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याचिका में उठाए गए प्रमुख मुद्दे और अदालती अवलोकन
- मुकदमों के नामकरण और श्रेणियों में भारी विसंगतियां:याचिकाकर्ता ने उजागर किया कि विभिन्न हाईकोर्ट्स (यहाँ तक कि एक ही हाईकोर्ट की अलग-अलग पीठों) में मामलों को दर्ज करने की प्रणाली अलग-अलग है।
- केस श्रेणियां: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट में 238 प्रकार की केस श्रेणियां हैं, जबकि इलाहाबाद हाईकोर्ट में 132 प्रकार हैं।
- केस संक्षेप (Abbreviations): रिट याचिका को कहीं ‘WP’ तो कहीं ‘WPA’ लिखा जाता है। क्रिमिनल अपील को अलग-अलग अदालतों में CRA, CR.A, CRAPL और CRL.A जैसे 4-5 अलग संक्षेपों से दर्ज किया जाता है।
- राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड (NJDG) और ई-कमेटी का प्रोजेक्ट:न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची ने कहा कि यह मुद्दा अत्यंत प्रासंगिक है, लेकिन ई-कमेटी ने जिला न्यायालयों और मजिस्ट्रेट अदालतों में Case Information System (CIS) के माध्यम से पहले ही मानकीकरण लागू कर दिया है और अब इसे हाईकोर्ट्स में विस्तारित किया जा रहा है।
- अदालती शुल्क (Court Fees) में अत्यधिक असमानता:याचिका में दर्शाया गया था कि ₹10,000 के मुकदमे की फीस पंजाब व हरियाणा में ₹250 है, जबकि बिहार-झारखंड में ₹1,480 और यूपी में ₹1,157.50 है। इसी प्रकार ₹5 लाख के मुकदमे की फीस दिल्ली में ₹7,224 है जबकि उत्तर प्रदेश में यह ₹37,908 है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि राज्य विधानमंडलों के विधायी अधिकारों पर सीमाएं नहीं लगाई जा सकतीं।
मुख्य विधिक व प्रशासनिक बिंदु
1. प्रशासनिक सुधार प्रक्रिया:
सुप्रीम कोर्ट ने रेखांकित किया कि न्यायपालिका के डिजिटलीकरण और डेटा मानकीकरण का कार्य एक प्रशासनिक प्रक्रिया (Administrative Initiative) है जिसे ई-कमेटी देख रही है, अतः इसके लिए न्यायिक आदेश या लॉ कमीशन को निर्देश देने की आवश्यकता नहीं है।
2. राज्यीय स्वायत्तता का सम्मान:
कोर्ट फीस से जुड़ी मांग को खारिज करके शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि संघवाद के सिद्धांतों के तहत राज्य विधायिका द्वारा तय की जाने वाली फीस संरचना में हस्तक्षेप नहीं किया जाएगा।
नई दिल्ली: भारत का संविधान के अनुच्छेद 32 (संवैधानिक उपचार क्षेत्राधिकार), सातवीं अनुसूची की सूची II (राज्य सूची) की प्रविष्टि 3 (उच्च न्यायालयों में ली जाने वाली कोर्ट फीस तय करने की राज्य विधानमंडलों की अनन्य विधायी शक्ति), राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड (National Judicial Data Grid – NJDG) के तहत केस सूचना प्रणाली (CIS), तथा देश के 25 उच्च न्यायालयों में वादों के वर्गीकरण, शब्दावली (Nomenclature) और अदालती शुल्कों में व्यापक भिन्नताओं के समाधान पर सर्वोच्च न्यायालय ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण आदेश पारित किया है।
मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत (Chief Justice of India Surya Kant), न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची (Justice Joymalya Bagchi) और न्यायमूर्ति वी. मोहना (Justice V. Mohana) की तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने अधिवक्ता व भाजपा नेता अश्विनी कुमार उपाध्याय (Ashwini Upadhyay) द्वारा दायर जनहित याचिका (PIL) पर न्यायिक पक्ष (Judicial Side) से विचार करने से इनकार कर दिया।
पीठ ने याचिकाकर्ता को छूट प्रदान की कि वे देश भर के उच्च न्यायालयों में वादों के नामकरण, पंजीकरण प्रक्रियाओं और संक्षिप्ताक्षरों (Abbreviations) में एकरूपता लाने हेतु सर्वोच्च न्यायालय की ई-कमेटी (Supreme Court e-Committee) के समक्ष एक औपचारिक प्रत्यावेदन (Representation) प्रस्तुत करें।
अदालत ने स्पष्ट किया कि केस वर्गीकरण का मानकीकरण शीर्ष अदालत की ई-कमेटी के ‘यूनिफॉर्मिटी प्रोजेक्ट’ (Uniformity Project) का पहले से ही एक सक्रिय हिस्सा है, जो जिला न्यायपालिका में लागू होने के बाद अब उच्च न्यायालयों में विस्तारित किया जा रहा है। वहीं, देश भर में ‘एक समान कोर्ट फीस’ (Uniform Court Fees) लागू करने की याचिकाकर्ता की मांग को खंडपीठ ने अव्यावहारिक और राज्यों की विधायी स्वायत्तता के प्रतिकूल बताते हुए सिरे से खारिज कर दिया। मुख्य न्यायाधीश ने रेखांकित किया कि दिल्ली और बिहार के नागरिकों की आर्थिक क्षमता में अंतर होता है; अतः राज्यों पर एक समान फीस थोपकर गरीबों पर बोझ नहीं डाला जा सकता।
शीर्ष अदालत के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां
1. ‘केस नामकरण में एकरूपता प्रासंगिक, ई-कमेटी के यूनिफॉर्मिटी प्रोजेक्ट का हिस्सा’:
न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची ने राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड (NJDG) के आधुनिकीकरण का संदर्भ देते हुए टिप्पणी की: “आप जो मुद्दा उठा रहे हैं वह अत्यंत प्रासंगिक और महत्वपूर्ण (Very relevant point) है। किंतु यह विषय पहले से ही हमारी ई-कमेटी के ‘यूनिफॉर्मिटी प्रोजेक्ट’ (Uniformity Project) का एक अभिन्न हिस्सा है, जो एक प्रकार के ‘यूनिफॉर्म ज्यूडिशियल कोड’ (Uniform Judicial Code) जैसा ही है। वादों के मानकीकरण (Standardisation) से हमें राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड (NJDG) पर मुकदमों के डेटा को बेहतर तरीके से खोजने, ट्रैक करने और विश्लेषण करने में व्यापक मदद मिलेगी। केस इंफॉर्मेशन सिस्टम (CIS) के माध्यम से जिला अदालतों और मजिस्ट्रेट कोर्ट्स में मानकीकरण के प्रयास पहले ही सफलतापूर्वक लागू किए जा चुके हैं और अब इस प्रक्रिया को उच्च न्यायालयों के स्तर पर आगे बढ़ाया जा रहा है।”
2. ‘देश भर में एक समान कोर्ट फीस नहीं हो सकती; दिल्ली और बिहार के वादियों की क्षमता भिन्न’:
- मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने राज्य विधानमंडलों की वित्तीय व विधायी शक्तियों का बचाव करते हुए स्पष्ट किया:“कोर्ट फीस प्रत्येक राज्य में अलग-अलग हो सकती है। दिल्ली के एक निवासी की कोर्ट फीस चुकाने की वित्तीय क्षमता बिहार या ओडिशा के निवासी की तुलना में कहीं अधिक हो सकती है।हम देश के कमजोर या गरीब वर्ग के लोगों पर उतनी ही कोर्ट फीस का बोझ नहीं डाल सकते, जितनी महानगरों (Metropolitan Cities) में रहने वाले संपन्न वादी वहन करने में सक्षम हैं।”
3. राज्यों की विधायी क्षमता (Legislative Competence) में हस्तक्षेप वर्जित:
- न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची ने संविधान की सातवीं अनुसूची के संघीय ढांचे को रेखांकित करते हुए कहा:“कोर्ट फीस का निर्धारण पूर्णतः राज्यों के विधायी दायरे (Legislative Domain of States) के अंतर्गत आता है। अदालत उन विषयों पर राज्य विधानमंडलों पर कोई अनावश्यक पाबंदी या एकरूपता की शर्त नहीं थोप सकती जो उनकी अनन्य विधायी सक्षमता के तहत आते हैं।”
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (3 नवंबर 2026)
| संदर्भ / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे |
| फोरम / न्यायालय | भारत का सर्वोच्च न्यायालय, नई दिल्ली (संवैधानिक जनहित याचिका क्षेत्राधिकार — अनुच्छेद 32) |
| पीठ | मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना |
| आदेश की तिथि | 3 नवंबर 2026 |
| केस संदर्भ | अश्विनी कुमार उपाध्याय बनाम भारत संघ व अन्य [Writ Petition (Civil) No. … / 2026] |
| याचिकाकर्ता | अश्विनी कुमार उपाध्याय (Ashwini Kumar Upadhyay) — वरिष्ठ अधिवक्ता व जनहित याचिकाकर्ता। |
| याचिकाकर्ता के अधिवक्ता | अधिवक्ता-ऑन-रिकॉर्ड (AoR) अश्वनी कुमार दुबे (Ashwani Dubey)। |
| प्रतिवादी पक्ष | 1. विधि एवं न्याय मंत्रालय (Ministry of Law and Justice), भारत सरकार 2. विधि आयोग (Law Commission of India) 3. समस्त उच्च न्यायालयों के महानिबंधक (Registrars General)। |
| याचिका में उठाए गए प्रमुख मुद्दे | 1. केस वर्गीकरण में असमानता: देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों में वादों की श्रेणियों की संख्या में भारी अंतर है (उदा. जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट में मुकदमों की 238 श्रेणियां हैं, जबकि इलाहाबाद हाईकोर्ट में 132)। 2. शब्दावली व संक्षिप्ताक्षर में भ्रम: एक ही प्रकार के मुकदमे को अलग-अलग हाईकोर्ट अलग-अलग नामों से पुकारते हैं (जैसे रिट याचिका को कहीं WP तो कहीं WPA; क्रिमिनल अपील को कहीं CRA, कहीं CR.A, CRAPL या CRL.A)। यहाँ तक कि इलाहाबाद हाईकोर्ट की प्रधान पीठ और लखनऊ खंडपीठ के बीच भी नामकरण में विसंगतियां हैं। 3. अदालती शुल्क (Court Fees) में भारी अंतर: समान संपत्ति मूल्य के मुकदमों पर अलग-अलग राज्यों में अत्यधिक असमान कोर्ट फीस वसूली जाती है। |
| याचिकाकर्ता द्वारा मांगी गई राहतें | • सभी 25 उच्च न्यायालयों के लिए एक ‘यूनिफॉर्म ज्यूडिशियल कोड’ (Uniform Judicial Code) तैयार किया जाए। • भारत के विधि आयोग को निर्देश दिया जाए कि वह कोर्ट फीस, पंजीकरण प्रक्रिया और न्यायिक शब्दावली के मानकीकरण पर एक व्यापक रिपोर्ट तैयार करे। • केंद्रीय विधि मंत्रालय को मानकीकृत दिशानिर्देश जारी करने हेतु विशेषज्ञों की समिति गठित करने का निर्देश मिले। |
| सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निर्णय | • न्यायिक पक्ष पर PIL खारिज/निस्तारित। • एक समान कोर्ट फीस की मांग खारिज (राज्यों का विधायी विषय)। • केस नामकरण और पंजीकरण सुधारों के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय की ई-कमेटी (Supreme Court e-Committee) को औपचारिक प्रत्यावेदन देने की स्वतंत्रता प्रदान की गई। |
जनहित याचिका में प्रस्तुत विसंगतियों का तुलनात्मक अध्ययन (Court Fees & Abbreviations)
याचिकाकर्ता द्वारा अदालत के समक्ष देश भर में प्रचलित शुल्कों और संक्षिप्ताक्षरों की विषमताओं का विस्तृत चार्ट प्रस्तुत किया गया था:
1. समान मूल्यांकन के दीवानी दावों पर राज्यों में कोर्ट फीस का अंतर:
| मुकदमे का मूल्यांकन (Suit Valuation) | पंजाब एवं हरियाणा | बिहार एवं झारखंड | महाराष्ट्र | उत्तर प्रदेश | दिल्ली | तेलंगाना |
| ₹10,000 का दावा | ₹250 | ₹1,480 | ₹1,430 | ₹1,157.50 | विहित दर | विहित दर |
| ₹5,00,000 का दावा | ₹31,300 (हरियाणा) | राज्य अनुसूची अनुसार | राज्य अनुसूची अनुसार | ₹37,908 | ₹7,224 | ₹6,777 |
2. विभिन्न उच्च न्यायालयों में केस संक्षिप्ताक्षरों (Abbreviations) का भ्रम:
| कार्यवाही का प्रकार (Nature of Proceeding) | विभिन्न उच्च न्यायालयों द्वारा प्रयुक्त संक्षिप्ताक्षर |
| रिट याचिका (Writ Petition) | WP, W.P., WPA, WPCR, WP(C) |
| आपराधिक अपील (Criminal Appeal) | CRA, CR.A, CRAPL, CRL.A, Crl.A. |
| जमानत आवेदन (Bail Application) | BA, B.A., CRM-M, MCRC, CRL.MISC |
विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: ‘सातवीं अनुसूची, वित्तीय संघवाद और न्यायिक डिजिटलीकरण’
- संविधान की सातवीं अनुसूची और वित्तीय संघवाद (List II, Entry 3):
- भारत के संविधान की सातवीं अनुसूची के तहत राज्य सूची की प्रविष्टि 3 स्पष्ट रूप से यह अधिकार राज्य विधानमंडलों को सौंपती है:“प्रविष्टि 3: अधिकारी और सेवक; उच्चतम न्यायालय के सिवाय अन्य सभी न्यायालयों का गठन और संगठन; ऐसे न्यायालयों में ली जाने वाली फीस…”
- भारतीय संघवाद का यह आधारभूत सिद्धांत है कि कर और शुल्कों का निर्धारण जनसांख्यिकीय और आर्थिक वास्तविकताओं के आधार पर राज्य सरकारें करती हैं। सर्वोच्च न्यायालय संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत रिट जारी कर राज्यों की इस विधायी सक्षमता को समाप्त नहीं कर सकता।
- समानता का संवैधानिक सिद्धांत (Article 14 – Equals vs Unequals):
- याचिकाकर्ता का यह तर्क कि “विभिन्न राज्यों में अलग-अलग कोर्ट फीस होने से वादियों के बीच असमानता पैदा होती है”, संवैधानिक न्यायशास्त्र की दृष्टि से त्रुटिपूर्ण था।
- संविधान का अनुच्छेद 14 यह स्पष्ट करता है कि “समान परिस्थितियों वालों के साथ समान व्यवहार” होना चाहिए। देश के सबसे समृद्ध राज्य/केंद्र शासित प्रदेश (जैसे दिल्ली) के प्रति व्यक्ति आय के स्तर की तुलना बिहार, झारखंड या ओडिशा के ग्रामीण क्षेत्रों से नहीं की जा सकती। यदि पूरे देश में एक समान उच्च कोर्ट फीस लागू कर दी जाए, तो निर्धन नागरिकों के लिए अदालतों के दरवाजे हमेशा के लिए बंद हो जाएंगे, जो अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 39A (सुलभ व सस्ता न्याय) की भावना के विरुद्ध होगा।
- ई-कमेटी का ‘यूनिफॉर्मिटी प्रोजेक्ट’ और ई-कोर्ट्स मिशन मोड प्रोजेक्ट (Phase III):
- प्रशासनिक स्तर पर वादों के नामकरण (Nomenclature) और संक्षिप्ताक्षरों का मानकीकरण एक आवश्यक तकनीकी कदम है।
- सर्वोच्च न्यायालय की ई-कमेटी द्वारा संचालित केस इंफॉर्मेशन सिस्टम (CIS 3.2 / 4.0) और राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड (NJDG) पर जब लाखों मुकदमों का डेटा अपलोड होता है, तो अलग-अलग हाईकोर्ट्स द्वारा अलग-अलग शब्दों (जैसे WP बनाम WPA) के इस्तेमाल से सर्च एल्गोरिदम और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित न्यायिक शोध में बाधा आती है।
- अदालत ने इसे न्यायिक आदेश (Judicial Writ) के जरिए हल करने के बजाय ई-कमेटी के माध्यम से प्रशासनिक व तकनीकी स्तर पर लागू करने का व्यावहारिक मार्ग चुना।
विधिक विवरण एवं उपस्थित पक्षकार
- न्यायालय: भारत का सर्वोच्च न्यायालय, नई दिल्ली (संवैधानिक जनहित याचिका क्षेत्राधिकार — अनुच्छेद 32)
- केस संदर्भ: अश्विनी कुमार उपाध्याय बनाम भारत संघ व अन्य [Writ Petition (Civil) No. … / 2026]
- पीठ: मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना
- निर्णय की तिथि: 3 नवंबर 2026
- कार्यवाही का परिणाम: जनहित याचिका न्यायिक स्तर पर विचार करने से इनकार करते हुए निस्तारित; याचिकाकर्ता को सर्वोच्च न्यायालय की ई-कमेटी के समक्ष प्रशासनिक प्रत्यावेदन देने की अनुमति।
विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ता की ओर से: अश्विनी कुमार उपाध्याय (व्यक्तिगत रूप से) एवं अधिवक्ता-ऑन-रिकॉर्ड अश्वनी कुमार दुबे (Advocate-on-Record Ashwani Dubey)।
- प्रतिवादी पक्ष की ओर से: केंद्र सरकार व न्यायपालिका के स्थायी विधिक प्रतिनिधि।
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 32 (रिट क्षेत्राधिकार), अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 21 व 39A (सुलभ व सस्ता न्याय) तथा सातवीं अनुसूची (राज्य सूची प्रविष्टि 3)
- कोर्ट फीस अधिनियम, 1870 (Court Fees Act, 1870) एवं विभिन्न राज्यों के राज्य कोर्ट फीस संशोधन अधिनियम
- ई-कोर्ट्स मिशन मोड प्रोजेक्ट (चरण III) / राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड (NJDG) नियम
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- न्यायिक डेटा मानकीकरण और वित्तीय संघवाद का विधिक मानक: ‘देश भर के उच्च न्यायालयों में वादों के वर्गीकरण, नामकरण (Nomenclature) और संक्षिप्ताक्षरों में एकरूपता लाना डिजिटल न्यायिक प्रशासन (NJDG) को पारदर्शी और सुलभ बनाने हेतु आवश्यक है; किंतु यह कार्य प्रशासनिक और तकनीकी दायरे का है जिसे सर्वोच्च न्यायालय की ई-कमेटी द्वारा मानकीकरण परियोजनाओं के माध्यम से चरणबद्ध रूप से हल किया जाना चाहिए, न कि न्यायिक आदेशों द्वारा; दूसरी ओर, अदालतों में ली जाने वाली कोर्ट फीस का निर्धारण संविधान की 7वीं अनुसूची के तहत पूर्णतः राज्य विधानमंडलों की अनन्य विधायी सक्षमता का विषय है; विभिन्न राज्यों के नागरिकों की प्रति व्यक्ति आय और आर्थिक क्षमताओं में भारी असमानता के दृष्टिगत देश भर में एक समान कोर्ट फीस ढांचा लागू नहीं किया जा सकता; ऐसा कोई भी न्यायिक निर्देश वित्तीय संघवाद और गरीबों के लिए न्याय तक पहुंच (Access to Justice) के संवैधानिक अधिकार को बाधित करेगा।’
- वर्तमान स्थिति व अनुपालन निर्देश: याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय अब उच्च न्यायालयों में वादों की श्रेणियों को तर्कसंगत बनाने और संक्षिप्ताक्षरों के मानकीकरण का एक विस्तृत मसौदा सर्वोच्च न्यायालय की ई-कमेटी के सदस्य-प्रभारी (Member, e-Committee) को सौंपेंगे; ई-कमेटी ई-कोर्ट्स मिशन के तहत देश भर के उच्च न्यायालयों के रजिस्ट्रार (आईटी) के साथ विचार-विमर्श कर इसे राष्ट्रीय डेटा ग्रिड में एकीकृत करने पर विचार करेगी।
Uniform Judicial Code: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | भारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठ | CJI सूर्या कांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना |
| याचिकाकर्ता | अश्विनी उपाध्याय (Ashwini Upadhyay) | प्रतिनिधित्व: एओआर अश्वनी दुबे |
| मूल मांगें | 1. सभी हाईकोर्ट्स के लिए एकसमान केस क्लासिफिकेशन व नामकरण (Uniform Judicial Code)। 2. देश भर में एकसमान कोर्ट फीस और न्यायिक शब्दावली लागू करना। |
| अदालत का अंतिम आदेश | 1. न्यायिक पक्ष पर PIL खारिज: केस नामकरण का मुद्दा ई-कमेटी के ‘यूनिफॉर्मिटी प्रोजेक्ट’ में पहले से शामिल है; याचिकाकर्ता ई-कमेटी को प्रतिनिधित्व दें। 2. कोर्ट फीस मांग खारिज: कोर्ट फीस राज्य विधायिका का विषय है, देश भर में एकसमान शुल्क आर्थिक रूप से अनुचित होगा। |

