का विवरण)। |
| PIO का प्रारंभिक रुख | हाईकोर्ट के पीआईओ ने आवेदन का उत्तर देते हुए कहा कि अदालत के प्रशासनिक या न्यायिक तंत्र में ऐसा कोई न्यायाधीश-वार डेटा संधारित या संकलित नहीं किया जाता है। |
| सीआईसी का आक्षेपित आदेश (26 मई 2011) | केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) ने पीआईओ को निर्देश दिया कि वह कोर्ट मास्टर्स द्वारा आरक्षित निर्णयों के संबंध में तैयार की जाने वाली मासिक रिपोर्टों को ढूंढे और पिछले दो वर्षों की अवधि का डेटा आवेदक को उपलब्ध कराए। |
| मासिक सूचियों का विधिक स्वरूप | उच्च न्यायालय ने पाया कि कोर्ट मास्टर्स द्वारा आरक्षित निर्णयों की मासिक सूचियां सीलबंद लिफाफे में सीधे मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice) को प्रशासनिक कार्रवाई और निगरानी हेतु भेजी जाती हैं। इन प्रशासनिक सूचियों को साल-दर-साल स्थायी रूप से संरक्षित रखने या जज-वार संकलित करने का कोई वैधानिक नियम या अनिवार्यता नहीं है। |
| हाईकोर्ट का अंतिम निर्णय | रिट याचिका स्वीकार (Allowed); सीआईसी का 26 मई 2011 का आक्षेपित आदेश रद्द (Quashed)। |
विधिक एवं विधायी विश्लेषण: ‘सूचना का अधिकार बनाम जानकारी का सृजन’
- धारा 2(f) और 2(j) के तहत ‘सूचना’ की विधिक सीमा:
- सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 2(j) स्पष्ट करती है कि नागरिक को केवल उस सूचना को प्राप्त करने का अधिकार है जो किसी लोक प्राधिकारी द्वारा “धारित या उसके नियंत्रणाधीन” (Held by or under the control of any public authority) हो।
- यदि कोई सूचना लोक प्राधिकारी के पास पहले से किसी रजिस्टर, इलेक्ट्रॉनिक डेटाबेस या संकलित फाइल के रूप में मौजूद नहीं है, तो अधिकारी पर यह वैधानिक दायित्व नहीं डाला जा सकता कि वह सैकड़ों मामलों के रोस्टर की पड़ताल करे, बहस खत्म होने की तारीख और फैसला आने की तारीख की गणना करे, और फिर एक नया सारणीबद्ध चार्ट (Tabulated Chart) बनाकर आवेदक को दे।
- सर्वोच्च न्यायालय की सुस्थापित नज़ीरें:
- सर्वोच्च न्यायालय ने सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन बनाम आदित्य बंदोपाध्याय में दो-टूक व्यवस्था दी थी:“लोक सूचना अधिकारी का काम सूचना उपलब्ध कराना है, न कि आवेदक के लिए निष्कर्ष निकालना, अनुसंधान करना या जानकारी को नए सिरे से सृजित करना। आरटीआई कानून का उद्देश्य प्रशासन में पारदर्शिता लाना है, न कि लोक प्राधिकारियों के सामान्य कामकाजी तंत्र को पंगु बनाकर उन्हें गैर-मौजूद डेटा संकलित करने में उलझाना।”
- मुख्य न्यायाधीश का प्रशासनिक क्षेत्राधिकार:
- अदालतों में कोर्ट मास्टर्स द्वारा आरक्षित निर्णयों की सूची मुख्य न्यायाधीश को इसलिए दी जाती है ताकि वे संविधान के अनुच्छेद 235 और इन-हाउस प्रशासनिक तंत्र के तहत मुकदमों के त्वरित निस्तारण पर नजर रख सकें।
- ये दस्तावेज संस्थागत और प्रशासनिक संवाद का हिस्सा होते हैं। सीआईसी द्वारा यह मान लेना कि ऐसी हर सूची रिकॉर्ड रूम में संधारित होगी और उसे न्यायाधीश-वार छांटकर आरटीआई में दिया जाना चाहिए, प्रशासनिक वास्तविकताओं और कानून के मूल सिद्धांतों के विपरीत था।
विधिक विवरण एवं संदर्भ
- न्यायालय: दिल्ली उच्च न्यायालय, नई दिल्ली (संवैधानिक रिट क्षेत्राधिकार)
- केस संदर्भ: जन सूचना अधिकारी, दिल्ली उच्च न्यायालय बनाम पी.डी. गुप्ता [W.P.(C) No. … / 2011]
- पीठासीन न्यायाधीश: न्यायमूर्ति अमित महाजन (Justice Amit Mahajan) (एकल पीठ)
- निर्णय की तिथि: 3 नवंबर 2026
- कार्यवाही का परिणाम: वर्ष 2011 से लंबित रिट याचिका पूर्णतः स्वीकार; केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) का दिनांक 26.05.2011 का आदेश निरस्त।
विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ता (PIO, दिल्ली हाईकोर्ट) की ओर से: अधिवक्ता प्रियम मेहता (Advocate Priyam Mehta)।
- प्रतिवादी (RTI आवेदक) की ओर से: प्रतिवादी पक्ष के संबंधित विधिक प्रतिनिधि / स्वयं।
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (RTI Act, 2005):
- धारा 2(f) — सूचना की परिभाषा (अभिलेख, दस्तावेज, ज्ञापन आदि)
- धारा 2(j) — सूचना के अधिकार का दायरा (धारित या नियंत्रणाधीन सूचना तक सीमित)
- धारा 19(3) — सीआईसी की अपीलीय शक्तियां एवं सीमाएं
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 226 (उच्च न्यायालय का रिट क्षेत्राधिकार)
- सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (RTI Act, 2005):
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- आरटीआई के तहत सूचना सृजन और संकलन का विधिक मानक: ‘सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 लोक प्राधिकारी को केवल वही सूचना प्रदान करने का आदेश देता है जो उसके पास भौतिक या डिजिटल रूप में पहले से धारित और संधारित हो; जनहित का हवाला देकर किसी लोक प्राधिकारी को ऐसी जानकारी तैयार करने, संकलित करने (Collate) या नया डेटाबेस सृजित करने (Create Information) के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता जिसे वह अपने सामान्य कार्यकरण में संधारित नहीं करता; केंद्रीय सूचना आयोग केवल इस पूर्व-धारणा या अनुमान के आधार पर आदेश जारी नहीं कर सकता कि अमुक जानकारी प्रशासनिक परिपाटी के कारण उपलब्ध होनी ही चाहिए; अदालती रिकॉर्ड्स की फाइल-दर-फाइल जांच कर न्यायाधीश-वार निर्णयों का नया संकलन तैयार करने की कोई बाध्यता आरटीआई कानून के तहत नहीं डाली जा सकती।’
- वर्तमान स्थिति व विधिक प्रभाव: दिल्ली उच्च न्यायालय के इस निर्णय से यह न्यायिक सिद्धांत पुनः सुदृढ़ हो गया है कि आरटीआई के तहत अदालतों के पीआईओ को विभिन्न मामलों की व्यक्तिगत केस फाइलों की पड़ताल कर न्यायाधीशों के फैसलों में लगने वाले समय का अलग से चार्ट या डेटाबेस तैयार करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता; 2011 से लंबित यह विवाद अब आधिकारिक रूप से समाप्त हो गया है।
RTI Act: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court), नई दिल्ली |
| न्यायाधीश | न्यायमूर्ति अमित महाजन (Justice Amit Mahajan) |
| मामला/साइटेशन | जन सूचना अधिकारी बनाम पी.डी. गुप्ता (Public Information Officer v. PD Gupta) |
| याचिकाकर्ता (Petitioner) | दिल्ली हाईकोर्ट के पब्लिक इंफॉर्मेशन ऑफिसर (PIO) | प्रतिनिधित्व: अधिवक्ता प्रियम मेहता |
| मूल आरटीआई आवेदन | 2009 में पूर्व न्यायिक अधिकारी पी.डी. गुप्ता द्वारा जस्टिस ए.के. सीकरी की एकल व खंडपीठ के उन मुकदमों का ब्योरा मांगना जिनमें फैसले सुरक्षित रखने के 2 माह बाद सुनाए गए। |
| चुनौतीपूर्ण आदेश | केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) का 26 मई 2011 का आदेश, जिसमें PIO को कोर्ट मास्टर्स की मासिक रिपोर्ट खोजकर 2 साल का ब्योरा देने को कहा गया था। |
| अदालत का अंतिम निर्णय | CIC का आदेश निरस्त: RTI एक्ट गैर-मौजूद या गैर-संकलित (Uncompiled) डेटा को ढूंढकर नया रिकॉर्ड तैयार करने के लिए बाध्य नहीं करता। |

